कीर्तन

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी

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जन्माष्टमी

यह बड़ा ही रहस्य भरा महोत्सव है। समाज के पहले से लेकर आखिरी व्यक्ति तक का ध्यान रखते हुए उसके उत्थान के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों को अपनाते हुए, इन्सान की आवश्यकताओं व महत्ता को समझाकर उसके विकास के लिए निर्गुण, निराकार परात्पर ब्रह्म सगुण-साकार होकर गुनगुनाता, गीत गाता, नाचता, खिलाता और खाता, अनेक अठखेलियाँ करता हुआ, इस जीव को अपनी असलियत  का दान करता हुआ,  उसे अपनी महिमा में जगाता हुआ प्रगट हुआ है। उसी को श्रीकृष्णावतार कहते हैं।

श्रीकृष्ण के जीवन में न पुकार है न आवाज है। श्रीकृष्ण के जीवन में केवल प्रसन्नता है। श्रीकृष्ण नाचते हैं तो पूरे नाचते हैं, हँसते हैं तो पूरे हँसते हैं। हम लोग हँसते हैं तो थोड़ा इज्जत-आबरू का, अड़ोस-पड़ोस का ख्याल रखकर हँसते हैं। आप हँसोगे तो इधर-उधर देखकर हँसोगे फिर भी पूरे नहीं हँसोगे। रोओगे तब भी पूरे नहीं रोओगे, नाचोगे तो भी पूरे नहीं नाचोगे किन्तु श्रीकृष्ण जिस समय जो करते हैं, पूरा करते हैं। खाते हैं तो पूरा, डाँटते हैं तो पूरा, नाचते हैं तो पूरा। इस अवतार ने, आदिनारायण ने हमारे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए ही सारी लीलाएँ की हैं।

श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक घटना कुछ न कुछ संदेश अवश्य देती है। उन्हें अपनाकर आप अवश्य ही वहाँ तक पहुँच सकते हैं, जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण हैं। आप श्रीकृष्ण के जीवन को अपना आदर्श बनाकर, उसके अनुसार आचरण कर उस पथ के पथिक बन सकें, यही हार्दिक शुभकामना…….

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