विवेक जागृति

ब्रह्मसूत्र

 

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दुनिया का प्रथम आर्षग्रन्थ ब्रह्मसूत्र महर्षि व्यासजी ने रचना कर के बड़ा लोकोपकार किया है. जीव चेतन होकर भी अपनी अविद्यमान मान्यताओं में, भ्रांतियों में तमाम वासनाओं की पुष्टि के लिए कई जन्मों में भटकता है. ये भटकन अपनी समझ, प्रयास से दूर हो या जीव अपनी चेतनता अनुभव करते हुवे आत्मनिष्ठा, आत्मगौरव, आत्मस्वरूप, आत्मबल को समझकर उस अनुसार जीवन यापन हो तो बात ही क्या ?

आत्मा-परमात्मा का परस्पर सम्बन्ध, सीधा नाता और अपनत्व की अमर्याद सीमा से पार वाली सुहृदता, बिना मांगे जीव के कल्याण हेतु अहैतुक कृपा करके उसका साधना मार्ग कंटकरहित प्रशस्त करना ईश्वरस्वरूप सद्गुरु का ही काम होगा।

मुकं करोति वाचालं पंघु लंघयते गिरिम |

श्री वेद व्यासजी द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र बड़ा ही मूल्यवान ग्रन्थ है. इस में थोड़े से शब्दों में परब्रह्म स्वरुप का सांगोपांग निरूपण किया है. ये ग्रन्थ वेद के चरम सिद्धांत निदर्शन करता  है. वेद के अंत या शिरोभाग ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद का सुक्ष्म तत्व का दिग्दर्शन कराने के कारण इसे वेदांत दर्शन भी कहते है. वेद की पूर्व भाग की श्रुतियों में कर्मकांड का विषय है, जिसकी समीक्षा आचार्य जैमिनी ने पूर्व मीमांसा में की है. उत्तर भाग की श्रुतियों में उपासना एवं ज्ञान कांड है. इन दोनों की मीमांसा वेदांत दर्शन या ब्रह्मसूत्र को उत्तर मीमांसा भी कहते है. प्रस्थान त्रयी में इसका महत्वपूर्ण स्थान है.

समीक्षा के रूप में उपलब्ध ग्रन्थ – १. शारीरिक भाष्य -श्री शंकराचार्य २. श्री भाष्य – श्री रामानुजन आचार्य ३. अणुभाष्य – श्री वल्लभाचार्य ४. श्री निम्बार्क भाष्य ५. श्री भास्करचार्यकृत भाष्य ६. ब्रह्मानंददीपिका ७. श्री विज्ञानभिक्षुकृत भाष्य ८. आचार्य रामानंद कृत व्याख्या।

सूत्रों में बदरी, औडुलंभि, जैमिनी, अश्मरथ्य, काशकृत्स्न, आत्रेय इनका नामोल्लेख है, जो प्राचीन है और मीमांसा सूत्रों में भी ये नाम पाये जाते है. श्रीमद्भागवत में ‘हेतुमद” विशेषण सहित ब्रह्मसूत्र का नाम आता है. पाणिनि ने पराशर्य व्यास द्वारा रचित भिक्षु सूत्र की चर्चा अपने सूत्रों में की है.

इस ग्रन्थ को चार अध्याय और सोलह पादों विभक्त किया है.

१. समन्वयाध्याय – सभी वेदांत वाक्यों का एक मात्र परब्रह्म के प्रतिपादन में अन्वय।

२. अविरोधअध्याय – सभी प्रकार के विरोधाभासों का निराकरण किया है.

३. साधनाध्याय – परब्रह्म की प्राप्ति या साक्षात्कार के साधनभूत ब्रह्मविद्या तथा दूसरी दूसरी उपासनाओं में निर्णय किया गया है.

४. फलाध्याय – विद्याओं द्वारा साधकों के अनुरूप सम्प्राप्त फल के विषय में निर्णय किया गया है.

परमात्मा का स्वरुप, उनकी प्राप्ति के साधन, शरीर नित्य मौजूद आत्मदेव और इनके तहत परतमात्मा के साथ व्यापकता, साधना में गहराई कैसे प्राप्त हो, वृत्तियों को जानने समझने और परखकर मोड़ने की कला इन विषयों पर सद्गुरुदेव परम पूज्य बापूजी सत्संग अमृत सरल शब्दों में हमें पिलाते है. इस कारण प्राचीन ग्रन्थ निर्माण कर्ता सभी के दर्शन परम पूज्य बापूजी में दृष्टी गोचर होते है. तत्परता, आज्ञा की अनुशीलनता, भूल का निराकरण आदि सबकुछ साधना से चरम साध्य तक की यात्रा सभी को उपलब्ध हो इसलिए सद्गुरुदेव अनवरत प्रयास किये जा रहे है.

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