ईश्वर प्राप्ति

Shraddha ki pariskha (श्रद्धा की परीक्षा ) – Asaramji Bapu


om

Shraddha ki pariskha (श्रद्धा की परीक्षा ) – Asaramji Bapu

श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाये गए मार्ग को दिखावा रहता है। श्रद्धा की परीक्षा, जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिये मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठण्डे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह .. आसाराम बापूजी , श्रद्धा का अर्थ है–”सत्य में धारण करना”। ”श्रत्” अर्थात् सत्य, ”धा” अर्थात् ”धारण करना।” संसार की प्रत्येक वस्तु का विकास सत्य की तरफ है। अगर कहीं असत्य का प्राबल्य भी दीखता है तो सामयिक है, वह अपनी प्रतिक्रिया को उत्पन्न कर रहा होता है। सलिए सफलता तक पहुंचने के लिए बहुत जरूरी है पवित्र लक्ष्य के साथ जुड़ी अखंड श्रद्धा का होना। भारतीय जनमानस श्रद्धा प्रधान रहा है। श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान संपन्न और चरित्र संपन्न बनता है। श्रद्धा का अर्थ है सघन इच्छा अथवा … भक्त प्रह्लाद, स्वामी विवेकानंद , घाटवाले बाबा, निर्भयता, भजन , चमत्कार, तत्वज्ञान में हिलाने वाली बातें, ॐ

Advertisements
Standard
Tithis

अक्षय फल देनेवाली अक्षय नवमी – आँवला नवमी


avla navmi

कार्तिक शुक्ल नवमी (२९ अक्टूबर २०१७ ) को ‘अक्षय नवमी’ तथा ‘आँवला नवमी’ कहते है | अक्षय नवमी को जप, दान, तर्पण, स्नानादि का अक्षय फल होता है | इस दिन आँवले के वृक्ष के पूजन का विशेष माहात्म्य है | पूजन में कपूर या घी के दीपक से आँवले के वृक्ष की आरती करनी चाहिए तथा निम्न मंत्र बोलते हुये इस वृक्ष की प्रदक्षिणा करने का भी विधान है :

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च |
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ||

इसके बाद आँवले के वृक्ष के नीचे पवित्र ब्राम्हणों व सच्चे साधक-भक्तों को भोजन कराके फिर स्वयं भी करना चाहिए | घर में आंवलें का वृक्ष न हो तो गमले में आँवले का पौधा लगा के अथवा किसी पवित्र, धार्मिक स्थान, आश्रम आदि में भी वृक्ष के नीचे पूजन कर सकते है | कई संत श्री आशारामजी आश्रमों में आँवले के वृक्ष लगे हुये हैं | इस पुण्यस्थलों में जाकर भी आप भजन-पूजन का मंगलकारी लाभ ले सकते हैं |

Limitless fruits from Akshay Navami

Karthik Shukla Navami (29 Nov 2017) is also renowned as “Akshay Navami” or “Amla Navami”. Performing recitations, donations, tarpan, bathing, etc.. offers limitless benefits. There is a special significance of worshiping Amla tree on this day. During puja, one should use a lamp lit using camphor or clarified butter, ghee in front of an Amla tree. Following mantra should be recited and then circumambulate around the tree:
YANI KANI CHA PAPAANI JANMANTARAKRITAANI CHA |
TAANI SARVAANI NASHYANTU PRADAKSHINPADE PADE ||
After this, there is the custom of offering food to pure brahmins and devotees of pure heart, and then one should oneself take meal under the Amla tree. If one doesnot have Amla tree in his backyard then the same practice can be repeated around a small amla plant in a pot or in any holy, religious place or ashram. Many Sant Shri Asaramji ashrams have Amla trees planted in their premises. You may also take benefit of these holy places.

Standard
Om, Special Tithi, Tithi

Special occasion for Japa and Meditation : Ravivary Saptami


 

रविवारी सप्तमी

raviari saptami

साधना में तीव्रता से आगे बढने के लिए :

संत आशाराम बापू जी ने कहा है की रविवारी सप्तमी के दिन किया गया जप ध्यान लाख गुना फलदायी होता है | जितना फल दीवाली, जन्माष्टमी, होली और शिवरात्रि के दिनों में जप ध्यान करने से होता है उतना ही फल रविवारी सप्तमी के दिन भी करने से होता है |

समय : सूर्योदय से सुबह ८  बजे तक – ३० जुलाई २०१७
संत आशारामजी बापू जी ने कहा की साधको को साधना में उन्नति के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

१: मौन का अधिक से अधिक सेवन करे या जितना कम संभव हो उतना कम बोले |

२: अधिक से अधिक समय जप और ध्यान में लगाये |

३: उपवास करे और सिर्फ दूध का सेवन करे |

४: रविवारी सप्तमी के दिन और उससे एक रात पहले भूमि पर शयन का करें |

५: रविवारी सप्तमी से एक रात्रि पहले साधकों को चाहिए की वो एक मजबूत संकल्प ले की, मै कल मौन रखूँगा सद्ग्रंथो जैसे की “जीवन रसायन”, “इश्वर की ओर” और “दिव्य प्रेरणा प्रकाश” का पठन करूँगा और अपने आपको सतत जप और ध्यान में संलग्न रखूँगा |

Standard
Alerts, Ashram News, Controvercy, Exposion, People's Experience, Saint and People, Social Activities, The Fact

साजिश को सच का रूप देने की मनोवैज्ञानिक रणनीति


shilpa

संत श्री आशारामजी बापू के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से किस तरह से सुनियोजन किया गया है, यह मैं एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपको बताना चाहती हूँ । आठ मुख्य पहलू समझेंगे कि किस तरह इस साजिश को सच का मुखौटा पहनाया जा रहा है ।

(१) जनता के विशिष्ट वर्गों पर निशाना : समाज के शिक्षित, जागरूक, उच्च एवं मुख्यतः युवा वर्ग को निशाना बनाया गया क्योंकि इनको विश्वास दिलाने पर ये तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं ।

(२) षड्यंत्र का मुद्दा : देश की ज्वलंत समस्या ‘महिलाओं पर अत्याचार’ को मुख्य मुद्दा बनाया है । इस भावनात्मक विषय पर हर कोई तुरंत प्रतिक्रिया दे के विरोध दर्शाता है ।

(३) रणनीति : चीज को यथार्थपूर्ण, विश्वसनीय, प्रभावशाली दिखाने जैसी मार्केटिंग रणनीति का उपयोग करके दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है ।

दर्शक मनोविज्ञान का भी दुरुपयोग किया जा रहा है । कोई विज्ञापन हमें पहली बार पसंद नहीं आता है लेकिन जब हम बार-बार उसे देखते हैं तो हमें पता भी नहीं चलता है कि कब हम उस विज्ञापन को गुनगुनाने लग गये । बिल्कुल ऐसे ही बापूजी के खिलाफ इस बोगस मामले को बार-बार दिखाने से दर्शकों को असत्य भी सत्य जैसा लगने लगता है ।

(४) प्रस्तुतिकरण का तरीका : पेड मीडिया चैनलों के एंकर आपके ऊपर हावी होकर बात करना चाहते हैं । वे सिर्फ खबर को बताना नहीं चाहते बल्कि सेकंडभर की फालतू बात को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताकर दिनभर दोहराते हैं और आपको हिप्नोटाइज करने की कोशिश करते हैं ।

(५) भाषा : खबर को बहुत चटपटे शब्दों के द्वारा असामान्य तरीके से बताते हैं । ‘बात गम्भीर है, झड़प, मामूली’ आदि शब्दों की जगह ‘संगीन, वारदात, गिरोह, बड़ा खुलासा, स्टिंग ऑपरेशन’ ऐसे शब्दों के सहारे मामूली मुद्दे को भी भयानक रूप दे देते हैं ।

(६) आधारहीन कहानियाँ बनाना, सुटिंग ऑपरेशन्स और संबंधित बिन्दु : ‘आश्रम में अफीम की खेती, स्टिंग ऑपरेशन’ आदि आधारहीन कहानियाँ बनाकर मामले को रुचिकर बना के उलझाने की कोशिश करते हैं ।

(७) मुख्य हथियार : बहुत सारे विडियो जो दिखाये जाते हैं वे तोड़-मरोड़ के बनाये जाते हैं । ऐसे ऑडियो टेप भी प्रसारित किये जाते हैं । यह टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग है ।

इसके अलावा कमजोर, नकारात्मक मानसिकतावालों को डरा के या प्रलोभन देकर उनसे बुलवाते हैं । आश्रम से निकाले गये २-५ बगावतखोर लोगों को मोहरा बनाते हैं ताकि झूठी विश्वसनीयता ब‹ढायी जा सके ।

(८) मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करना : बापूजी की जमानत की सुनवाई से एक दिन पहले धमकियों की खबरें उछाली जाती हैं, कभी पुलिस को, कभी माता-पिता और लड़की को तो कभी न्यायाधीश को । ये खबरें कभी भी कुछ सत्य साबित नहीं हुर्इं ।

अब आप खुद से प्रश्न पूछिये और खुद ही जवाब ढूँढिये कि क्या यह आरोप सच है या एक सोची-समझी साजिश ?

और एक बात कि केवल पेड मीडिया चैनल ही नहीं बल्कि इसीके समान प्रिंट मीडिया भी खतरनाक तरीके से जनमानस को प्रभावित कर रहा है । इन दोनों से सावधान रहना चाहिए ।

– शिल्पा अग्रवाल,

प्रसिद्ध मनोविज्ञानी

Standard

गौ सेवा - गाय की रक्षा - देश की रक्षा

बापू जी के श्री चित्र को १०८ परिक्रमा करती निवाई गौशाला की गौमाता

Awesome, Gau-sewa, Saint and People, Social Activities

गौ सेवा – गाय की रक्षा – देश की रक्षा

Image
Saint and People

सार्इं टेऊँराम


Image

वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न पीवे नीर ।

परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ।।

जैसे वृक्ष अपने फलों को स्वयं भी कभी नहीं खाता, सरिता अपने नीर का स्वयं पान कभी नहीं करती वैसे ही संतों का जीवन भी अपने लिए नहीं होता । हालांकि संतों की यश-कीर्ति से जलनेवाले लोग उनकी यश-कीर्ति को धूमिल करने के बहुतेरे प्रयास करते हैं । किन्तु इन सबकी परवाह न करते हुए वे संतजन अपने जीवन को परहित में ही व्यतीत कर देते हैं । उनका जीवन तो बस, मानवमात्र को दुःखों से छुटकारा दिलवाकर उनके भीतर शांति एवं आनंद भरने में ही खर्च होता है ।

सिंध प्रांत में ऐसे ही एक महान संत हो गये- सार्इं टेऊँराम । उनके सान्निध्य को पाकर लोग बहुत खुशहाल रहते थे । निगाहमात्र से ही लोगों में शांति एवं आनंद का संचार कर देने की शक्ति उनमें थी । उनके सत्संग में मात्र वृद्ध स्त्री-पुरुष ही नहीं, कई युवान-युवतियाँ भी आते थे । उनकी बढ़ती प्रसिद्धि एवं उनके प्रति लोगों के प्रेम को देखकर कई तथा-कथित समाजसुधारकों को तकलीफ होने लगी । समाजसुधारक भी दो प्रकार के लोग होते हैं एक तो सज्जन लोग होते हैं और दूसरे वे लोग होते हैं जो दूसरों के यश को देखकर जलते हैं । उनको होता है कि कैसे भी करके अपनी प्रसिद्धि हो जाये । ऐसे ही कुछ मलिन मुरादवालों ने सार्इं टेऊँराम का कुप्रचार शुरू कर दिया । कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा, इतना जोर पकड़ा कि कुछ भोलेभाले सज्जन लोगों ने सार्इं टेऊँराम के पास जाना बंद कर दिया । उस वक्त के सज्जनों की यह बड़ी भारी गलती रही । उन्होंने सोचा कि ‘अपना क्या ? जो करेगा सो भरेगा ।’

अरे ! कुप्रचार करनेवाले क्यों कुप्रचार करते ही रहें ? वे बिचारे करें और फिर भरें उससे पहले ही तुम उन्हें आँखें दिखा दो ताकि वे दुष्कर्म करें भी नहीं और भरें भी नहीं । समाज की बरबादी न हो, समाज गुमराह न हो । खैर… सार्इं टेऊँराम की निंदा एवं कुप्रचार ने आखिरकार इतना जोर पकड़ा कि नगर पालिका में एक प्रस्ताव पास किया गया कि सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जो लड़के-लड़कियाँ जायेंगे उनके माता-पिता को पाँच रूपये जुर्माना भरना पड़ेगा । उस वक्त पाँच रूपये की कीमत बहुत थी । ७८ रूपये तोला सोने की कीमत थी तब की यह बात है । सौ रूपये दान करना तो अच्छी बात है लेकिन दंड भरना, यह तो बड़ी लज्जा की बात है । कुछ कमजोर मन के लोग थे उन्होंने तो अपने बेटे-बेटियों को सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाने से रोका । कुछ लड़के-लड़कियाँ तो रुक गये । लेकिन जिनको महापुरुष की कृपा का स्वाद ठीक से समझ में आ गया था वे नहीं रुके । उनकी अंतरात्मा तो मानो कहती हो कि :

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं । हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं ।।

बीड़ी-सिगरेटवाला बीड़ी-सिगरेट नहीं छोड़ता, शराबी शराब नहीं छोड़ता, जुआरी जुआ खेलना नहीं छोड़ता, तो वे समझदार, सत्संगी युवक-युवतियाँ गुरु के द्वार पर जाना कैसे छोड़ देते ? पास करनेवालों ने तो पाँच रूपये का जुर्माना पास कर दिया किन्तु सच्चे भक्तों ने सार्इं टेऊँराम के आश्रम में जाना नहीं छोड़ा । हमारी जिनके प्रति श्रद्धा होती है, उनके लिए हमारे चित्त में सुख की भावना होती है चाहे फिर रामभक्त शबरी हो या कृष्णभक्त मीरा । उनके हृदय में अपने आराध्य के लिए सुख देने की ही भावना थी । सार्इं टेऊँराम के शिष्य भी अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए प्रयत्नशील रहते थे । अपने गुरु के प्रति अपने अहोभाव को प्रदर्शित करने के लिए अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार पत्र-पुष्पादि अर्पित करते थे । इसे देखकर दुष्टजनों के हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न होती थी । अतः उन्होंने कुप्रचार करने के साथ-साथ पाँच रूपये दंड का प्रस्ताव भी पास करवा लिया । कुछ ढीले-ढाले लोग नहीं आते थे, बाकी के सार्इं टेऊँराम के प्यारों ने तो आश्रम जाना जारी ही रखा । ईश्वर के पथ के पथिक इसी प्रकार वीर होते हैं । उनके जीवन में चाहे हजार विघ्न-बाधाएँ आ जायें किन्तु वे अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होते । अनेक अफवाहें एवं निंदाजनक बातें सुनकर भी उनका हृदय गुरुभक्ति से विचलित नहीं होता क्योंकि वे गुरुकृपा के महत्त्व को ठीक से समझते हैं, गुरु के महत्त्व को जानते हैं । अपने सद्गुरु श्री तोतापुरी महाराज में श्री रामकृष्ण परमहंस की अडिग श्रद्धा थी । एक बार किसीने आकर उनसे कहा : ‘‘तोतापुरी महाराज फलानी महिला के घर बैठकर खा रहे हैं । उन्हें आपने गुरु बनाया ?’’

रामकृष्ण : ‘‘अरे ! बकवास मत कर । मेरे गुरुदेव के प्रति एक भी अपशब्द कहा तो ठीक न होगा ।’’ ‘‘किन्तु हम तो आपका भला चाहते हैं । आप तो माँ काली के साथ बात करते थे… इतने महान होकर भी तोतापुरी को गुरु माना ! थोड़ा तो विचार करें । वे तो ऐसे ही हैं । रामकृष्ण बोल पड़े : ‘‘मेरे गुरु कलाल खाने जायें तो भी मेरे गुरु मेरे लिए तो साक्षात् नन्दराय ही हैं ।’’

यह है श्रद्धा । ऐसे लोग तर जाते हैं । बाकी के लोग आधे में ही मर जाते हैं । …तो वे सार्इं टेऊँराम के प्यारे कैसे भी करके पहुँच जाते थे अपने गुरु के द्वार पर । माता-पिता को कहीं बाहर जाना होता तब लड़का-लड़की कहीं भागकर आश्रम न चले जायें यह सोचकर माता-पिता अपने बेटों को खटिया के पाये से बाँध देते और उन्हें बरामदे में रखकर बाहर से ताला लगाकर चले जाते । फिर सत्संग के प्रेमी लड़के क्या करते… खटिया को हिला-डिलाकर तोड़ देते एवं जिस पाये से उनका हाथ बँधा होता उस बँधे पाये के साथ ही सार्इं टेऊँराम के आश्रम पहुँच जाते और सार्इं टेऊँराम से खुलवा लेते । सार्इं टेऊँराम एवं अन्य साधक उनके बंधनों को खोल देते । जब लोगों ने देखा कि ये लोग तो खटिया के पाये समेत आश्रम पहुँच जाते हैं । अब क्या करें ?

उन दुर्बुद्धियों ने फिर एक प्रस्ताव पास कर लिया कि नगर में मरनेवाले पशुओं को लाकर सार्इं टेऊँराम के आश्रम के आसपास डाल दिया जाये । नगरपालिका के लोग मरे हुए ढोरों को वहाँ फेंक जाते । कितना अत्याचार ।

किन्तु सहनशीलता के मूर्तिमंत रूप सार्इं टेऊँराम गह्ने खोदकर नमक डालकर उन पशुओं को गाड़ देते । इसमें उनके शिष्य उन्हें सहाय करते । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में ही अनाज उगाते थे । जब कुप्रचारकों ने देखा कि हमारा यह दाँव भी विफल जा रहा है तो उन्होंने एक नया फरमान जारी करवा दिया कि कोई भी दुकानदार सार्इं टेऊँराम के आश्रम की कोई भी वस्तु न खरीदे अन्यथा उस पर जुर्माना किया जायेगा । जब इतने से भी सार्इं टेऊँराम की समता, सहनशीलता में कोई फर्क नहीं आया एवं उनके साधकों की श्रद्धा यथावत् देखी तो उन नराधमों ने, आश्रम जिस कुँए के जल का उपयोग करता था उसमें केरोसीन (मिट्टी का तेल) डाल दिया । क्या नीचता की पराकाष्ठा है । कितना घोर अत्याचार ! लेकिन सार्इं टेऊँराम भी पक्के थे । संत-महापुरुष कच्ची मिट्टी के थोड़े-ही होते हैं ? भगवान की छाती पर खेलने की उनकी ताकत होती है । कई बार भगवान अपने प्राण को त्यागकर भी भक्तों की, संतों की बात रख लेते हैं, जैसे, भीष्म पितामह के संकल्प को पूरा करने के लिए भगवान ने अपने हथियार न उठाने के प्रण को छोड़ दिया था ।

सार्इं टेऊँराम के कुप्रचार से एक ओर जहाँ कमजोर मनवालों की श्रद्धा डगमगाती वहीं उनके प्यारों का प्रेम उनके प्रति दिन-ब-दिन बढ़ता जाता । सार्इं टेऊँराम अपने आश्रम में एक चबूतरे पर बैठकर सत्संग करते थे । उनके पास अन्य साधु-संत भी आते थे । अतः वह चबूतरा छोटा पड़ता था । यह सोचकर उनके भक्तों ने उस चबूतरे को बड़ा बनवा दिया । बड़े चबूतरे को देखकर उनके विरोधी ईष्र्या से जल उठे एवं वहाँ के तहसीलदार को बुला लाये । उसने आकर कहा कि यह चबूतरा अनधिकृत रूप से बनाया गया है जिसके कारण सड़क छोटी हो गयी है एवं लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है । अतः इस चबूतरे  को तोड़ देना चाहिए । यह कहकर उसने सार्इं टेऊँराम के विरुद्ध मामला दर्ज कर दिया एवं उन्हें अदालत में उपस्थित होने को कहा । किन्तु निश्चित समय पर सार्इं टेऊँराम अदालत में उपस्थित न हुए । दूसरे दिन जब वे स्नान करके तालाब से लौटे तो देखा कि चबूतरा टूटा हुआ है । संत तो सहन कर भी लेते हैं किन्तु प्रकृति से उनका विरोध सहा नहीं जाता । कुछ समय के पश्चात् उस तहसीलदार का स्थानांतरण दूसरी जगह हो गया । उसकी जगह दूसरा तहसीलदार आया वह बड़ा श्रद्धालु और भक्त था । अतः उसने पुनः  वह चबूतरा बनवा दिया । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को अपमानित करने की कोशिश की, लज्जित और बदनाम करने की कोशिश की, उनकी तो कोई दाल नहीं गली । जिन्होंने सार्इं टेऊँराम को निन्दित करने का प्रयास किया, उनका कुप्रचार करके उनकी कीर्ति को कलंकित करने का प्रयास किया । उनमें से किसीका बेटा मर गया तो किसीको लकवा हो गया, कोई पागल हो गया तो कोई पुत्रसुख से वंचित् हो गया और न जाने कितने अशान्ति की आग में जलते रहे । वे आज न जाने किस नरक में होंगे ? लेकिन सार्इं टेऊँराम के पावन यश की सौरभ आज भी चतुर्दिक प्रसारित होकर अनेक दिलों को पावन कर रही है । ऐसे ही संत श्री आशारामजी बापू का यश आनेवाले समय में ऐसा फैलेगा की पूर्व के सभी संतों-महापुरुषों-अवतारों के यश को पीछे छोड़ देगा | पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के भक्तों-साधकों-शिष्यों को जो दिव्य अनुभूतियाँ हुई है उनसे अभी दुनिया बेखबर है, जब वो समाचार मीडिया के द्वारा लोगो के सामने आयेगा, तब लोग दांतों तले उंगलिया दबा देंगे और उनका सिर पूज्य बापूजी के चरणों में आदर से नत-मस्तक हो जायेगा | हरी ॐ

Standard
गौ-माता

गाय का घी


asaram bapu gaushala,गाय ,cow

गौ-माता

गाय का घी

स्वास्थ्य व पर्यावरण सुरक्षा का अमोग उपाय – गाय का घीदेशी गाय का घी शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास एवं रोग-निवारण के साथ पर्यावरण-शुद्धि का एक महत्त्वपूर्ण साधन है |

इसके सेवन से –

१) बल, वीर्य व आयुष्य बढ़ता है, पित्त शांत होता है |

२) स्त्री एवं पुरुष संबंधी अनेक समस्याएँ भी दूर हो जाती है |

३) अम्लपित्त (एसिडिटी) व कब्जियत मिटती है |

४) एक गिलास दूध में एक चम्मच गोघृत और मिश्री मिलाकर पीने से शारीरिक, मानसिक व   दिमागी कमजोरी दूर होती है |

५) युवावस्था दीर्घकाल तक रहती है | काली गाय के घी से वृद्ध व्यक्ति भी युवा समान हो जाता   है |

६) गर्भवती माँ घी – सेवन करे तो गर्भस्थ शिशु बलवान, पुष्ट और बुद्धिमान बनता है |

७) गाय के घी का सेवन ह्रदय को मजबूत बनता है | यह कोलेस्ट्रोल को नहीं बढाता | दही को   मथनी से मथकर बनाये गये मक्खन से बना घी ह्रदयरोगों में भी लाभदायी है |

८) देशी गाय के घी में कैंसर से लड़ने व उसकी रोकथाम की आश्चर्यजनक क्षमता है |

ध्यान दें : घी के अति सेवन से अजीर्ण होता है | प्रतिदिन १० से १५ ग्राम घी पर्याप्त है |

नाक में घी डालने से –

१) मानसिक शांति व मस्तिष्क को शांति मिलती है |
२) स्मरणशक्ति व नेत्रज्योति बढती है |
३) आधासीसी (माइग्रेन) में राहत मिलती है |
४) नाक की खुश्की मिटती है |
५) बाल झड़ना व सफ़ेद होना बंद होकर नये बाल आने लगते हैं |
६) शाम को दोनों नथुनों में २ – २ बूंद गाय का घी डालने तथा रात को नाभि व पैर के तलुओं

में गोघृत लगाकर सोने से गहरी नींद आती है |

मात्रा : ४ से ८ बूंद

गोघृत से करें वातावरण शुद्ध व पवित्र

१) अग्नि में गाय के घी की आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक का सारा    वातावरण प्रदुषण और आण्विक विकिरणों से मुक्त हो जाता है | मात्र १ चम्मच गोघृत की   आहुति देने से एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती है, जो अन्य किसी भी उपाय से संभव   नहीं है |

२) गोघृत और चावल की आहुति देने से कई महत्त्वपूर्ण गैसे जैसे –इथिलिन ऑक्साइड,   प्रोपिलिन ऑक्साइड, फॉर्मलडीहाइड आदि उत्पन्न होती है | इथिलिन ऑक्साइड गैस आजकल   सबसे अधिक प्रयुक्त होनेवाली जीवाणुरोधक गैस है,  जो शल्य – चित्किसा (ऑपरेशन) से   लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी है |

३) मनुष्य-शरीर में पहुँचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता गोघृत   में है |

Standard