Satsang

मोह का स्वरुप – वेदिक ज्ञान – सत्संग

जब मोह होता है तब असलियत से व्यक्ति वंचित हो जाता है ….. सारे जीव , सारा संसार मोह मे उलझ रहा है ….

पीत्वा मोह मयी मदिरा

संसार भूतो उन्मत्त: ll

संसार ने क्या किया है – मोह मयी मदिरा पी है …. सब उन्मत्त हो गए … सुखी होने के लिए क्या क्या करते …. कितना कितना  साज सजाते …. कितना कितना गिड़गिड़ाते …. क्या क्या करते उस का वर्णन करू तो विषयांतर हो जाएगा … फिर भी बेचारे सुखी नहीं होते , निश्चिंत नहीं होते , निर्भय नहीं होते …. जनम मरण के चक्कर से नहीं छूटते ….

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हिरण्य कश्यपू यूँ नजर घुमाए चारो तरफ और हाथ का संकेत करे तो जहा तक उस की नजर पड़ती वहा तक सारी धरती बिना खेड़े, बिना जोते, बिना बोए फसल से लहेराने लगती ऐसी तपस्या थी ….  समुद्र तट पर निगाहे डाले हिरण्य कश्यपू तो  समुद्र उछले …. ऐसा उछले की वो रत्नाकर जो भी उस के अंदर रत्न है उछाल उछाल कर किनारे रख देता ….  जो अंदर की आत्म ज्योति है उस ज्योति का फायदा तो लेता था तपस्या कर के ; लेकिन   ‘वो ज्योति ही मैं हूँ!’  इस का ज्ञान नहीं था तो ‘मैं हिरण्य कश्यपू हूँ, सर्व श्रेष्ठ राजा भगवान हूँ’   ऐसा मानता था ….

वास्तव में भगवान है जिस की सत्ता से भरण पोषण होता है , जिस की सत्ता से गमन-आगमन होता है , जिस की सत्ता से वाणी उठती है और जिस की सत्ता यह सब न होने के बाद भी ज्यों की त्यों रहेती है ऐसा अच्युत परमात्मा ही भगवान है …

लेकिन ‘मैं भगवान हूँ’ – ये  मोह हो गया था हिरण्य कश्यपू को …

‘मैं लंका पति रावण हूँ’  – ये मोह हो गया था रावण को …. तो देवताओं ने कहा की इन को मोह हो गया … मोह रूपी रावण  अहंकार में आ गया है … और अहंकार से वासनाये , कामनाये , भोग , इच्छाये –बाहर से अंदर सुख भरने की बढ़ती है …और उस में फिर दंभ आ जाता है ….

देखो – अंदर की ज्योति को नहीं जानने से मोह हुआ , मोह से अहंकार हुआ , अहंकार से वासनाओं का ज़ोर बढ़ा – और वासनाओं से दंभ हुआ – फिर वासना पूर्ति में कोई विघ्न आता है तो व्यक्ति हिंसक बन जाता है …. कोई वाणी से हिंसा करता , कोई भाव से हिंसा करता , कोई कैसे …. और फिर हिंसा के बदले हमारी भी हिंसा होती रहेती …. हम खुद भी ठगे जाते है … आखरी में मृत्यु हमारी हिंसा कर देता है … जनमो और मरो….

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