कथा अमृत, दर्शन ध्यान, विचार विमर्श, विवेक जागृति, संत वाणी, सनातन संस्कृति, Bapuji, Biography, Darshan, Dharm Raksha Manch, Guru-Bhakti, GURUDARSHAN, Indian Culture, Innocent Saint

राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज

गोस्वामी तुलसीदास का जन्म- 1532 ई. में हुआ था । तुलसीदास एक साथ कवि, भक्त तथा समाज सुधारक तीनों रूपों में मान्य है।

इनकी राम भक्ती अटूट थी । इन्हें प्रत्यक्ष भगवान श्री हनुमानजी और उनके प्रभु श्री राम जी के दर्शन हुए थे, साथ ही साथ इन्हें श्री हनुमानजी की कृपा से अपनी आँखों से श्री राम लीला जो त्रेतायुग में घटी थी वो देखने को मिली थी | इन्होंने प्रभु श्री राम जी के दर्शन और उनकी करुणा से त्रेतायुग में घटी एक एक घटना को अपनी आँखों से देखा था ।

भगवान शंकर और माता पार्वति का भी इन पर बहुत अनुग्रह था | भगवान शंकर ने आदशक्ति माँ पार्वती जी के साथ प्रगट होकर इन्हें श्रीरामचरित्रमानस लिखने की आज्ञा की थी ।

इन्हें भगवान वेदव्यास का अंशअवतार भी माना जाता है । कहते हैं अपने शास्त्रों को सरल रीती से समाज को समझाने के लिए इनका जन्म हुआ था ।चित्रकूट के घाट पर इन्हें प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए थे । वो कथा भी बडी रोचक है । इनके द्वारा विरचित भगवान श्री राम को समर्पित श्रीरामचरितमानस को समस्त भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है।

तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। पैदा होते ही इनके चेहरे पर अनुपम तेज था । कहा जाता है की इनके जन्मजात ही दाँत और आँखों में विशेष प्रकार की चमक भी थी । इनके इस रूप को देखकर सभी थोडा घबरा भी रहे थे पर इनके पिता राजपुर के नामचिन ज्योतिष भी थे । जब उन्होंने इनकी कुंडली बनाई तो देखा की इनके जीवन में बचपन से ही मातृ-पितृ स्नेह नहीं है अर्थात इनके जन्म से कुछ समय पश्चात ही इनके माता पिता का देहांत हो गया था । बचपन में बडे दुख से समय इनका कटा । इनकी ऐसी दशा और प्रकाशमय मुख को देखकर इनके गुरु को इन्हें समझते देर ना लगी । भगवान श्री रामानंद संप्रदाय के सदगुरुदेव बाबा श्री नरहरीदास जी इन्हें अपने आश्रम ले आये और वहीें इन्हें संस्कृत का ज्ञान भी देने लगे | साथ ही साथ श्री राम चरीत्र रामायण का भी पाठ करवाने लगे ।

गोस्वामी जी अपने गुरुदेव के बारे में लिखते हैं कि भगवान जब कलम लेकर भाग्य लिख रहे थे तब सभी मानव नंबर से भगवान से भाग्य अपने माथे पर लिखवा रहे थे जब मेरा नंबर आया तो भगवान की कलम में स्याही खत्म हो गयी तो भगवान ने मेरा भाग्य कोरा ही छोड दिया | मेरे नसीब में तो कुछ ना था पर मेरे गुरुदेव स्वामी को दया आ गयी । एक दिन कलम लेकर बैठे थे कुछ लिखने को कागज न था तो मेरा कोरा मस्तक देखकर उन्होने मेरा भाग्य लिख डाला । कैसी अन्न्य गुरुप्रेम था गोस्वामी जी में ।

गोस्वामी जी की युवा अवस्था आने पर उनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्यधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार सुननी पड़ी ।

हाड माँस की देह मम, ता में इतनी प्रीती ।

याते आधी राम में, तो कबहु ना लगे भवभीती ।।

“लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ”

इस फटकार के बाद से जैसे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता ।

पत्नी परिवार सब छोडकर ये चित्रकूट चले गये | वहाँ कई दिनों तक उपवास करते रहे और राम नाम का अविरत जाप करते रहे । भगवान राम के दर्शन की इन्हें अनुपम लालसा थी | वहाँ ये प्रतिदिन एक वृक्ष पर एक लोटा पानी डालते थे | अचानक एक दिन इनकी राम भक्ति और इनके हाथों के स्पर्श जल से उस वृक्ष में स्थित प्रेत कि मुक्ती हो गयी | जाते समय उसने इन्हें कुछ देना चाहा पर तुलसी दास जी ने उस प्रेत से केवल श्री राम दरश की आश ही व्यक्त की | तब उसने कहा की हम अधोगती मे रहने वाले जीव उस परमेश्वर को देख नहीं पाते पर श्री हनुमानजी यहीँ इसी धरा पर घूमते रहते हैं । जहाँ भी श्रीराम कथा होती है वहाँ वे अवश्य जाते हैं । आप इसी चित्रकुट में राम कथा में जायें वहाँ जो सबसे पीछे कोढी के रूप में बैठते हैं वो श्री हनुमानजी ही हैं | आप श्रद्धा भक्ति से उनकी शरण जाइये और उनके चरणों को तब तक ना छोडियेगा जब तक वो अपने दर्शन आपको ना दें । ऐसा ही हुआ, गोस्वामी जी ने रामकथा में छिपे श्री हनुमानजी को पहचान लिया और उनका अनुपम दर्शन प्राप्त किया । श्री हनुमानजी से इन्होंने प्रभु श्रीराम के दर्शन की आशा व्यक्त की | तब श्री हनुमानजी ने इन्हें चित्रकुट के घाट पर चंदन घिसने को कहा और कहा, “प्रभु से मैं प्रार्थना करूँगा, वहाँ प्रभु जरूर आयेंगे । आप उन्हें पहचान लेना ।” तुलसी दास जी भी चित्रकुट के घाट पर चंदन घिसने का कार्य करने लगे | एक दिन प्रभु वहाँ पधारे और चंदन लगाने को माँगा तब तुलसी दास जी महाराज कहीं चूक ना जायें इस लिए हनुमानजी ने एक तोते के रूप में ये चौपाई गानी शुरु की ।

चित्रकुट के घाट पर भयी संतन की भीड, तुलसी दास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर ।

Shri Ram Hanuman

प्रभु को पहचानकर उनके चरणों में गिरे ये भक्तराज और प्रभु श्री राम ने इन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये । प्रभु के चरित्र दर्शन की आशा व्यक्त करने पर प्रभु ने इन्हें त्रेता में घटे पूरे रामायण चरित्र का प्रत्यक्ष दर्शन कराया । इन्होंने समाज के बहुत विरोध के बावजूद भी श्री रामायण जी की रचना की और प्रभु का चरित्र लिखा । पर वो संस्कृत में होने के कारण प्रभु ने इन्हें उसे सरल भाषा में अनुवादित करने की आज्ञा दी । भगवान शंकर और माता पार्वति ने भी इन्हें दर्शन देकर प्रभु का चरित्र लिखने में सहायता की और आशिर्वाद भी दिया । इन्होंने फिर सरल भाषा में प्रभु श्रीराम का चरित्र श्री रामचरित्र मानस का ग्रंथ लिखा जो समाज में आज भी अति लोकप्रिय है । कहते है जब इन्होंने रामायण की चौपाईयाँ गाकर लोगों को सुनाना प्रारंभ किया तो इनके पास भीड बढने लगी । इससे दुखी होकर काशी के विद्वानों ने इनके द्वारा रचित ग्रंथ रामायण जी की निंदा शुरु कर दी । विरोध इस कदर बढा के लोगों ने इनसे प्रमाण मांगना प्रारंभ कर दिया | इनके द्वारा रचित रामचरित्र मानस को काशी विश्वनाथ के मंदिर में रखा गया । प्रातः जब पट खोले गये तब उस पर प्रभु भगवान शंकर के हस्ताक्षर और उस ग्रंथ के चारों और अनुपम प्रकाश तेजोवलय पाया गया । उस ग्रंथ पर प्रभु भगवान शंकर के हस्ताक्षर में सत्यं शिवं सुंदरम लिखा था जिसे देखकर तब से तुलसी दास जी महाराज को सब बडी श्रद्धा से मानने लगे ।

इनकी प्रसिद्धी उस समय के मुगल बादशाहों से बर्दाश्त नहीं हुई और इन संत को बिना किसी कारण के सताने का प्रयास किया | कहते हैं तुलसी दास जी के जीवन में कई चमत्कार घटे | जब इन्हें मुगल बादशाह के आदेश पर मुगल सैनिक पकडने आये तो चमत्कार के रूप में इन्होंने भगवान शंकर के नंदी के सामने प्रसाद रखा तो नंदी की मुर्ती ने जीभ निकालकर उस प्रसाद को ग्रहण किया पर इतने पर भी मुगल बादशाह का इन पर विश्वास न हुआ तो इनको पकडकर जेल में डाल दिया गया और चमत्कार दिखाने को कहा गया | तुलसी दास जी ने कहा हम तो साधारण मेरे प्रभु राम के सेवक हैं पर जब बादशाह न माना तो तुलसी दास जी ने उपवास के साथ रामनाम जप प्रारंभ कर दिया | 24 घंटे के अंदर मुगल सल्तनत में हजारों वानरों की सैना घुस आयी और वहाँ उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया | आखिरकार मुगल बादशाह को इनहें बाईज्जत छोडना पडा । इन पर भी लांछन लगाने में समाज के लोगों ने कोई कमी न छोडी थी | सच्चे संतों को हयाती काल में पहचान पाना बडा मुश्किल होता है । पर उनके चले जाने के बाद समाज उनका गुणगान करता रहता है ।

प्रभु धाम गमन 

तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात् असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। संवत्‌ 1680 में श्रावण कृष्ण सप्तमी शनिवार को तुलसीदास जी ने “राम-राम” कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया और भगवान में विलीन हो गये । आज उनके द्वारा प्रभु श्री राम का चरित्र हम सबके दिलों में हैं और ऐसे संतों का महान योगदान भारत को, भारतीय संस्कृति को बचाये रखना और समाज तक पहुँचाना ये महान कार्य था । समाज को भक्ति रस में सराबोर कर दिया गोस्वामी जी ने । समाज को ईश्वर शक्ति का विश्वास दिलाया गोस्वामी जी ने । समाज में छुपि कूरितियों को हटाकर सत्य मार्ग दिखाया गोस्वामी जी ने ।

आज भले ही गोस्वामी तुलसीदास जी हमारे बीच नहीं है पर उनके द्वारा विरचित ग्रंथों ने हमारे हृदय और हमारे घरों में अपना स्थान बनाया हुआ है ।

ऐसे सच्चे महापुरुष कभी कभी धरती पर आते हैं उन्हें पहचानने के लिए केवल आँखें नहीं वो नजर भी चाहिए जिससे उन्हें पहचाना जा सके ।

संवत सोलह सौ असी ,असी गंग के तीर ।

श्रावण शुक्ला सप्तमी ,तुलसी तज्यो शरीर ।

आज संत आशारामजी बापू जैसे संतों को भी जेल में रखकर सताया जा रहा है | कहीं हम देश के एक महान संत को पहचानने में भूल तो नहीं कर रहे । ऐसे महापुरुषों को हयाती काल में तो सताती है दुनिया पर उनके चले जाने पर सोने चाँदी की मुर्ति बनाती है दूनिया । उनके बनाये ग्रंथों पर पीएचडी तो कर सकते हो आप पर संत तुलसी दास कहाँ से पाओगे ? कहाँ से पाओगे आज ?

जरूरी है संतों महापुरुषों के रहते हुए उनको पहचानकर अपना आत्म कल्याण करना । जो विरले ही कर पाते हैं ।

 

Advertisements
Standard

Your Opinion

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s