विचार विमर्श, संत वाणी, Tatvik Satsang

तात्विक सत्संग (सूरत) : आशारामजी बापू

वो ईश्वर विभु है, चिदघन है, सर्व्याप्त है ! वो सबमें व्याप्त है !

आकाश तो जड़ है, पर ईश्वर चेतन है, वो सब देखते हैं, सब जानते हैं! जहाँ हमारी बुद्धि पंहुच नहीं सकती, वहां भी ईश्वर है ! नौकर में भी वही, मालिक में भी वही, भैंस में भी वही, भैंस के पीछे भागने वाले लड़के में वही, छोटी सी कीड़ी में भी वही ! यहाँ तक कि छोटे से बैक्टीरिया में भी वही वास कर रहा है !

वो सर्व समर्थ हैं, दयालु हैं, सुहृद भी हैं और ज्ञान स्वरुप भी हैं ! फिर भी हम दुखी क्यों रहते हैं ?

अरे दुखी क्यों रहना, पकड़ो उसका पल्ला और पूछो उसको कि मेरा दुःख कैसे मिटेगा, रो पडो उसके सामने और उसको बार बार प्रार्थना करो !

यहाँ वहां दूसरों पर भरोसा करने से बेहतर है, उसी प्रभु पर भरोसा रखो, उसी पर भरोसा करो, फिर देखना वो तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा !

बस अपने जीवन में नियम बना लो, और उस नियम को निभाओ, उसको पूरा करो !

   अजब राग है मुहौब्बत के फ़साने का,जिसको जितना आता है, गाये चला जाता है !

 

 

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