संत वाणी

वास्तविक उद्देश्य क्या है ?

                                   वास्तविक उद्देश्य क्या है ?

जो चैतन्य सबके रोम-रोम में बस रहा है वह राम…… जो चैतन्य सबको आकर्षित कर रहा है वह कृष्ण…. उस चैतन्य में अगर मन लग जाये तो बेड़ा पार है। जहाँ से हमारी संवित उठती है वही सारे विश्व का आधार है। वही तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा तुम्हारे अति निकट है और सदा रहता है। पत्नी का साथ छोड़ना पड़ेगा, पति का साथ छोड़ना पड़ेगा, साहब का साथ छोड़ना पड़ेगा, अरे लाला ! इस शरीर का भी साथ छोड़ना पड़ेगा लेकिन उस अन्तर्यामी साथी का साथ कभी नहीं छोड़ना पड़ेगा। बस, अभी से उसी में आ जाना है, और क्या करना है ? यह कोई बड़ा काम है ? जिसका कभी साथ नहीं छूटता है उसमें राग करना है। जिसका साथ टिकता नहीं है उससे राग हटा देना है।
साथ टिकेगा नहीं उस चीज से अपना राग हटा लेंगे तो तुम स्वतन्त्र हो जाओगे। अगर साथ न टिकने वाली चीजों में राग रहा तो कितना दुःख होगा ! दुःख ही होगा, और क्या होगा ?
हम उसी से सम्बन्ध जोड़ रहे हैं जिससे आखिर तोड़ना है। जिससे सम्बन्ध तोड़ना है उसके साथ तो प्रारब्धवेग से सम्बन्ध होता रहेगा, आता रहेगा, जाता रहेगा….. लेकिन जिससे सम्बन्ध कभी नहीं टूटता उसकी केवल स्मृति रखनी है, सम्बन्ध जोड़ने का परिश्रम भी नहीं करना है। दुनिया के अन्य तमाम सम्बन्धों को जोड़ने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
कलेक्टर की कुर्सी के लिए सम्बन्ध जोड़ना है तो बचपन से पढ़ाई करते-करते…. मजदूरी करते-करते…. परीक्षाओं में पास होते-होते आखिर आई.ए.एस. हो गये। फिर कलेक्टर पद पर नियुक्ति हुई तब कुर्सी से सम्बन्ध जुड़ा। कभी एक जिले में तो कभी दूसरे जिले में बदली होती रही….. आखिर बुढ़ापे में साहब बेचारा देखता ही रह जाता है। जवानी में तो हुकूमत चलाई लेकिन अब छोरे कहना नहीं मानते। इससे तो हे भगवान ! मर जाएँ तो अच्छा।
अरे ! तू मरने के लिए जन्मा था कि मुक्त होने के लिए जन्मा था ?
तुम पैदा हुए थे मुक्त होने के लिए। तुम पैदा हुए थे अमर आत्मेदव को पाने के लिए।
“पढ़ते क्यों हो ?”
“पास होने के लिए।”
“पास क्यों होना है ?!”
“प्रमाणपत्र पाने के लिए।”
“प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?”
“नौकरी के लिए।”
“नौकरी क्यों चाहिए ?”
“पैसे कमाने के लिए।”
“पैसे क्यों चाहते हो ?”
“खाने के लिए।”
“खाने क्यों चाहते हो ?”
“जीने के लिए।”
“जीना क्यों चाहते हो ?”
“…………….”
कोई जवाब नही। कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः “मरने के लिए।” अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है। मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए। मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है।

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