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सदगुरु से क्या सीखें ?

साधक को कुछ अहम् और मुख्य बातें अपने गुरु से जान लेनी चाहिए अथवा गुरु को अपनी ओर से कृपा करके शिष्य को समझा देनी चाहिए। इन महत्वपूर्ण बातों का ज्ञान साधक के जीवन में होगा तो वह उन्नत रहेगा, स्वस्थ रहेगा, सुखी रहेगा, संतुष्ट रहेगा और परम पद को पाने का अधिकारी हो जायेगा।

पहली बात, गुरुजी से संयम की साधना सीख लेनी चाहिए। ब्रह्मचर्य की साधना सीख लो। गुरु जी कहेंगे- “बेटा ! ब्रह्म में विचरण करना ब्रह्मचर्य है। शरीरों को आसक्ति से देखकर अपना वीर्य क्षय किया तो मन, बुद्धि, आयु और निर्णय दुर्बल होते हैं। दृढ़ निश्चय करके ʹૐ अर्यमायै नमः।ʹ का जप कर, जिससे तेरा ब्रह्मचर्य मजबूत हो। ऐसी किताबें न पढ़, ऐसी फिल्में न देख जिनसे विकार पैदा हों। ऐसे लोगों के हाथ से भोजन मत कर, मत खा, जिससे तुम्हारे मन में विकार पैदा हों।”

दूसरी बात गुरु से सीख लो, अहिंसा किसे कहते हैं और हम अहिंसक कैसे बनें ? बोलेः “मन से, वचन से और कर्म से किसी को दुःख न देना ही अहिंसा है। 

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।।

जो दूसरे को ठेस पहुँचाने के लिए बोलता है, उसका हृदय पहले ही खराब हो जाता है। उसकी वाणी पहले की कर्कश हो जाती है। इसलिए भले ही समझाने के लिए रोकें, टोंकें, डाँटें पर मन को शीतल बनाकर, राग, द्वेष या मोह से नहीं। राग, द्वेष और मोह – ये तीनों चीजें आदमी को व्यवहार व परमार्थ से गिरा देती हैं। श्रीकृष्ण का कर्म रागरहित है, द्वेषरहित है, मोहरहित है। अगर मोह होता तो अपेने बेटों को ही सर्वोपरि कर देते। अपने बेटों के लक्षण ठीक नहीं थे तो ऋषियों के द्वारा शाप दिलाकर अपने से पहले उनको भेज दिया, तो मोह नहीं है। गांधारी को मोह था तो इतने बदमाश दुर्योधन को भी वज्रकाय बनाने जा रही थी। गुरु से यह बात जान लें कि हम हिंसा न करें। शरीर से किसी को मारें-काटें नहीं, दुःख न दें। वाणी से किसी को चुभने वाले वचन न कहें और मन से किसी का अहित न सोचें।”

 

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