Satsang

ॐ ॐ ॐ बापू जल्दी बाहर आओ !

ॐ ॐ ॐ बापू जल्दी बाहर आओ !

 

Bapu Ji

इष्ट की लीला का श्रवण करना भी उपासना है। इष्ट का चिंतन करना, इष्ट के लिए रोना, मन ही मन इष्ट के साथ खेलना-ये सभी उपासनाएँ हैं। ऐसा उपासक शरीर की बीमारी के वक्त सोये-सोये भी उपासना कर सकता है। उपासना सोते-सोते भी हो सकती है, लेटे-लेटे भी हो सकती है, हँसते-हँसते भी हो सकती है, रोते-रोते भी हो सकती है। बस, मन इष्टाकार हो जाये।
मेरे इष्ट गुरुदेव थे। मैं नदी पर घूमने जाता तो मन ही मन उनसे बातें करता। मुझे बड़ा मजा आता था। दूसरे किसी देव से प्रत्यक्ष में कभी बात हुई नहीं थी, उसकी लीला देखी नहीं थी लेकिन अपने गुरुदेव पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाह जी भगवान का दर्शन, उनका बोलना-चालना, व्यवहार करना आदि सब मधुर लीलाएँ प्रत्यक्ष में देखने को मिलती थीं, उनसे बातचीत का मौका भी मिला करता था। अतः एकांत में जब अकेला होता तब गुरुदेव के साथ मन ही मन अठखेलियाँ कर लेता। अभी भी कभी-कभी पुराने अभ्यास के मुताबिक घूमते-फिरते अपने साँईं से बातें कर लेता हूँ, प्यार कर लेता हूँ।

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