विवेक जागृति

बूढ़े बैल को देख के राजा का विवेक जग गया !

 

 

वास्तविक विवेक

परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू

अपने जीवन में विवेक लाइये । विवेकहीन जीवन तो जीवन ही नहीं । विवेकहीन व्यक्ति को कदम-कदम पर दुःख सहने पड़ते हैं । लोग कहते हैं: “हमने विवेक से ही अपना जीवन बनाया है । देखिए, हम इंजीनियर बन गये… डॉक्टर बन गये… हम अमुक फैक्टरियों के मालिक बन गये… हम इतने बड़े कार्यभार सँभालते हैं… हम इतनी ऊँची सत्ता पर, ऊँचे पद पर पहुँच गये हैं… इतने लोग हमें सम्मान देते हैं ।”

अरे नहीं… यह विवेक नहीं ।

व्यापार करना, धन कमाना, अपने शरीर की वाहवाही कराना, भवन बनवाना आदि सब तो सामान्य विवेक है । इंजीनियर बनकर मकान बना दिया… यूँ तो चिड़िया भी अपना मकान बनाकर रहती है । जीवविज्ञान पढ़कर डॉक्टर बन गये और पार्थिव शरीर का कोई रोग मिटा दिया… यह सब सामान्य विवेक है ।

विवेक क्या है ?

विवेक का अर्थ है: सत्य क्या है, मिथ्या क्या है, शाश्वत क्या है, नश्वर क्या है यह बात ठीक से समझकर अपने जीवन में ढाल लें । एक्मात्र परमात्मा सत्य है । शेष सब जो कुछ भी है सो पुत्र, परिवार, भवन, दुकान, मित्र, सम्बन्धी, अपने, पराये आदि सब अनित्य हैं । एक दिन इन सबको छोड़कर जाना पड़ेगा । इस शरीर के साथ ही समस्त सम्बन्ध, निन्दा-प्रतिष्ठा, अमीरी-गरीबी, बीमारी-तन्दुरुस्ती यह सब जलकर खाक हो जायेगी । तब मित्र, पति, पत्नी, बालक, व्यापार-धंधे, लोगों की खुशामद आदि कोई भी मृत्यु से बचा नहीं पायेंगे । अतः उन्हें ही सँभालने, प्रसन्न रखने में संलग्न रहना यह विवेक नहीं है ।

भगवान राम के गुरु महर्षि वशिष्ठ कहते हैं: “हे रामजी ! चांडाल के घर की भिक्षा खाकर भी यदि सत्संग मिलता हो और उससे शाश्वत- नश्वर का विवेक जागता हो तो यह सत्संग नहीं छोड़ना चाहिए ।”

वशिष्ठजी का कथन कितना मार्मिक है ! क्योंकि ऎसा सत्संग हमें अपने शाश्वत स्वरुप की ओर ले जायेगा जबकि संसार के अन्य व्यवहार चाहे जैसी भी उपलब्धि करायें, अंत में मृत्यु के मुख में ले जायेंगे ।

 

 

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