संत वाणी

ये कैसा है जादू !

ये कैसा है जादू !

pyareBapuji

मुँह से ऐसा शब्द कभी मत निकालो जो किसीका दिल दुखावे और अहित करे | कड़वी और अहितकारी वाणी सत्य को बचा नहीं सकती और उसमें रहनेवाले आंशिक सत्य का स्वरूप भी बड़ा कुत्सित और भयानक हो जाता है जो किसीको प्यारा और स्वीकार्य नहीं लग सकता | जिसकी जबान गन्दी होती है उसका मन भी गन्दा होता है  |

महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी से किसी विशिष्ट विद्वान् ने कहा: “आप मुझे सौ गाली देकर देखिये, मुझे गुस्सा नहीं आएगा  |”

महामना ने जो उत्तर दिया वह उनकी महानता को प्रकट करता है  | वह बोले: “आपके क्रोध की परीक्षा तो बाद में होगी, मेरा मुँह तो पहले ही गन्दा हो जाएगा  |”

ऐसी गन्दी बातों को प्रसारित करने में न तो अपना मुँह गन्दा बनाओ और न औरोँ की वैसी बातें ग्रहण ही करो | दूसरा कोई कड़वा बोले, गाली दे तो तुम पर तो तभी उसका प्रभाव होता है जब तुम उसे ग्रहण करते हो  |

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2 thoughts on “ये कैसा है जादू !

  1. guruvachan says:

    Never speak any word which hurts & harms anybody. Harsh & hurting language cannot hide the truth, and the partial truth present in the harshly spoken statement also gets deformed because it is not appreciated by anybody. The one who has foul tongue has an evil heart.

    Some scholar told Pandit Madanmohan Malviya: “You can abuse me with hundred harsh words but I’ll not get annoyed.”

    The reply that Malviyaji gave reflects his greatness. He said: “I’ll test your anger later, before that my tongue will become dirty.”

    Neither should you make your tongue dirty nor should you accept such language from others. If the bad language of others influences your mind, it means that you are accepting their foul language.

    Rajjab has said: Rajjab do not get angry when somebody asks, “Why that for?” Smilingly reply, “Yes Sir! Just like that.”

    The words spoken politely & properly is pleasing to all. If one calls “Uncle” to the brother of ones mother then it sounds good, but if one calls him the “brother-in-law of father” then it becomes harsh.

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  2. guruvachan says:

    ढंग से कही हुई बात प्रिय और मधुर लगती है | माँ के भाई को ’मामा’ कहकर पुकारें तो अच्छा लगता है किंतु ’पिता का साला’ कहकर पुकारें तो बुरा लगता है |
    दूसरी बात है की बिना अवसर की बात भी अलग प्रतिभाव खड़ा करती है | भोजन के समय कई लोग कब्जी, शौच या और हल्की बातें करने लग जाते हैं | इससे चित की निम्न दशा होने से तन-मन पर बुरा असर पड़ता है | अतः भोजन के समय पवित्रता, शान्ति और प्रसन्नता बढानेवाला ही चिंतन होना चाहिए | भोजन में तला हुआ, भुना हुआ और अनेक प्रकार के व्यंजन, यह सब स्वास्थ्य और आयु की तो हानि करते ही हैं, मन की शान्ति को भी भंग करते हैं |
    सही बात भी असामयिक होने से प्रिय नहीं लगती | भगवान श्रीरामचंद्रजी अपने व्यवहार में, बोल-चाल में इस बात कर बड़ा ध्यान रखते थे की अवसरोचरित भाषण ही हो | वे विरुद्धभाषी नहीं थे | इससे से उनके द्वारा किसीके दिल को दुःख पहुचाने का प्रसंग उपस्थित नहीं होता था | वे अवसरोचारित बात को भी युक्ति-प्रयुक्ति से प्रतिपादित करते थे तभी उनकी बात का कोई विरोध नहीं करता था और न तो उनकी बात से किसीका बुरा ही होता था |
    बात करने में दूसरों को मान देना, आप अमानी रहना यह सफलता की कूँजी है | श्रीराम की बात से किसी को उद्वेग नहीं होता था |
    जो बात-बात में दूसरों को उद्विग्न करता है वह पापियों के लोक में जाता है |
    बात मुँह से बाहर निकलने से पहले ही उसके प्रतिभाव की कल्पना करें ताकि बात में पछताना न पड़े |

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