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अष्टावक्र गीता सार

 

अष्टावक्र गीता का आरम्भ मुमुक्षु राजा जनक द्वारा पूछे गए तीन प्रश्नों से होता हैं कि ज्ञान कैसे होता हैं? मुक्ति कैसे होती हैं? तथा वैराग्य कैसे होता हैं? सम्पूर्ण अध्यात्म का सार इन तीन प्रश्नों में समाहित हैं। आध्यात्मिक उपलब्धि में वैराग्य का होना अथवा आसक्ति-त्याग पहली शर्त हैं। इससे होता हैं आत्मज्ञान और आत्मज्ञान से ही मुक्ति होती हैं जो जीव की सर्वोपरि स्थिति हैं। जनक के तीन प्रश्नों का समाधान अष्टावक्र ने तीन वाक्यों में कर दिया तथा उपदेश सुनते-सुनते ही जनक को वही आत्मानुभूति हो गई।

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कैसा अनूठा वक्तव्य रहा होगा व जनक की कितनी पात्रता रही होगी इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता हैं। सत्य पर इतना शुद्धतम वक्तव्य आज तक कोई नहीं दे पाया। यदि इसे अध्यात्म से निकाल दिया जाए तो आत्म-ज्ञानी को उस पूर्ण की उपलब्धि पर कैसे अनुभव होता हैं यह जानना ही कठिन हो जायेगा। वेद, पुराण, उपनिषद भी इसके सामने फीके नज़र आते हैं। भगवान श्री कृष्ण की गीता का पात्र अर्जुन विभिन्न प्रकार की मानसिक समस्याओं में उलझा हैं। उसकी न ज्ञान प्राप्ति की इच्छा हैं न ही उसमे कर्त्तव्य बोध हैं। वह क्षत्रिय हैं, युद्धक्षेत्र में खड़ा हैं, आतताइयों की चुनौतियाँ उसके सामने हैं किन्तु वह अपने कर्त्तव्य कर्म से भागना चाहता हैं, झूठी तर्क संगति देता हैं। कभी पाप-पुण्य की, कभी स्वर्ग-नरक की, कभी सन्यासी की बातें करता हैं किन्तु न उसमें कर्त्तव्य बोध हैं न ही गुरु के प्रति निष्ठा। भगवान कृष्ण उसे सभी प्रकार के अध्यात्मिक पक्षों को समझाते हुए कर्त्तव्य बोध कराते हैं किन्तु अर्जुन अधिक प्रज्ञावान न होने के कारण वह हर समाधान पर नए-नए तर्क देता हैं। उसके ऐसी भ्रमित बुद्धि को देखकर कृष्ण ने जब अपने सारे प्रयत्न निष्फल होते देखे तो वे उसे अपना विराट स्वरुप का दर्शन कराते हैं तब अर्जुन को कृष्ण के व्यक्तित्व का पता चलता हैं तो वह समर्पण के साथ ही उस दिव्य वाणी का ग्राहक बन जाता हैं जिससे वह उस युद्ध को जीत सका। राजा जनक अर्जुन से कहीं अधिक नम्र, शुद्ध-चित, मुमुक्षु, प्रतिभासंपन्न और गुरु में पूर्ण श्रद्धा रखते थे। उन्होंने एक भी शंका नहीं उठाई, न झूठे तर्क दिए। गुरु के कहते ही समर्पित हो गए। यह समर्पण ही द्वार बन गया जिससे गुरु का ज्ञान उनमें प्रवेश कर गया। और पूर्ण बोध से ही घटना घाट गई। आत्म-ज्ञान में समस्या ज्ञान की नहीं, उलझे मन की हैं। मन की सफाई में ही सारा समय लग जाता हैं व् फिर भी वह व्यक्ति रीता ही रह जाता हैं। शुद्ध और स्वच्छ मन इसकी अनिवार्य शर्त हैं। कोई इसे पूरी मात्र कर दे तो गुरु का प्रसाद तत्काल ही उपलब्ध हो जाता हैं। इसमें एक क्षण का भी विलम्ब नहीं होता। राजा जनक जैसी पात्रता होने पर हर व्यक्ति को ऐसी घटना घट सकती हैं। इसमें धर्म, संप्रदाय, जाति, काल कोई बाधा नहीं हैं। यदि कोई इसे गंभीरता से हृदयगम कर ले तो आत्मबोध की झलक मिल सकती हैं। कहते हैं कि विवेकानंद जी जब रामकृष्ण परमहंस जी के पास गए व परमात्मा का प्रमाण पूछा तो रामकृष्ण परमहंस जी ने उन्हें अष्टावक्र गीता पढ़ने को दी कि तुम इसे पढ़कर सुनाओं। मेरी दृष्टि कमजोर हैं। कहते हैं विवेकानंद जी इस पुस्तक को पढ़ते पढ़ते ही ध्यानस्थ हो गए व उनके जीवन में क्रांति घट गई।

अध्यात्मिक क्रांति बोध से आती हैं। अन्य क्रियाएँ कही काम नहीं आती। अष्टावक्र जी ने कहा हैं- “चर्मकार चमड़ी को देखता हैं और ज्ञानी आत्मा को। आत्मा को देखने की क्षमता आना ही पात्रता हैं। जिससे आत्मज्ञान संभव हैं।” जनक ऐसे ही प्रज्ञावान थे जिनको थोड़े ही प्रयास से आत्म-बोध हो गया। पूर्व जन्म की पात्रता रही होगी तथा इस जन्म की मुमुक्षा। इन दोनों कारणों के उपस्थित होने से ही घटना शीघ्र घट गई। सौ अंश ताप पर पानी खौलता हैं। जिसको निन्यानवें अंश ताप पूर्व जन्म में ही मिल चूका हैं वह केवल एक अंश ताप मिलते ही खौल उठता हैं किन्तु पूर्व जन्म में जिसे दस अंश ताप ही मिला हैं उसे नब्बे अंश की आवश्यकता पड़ती हैं। उपलब्धि में समय की भिन्नता का यही कारण हैं। फिर मनुष्य भी चार प्रकार के होते हैं- ज्ञानी, मुमुक्षु, अज्ञानी और मूढ़।

ज्ञानी वह हैं जिसे ज्ञान प्राप्त हो चूका हैं, मुमुक्षु वह हैं जो ज्ञान प्राप्ति के लिए लालायित हैं, उसे हर कीमत पर प्राप्त करना चाहता हैं, अज्ञानी वह हैं जिसे शास्त्रों का ज्ञान तो हैं किन्तु उपलब्धि के प्रति कोई रूचि नहीं रखता तथा मूढ़ वह हैं जिसे इस अध्यात्म जगत का भी कुछ पता नहीं हैं, न जानना ही नहीं चाहता हैं। वह पशुओं की भाँति अपनी शारीरिक क्रियाओं को पूर्ण मात्र कर लेता हैं। वह शरीर में ही जीता हैं। इनमें मूढ़ से अज्ञानी श्रेष्ठ हैं, अज्ञानी से मुमुक्षु श्रेष्ठ हैं। ज्ञानी सर्वोत्तम स्थिति में हैं।

कुछ चीजों का अस्तित्व हैं किन्तु उनके प्रमाण नहीं दिए जा सकते। जो आँखों से देखने की हैं, जिसका स्वयं अनुभव किया जा सकता हैं उनको प्रमाणों से सिद्ध करना असंभव हैं। अंधे को सूर्य को प्रमाणित करके नहीं समझाया जा सकता। उसे रंगों का ज्ञान नहीं करवाया जा सकता। प्रेम, आनंद, करुणा, दया, दर्द, पीड़ा को नहीं दिखाया जा सकता हैं न उन्हें प्रमाणित किया जा सकता हैं। वे स्वयं के ही अनुभव में ही आती हैं। बुद्धि की एक सीमा हैं जहाँ तक ही यह निर्णय ले सकती हैं। आत्मा, परमात्मा, ब्रम्ह आदि उसकी पकड़ से बाहर हैं। ये इन्द्रियों के विषय नहीं हैं। इन्द्रियाँ स्थूल को पकड़ सकती हैं, सुक्ष्म छुट जाता हैं। सूक्ष्म को पकड़ने की विद्या दूसरी ही हैं। जिसका उपयोग करने पर सूक्ष्म ही ग्राह्य हो जाता हैं। ये विद्या ध्यान व समाधि की हैं। जिसमें व्यक्ति स्थूल जगत के पार सूक्ष्म के भी दर्शन कर सकता हैं, उसका आभास या बोध प्राप्त कर सकता हैं। स्थूल सूक्ष्म का ही रूपांतरण हैं। यदि सूक्ष्म जगत नहीं हैं तो स्थूल की उत्पत्ति भी असंभव हो जाती। अज्ञानी स्थूल को ही पकड़ पाते हैं व ज्ञानी इस सूक्ष्म को भी पकड़ लेते हैं। अध्यात्म इसी सूक्ष्म को पकड़ने का विज्ञान हैं। इसकी कुछ शर्तें हैं जिन्हें पूरा किये बिना सूक्ष्म का ज्ञान नहीं हो सकता। आत्मज्ञान के लिए निर्विकार चित्त व साक्षी भाव चाहिए। महर्षि पतंजलि ने कहा हैं कि “योगश्चित्तवृतिनिरोधः” अर्थात चित्त की वृतियों का निरोध ही योग हैं। इन चित्त की वृतियों को रोकने की भिन्न भिन्न विधियाँ हैं किन्तु उच्च बोध होने पर इन विधियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान बुद्ध ने भी कहा हैं कि “जो समझ सकते हैं उन्हें मैंने बोध दिया हैं व नासमझों को मैंने विधियाँ दी हैं।” नासमझों के लिए बोध काम नहीं करेगा, उनके लिए विधियाँ ही ठीक हैं। राजा जनक में बोध था, विद्वान् थे, समझ थी अतः अष्टावक्र जी ने उन्हें कोई विधियाँ नहीं बताई। न यम-नियम साधने को कहा, न आसन, मुद्रा, प्राणायाम बताये, न जप, तप के लिए कहा, न गायत्री पुरश्चरण करवाया, न पूजा पाठ की शिक्षा दी। सीधे बोध को छुआ और जनक जाग उठे। यह जनक का कौशल्य था कि जिससे सुनते-सनते ही आत्मज्ञान हो गया और कुछ करना ही नहीं पड़ा। गुरु ने भी उपयुक्त पात्र देखकर अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग किया होगा तभी यह संभव हुआ।

अष्टावक्र जी का ज्ञान प्राप्ति हेतु मात्र उपदेश इतना ही था कि आत्मज्ञान के लिए कुछ करना नहीं हैं। क्रिया मात्र बंधन हैं। क्रिया के साथ फल की आकांक्षा सदा लगी रहती हैं, इनके साथ अपेक्षाएँ जुड़ी रहती हैं। हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती हैं व उसका निश्चित फल अवश्य मिलता हैं। यही मुक्ति में बाधा बन जाती हैं। अष्टावक्र जी ने समाधि का अनुष्ठान भी बाधक बताया हैं। अष्टावक्र जी का सारा उपदेश बोध का हैं,जागरण हैं। मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार में जीता हैं। इन्ही से उसे सुख दुःख का अनुभव होता हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, आदि इन्ही से जुड़े हैं। इन्ही के कारण वह भोगों में रूचि लेता हैं। जीवन समस्या नहीं हैं किन्तु मनुष्य के गलत दृष्टिकोण ने ही उसे समस्या बना दिया हैं। जैसे मकड़ी ही स्वयं जाला बुनती हैं व स्वयं उसमें फंस जाती हैं। कोई दूसरा उसका कारण नहीं हैं। ऐसी ही स्थिति मनुष्य की हैं कि ये सभी बंधन उसने स्वयं ने निर्मित किये हैं व स्वयं ही उसमें उलझ कर रह गया हैं। किन्तु मनुष्य न शरीर हैं, न मन, न बुद्धि, न अहंकार। वह शुद्ध चैतन्य मात्र हैं। शरीरस्थ यह चैतन्य ही आत्मा हैं व विश्व की समस्त आत्माओं का एकतत्त्व भाव ही ब्रम्ह हैं। दोनों अभिन्न हैं। यह चैतन्य न कर्ता हैं, न भोक्ता हैं, न इसका कोई बन्ध हैं, न मोक्ष। यह सबका साक्षी, निर्विकार, निरंजन, क्रियारहित व स्वयं प्रकाश हैं। यह समस्त श्रृष्टि में व्याप्त हैं व समस्त श्रृष्टि इसमें व्याप्त हैं। श्रृष्टि का आधार ही यह चैतन्य हैं। श्रृष्टि इसी चैतन्य की अभिव्यक्ति मात्र हैं। श्रृष्टि अनित्य हैं, और यह चैतन्य शाश्वत व नित्य हैं। यही मूल तत्त्व हैं। श्रृष्टि इसी के सृजन का परिणाम हैं। ऐसे चैतन्य का बोध हो जाना ही मुक्ति हैं। इस मुक्ति के लिए अष्टावक्र जी कहते हैं “इन सांसारिक विषयों के प्रति जो तुम्हारी आसक्ति हैं उसे विष के समान छोड़ दे तथा स्वयं को यही शुद्ध चैतन्य आत्मा मान कर उसमें निष्ठापूर्वक स्थित हो जा। यही हैं वैराग्य, ज्ञान व मुक्ति का रहस्य” सारे अध्यात्म का रहस्य मात्र तीन सूत्र में खोल कर रख दिया। यह गुरु की महत्ता हैं व शिष्य की पात्रता कि उसे जनक ने उसी क्षण ग्रहण कर लिया। न कोई तर्क दिया, न शंका प्रकट की, न अविश्वास, न अपनी बुद्धि व शास्त्रीय ज्ञान को बीच में अड़ाया। पूर्ण श्रद्धा से इन वाक्यों को अमृत के सामान पी गये। इस कथन के बाद अष्टावक्र जी मन, अहंकार, शरीर, चैतन्य, आत्मा थोड़ी सी व्याख्या मात्र देते हैं जिससे ये तथ्य जनक को सुपाच्य हो जाय। इतने कम श्रम से जनक को पूर्ण आत्म बोध हो गया तथा वे उसकी अभिव्यक्ति देने लगे। अष्टावक्र जी को विश्वास तो हो गया कि इसे आत्म बोध तो हो चूका हैं किन्तु उसे और दृढ़तर बनाने के लिए जनक की परीक्षा हेतु अनेक प्रश्न करते हैं। जनक इस परीक्षा में सौ प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण होते हैं। कितने अद्भुत व्यक्ति रहे होगे जनक।

कहते हैं राई की ओट में पर्वत छिपा होता हैं किन्तु उस राई की ओट को भी कोई सदगुरु ही हटा सकते हैं। यह पर्दा आत्मा पर नहीं, हमारी आँख पर पड़ा हैं। आत्मा तो निर्वस्त्र हैं, प्रत्यक्ष हैं, सामने हैं। बस देखने की क्षमता मात्र आनी चाहिए। सदगुरु दृष्टि या बोध देकर उसे अनावृत करते हैं। शिष्य के लिए ज्ञान के लिए गुरु की उपस्थिति मात्र प्रयाप्त हैं, जिससे बोध की घटना घटती हैं। मीरा, कबीर, रमण महर्षि, संत ज्ञानेश्वर, विवेकानंद, भर्तृहरि आदि अनेकों उदहारण हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि आत्मज्ञान में गुरु की अनिवार्यता हैं। इसीलिए आध्यात्मिक उपलब्धि में गुरु का महत्व सर्वोपरि हैं। गुरु ईश्वर का ही प्रतिरूप हैं, वही ईश्वर का साकार अवतार हैं, उनकी महिमा ईश्वर से किसी प्रकार कम नहीं हैं। ईश्वर भी गुरु के माध्यम से ही सहायता करते हैं। ज्ञानार्थी को गुरु ही मार्ग दिखाता हैं किन्तु आत्मज्ञान स्वयं की पात्रता के बिना नहीं होती

दोनों जहाँ दोनों मिल जाते हैं वही लोहा पारस के संपर्क से स्वर्ण बन जाता हैं। शिष्य की पात्रता के लिए आवश्यक हैं उसकी मुमुक्षा, प्रखर प्रज्ञा, श्रद्धा, समर्पण भाव, नम्रता एवं पूर्व जन्म में अर्जित ज्ञान।

योग वशिष्ठ में कहा हैं, “शिष्य की विशुद्ध प्रज्ञा ही तत्त्व साक्षात्कार का कारण हैं।” महर्षि विश्वामित्र ने भी कहा हैं कि “गुरु वाक्य से जो तत्त्व ज्ञान प्राप्त होता हैं उसका कारण शिष्य की प्रज्ञा ही हैं।” ऐसी प्रज्ञा अनेक जन्मों के सुकृत्यों के फल से प्राप्त होती हैं। जीवन एक नहीं बल्कि अनेकों जन्मों की श्रंखला में एक कड़ी हैं। वर्तमान जीवन पूर्व जन्म की भिति पर खड़ा हैं तथा भविष्य का निर्धारण करने वाला हैं। जीवन में किया गया हर कृत्य अगले जीवन पर छाप छोड़ता हैं। ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा भी पूर्व जन्म के संस्कारों के बिना नहीं होती। जब संस्कार तीव्र हो जाते हैं तब व्यक्ति सदगुरु की कृपा का प्रसाद अनायास ही प्राप्त कर लेता हैं। जैसा जनक के साथ हुआ वैसा सबके साथ हो सकता हैं यही पात्रता की शर्त पूरी कर दी जाए।

इसलिए कहा गया हैं:-

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“गुरुर्ब्रम्हा: गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नमः।।”

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