Guru-Bhakti

सद्गुरु का ऋण

Asaram ji Bapu100

 

एकमप्यक्षरं यस्तु गुरु: शिष्ये निवेदयेत् ।

पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्द्त्वा ह्यनृणी भवेत् ॥

              सद्गुरुदेव जन्म जन्मान्तर के अज्ञान के मूल को हरण करने के लिएशिष्य रूपी घड़े को अहैतुक कृपा से अपने अनुभव से घडते हैं.  त्रास देकर सहनशीलता बढ़ाते हैं तो कभी कष्ट सहकर प्रेम का अनुराग पढ़ा देते हैं.  जो उनकी सीख को श्रद्धापूर्वक ह्रदय में धारण कर के संकेत का तत्परता से पालन करते हैं, उनके शोक, मोह, चिंता, भय ऐसे भाग जाते है जैसे सूर्य उदय होने से रात्रि के निशाचर !  जिसकी जितनी सच्ची सेवा, श्रद्धा, प्रीति होगी उतना हो अधिक लाभ ले लेगा: क्योंकि गंगा जल, वायु, सूर्य प्रकाश सबके लिए होते है वैसे संत भी सबके लिए होते है.  विवेक बुध्दि करके सतर्क और सावधान रहे तो कोई भी विपरीत परिस्थिति उसको हिला नहीं सकेगी.  नि:स्वार्थ भक्त फरियाद नहीं करता और दुर्बुध्दि निंदकों के चक्कर में नहीं आता.  साधक तुम जितना महत्व संसार को देते हो, उतना अगर ईश्वर को दे तो सचमुछ देर नहीं; ईश्वर से अलग तुम हो नहीं।  ऐसा सिंचन सद्गुरुदेव करके एक से दूसरा दिया जला देते है.  अहंकार सहीत शिष्य समर्पित हैं तो अपने स्वभाव का दान देकर रूपांतरण-करुणा की पराकाष्टा की अनुभूति करी देते हैं.
             गुरु शिष्य को ज्ञान एक भी अक्षर दे तो उसके बदले में देने योग्य ऐसा कोई द्रव्य पृथ्वी पर नहीं है, जिसे देकर शिष्य गुरु ऋण से मुक्त हो सके.  (अत्रि संहिता : ९)
               रामकृष्ण देव अपने शिष्य से ज्ञान वार्ता कर रहे थे.  अपनी ओर इशारा करते हुवे कहा ” इसे अवतार कहते है, तू क्या समझा इस विषय में?”  ” वे लोग बहुत छोटी बात कहते है.” रामकृष्ण देव बोले,” अरे ऐसा क्यों?”  शिष्य बोला, ” हाँ  अवतार तो ईश्वर का अंश होता है.  सद्गुरु साक्षात ईश्वर हैं.  मुझे तो आप साक्षात शिव(ब्रह्म) लगते है.”  शिष्य ने उन्हें सर्वश्रेष्ट अध्यात्मिक मूल्य के रूप में स्वीकार कर लिया था.  रामकृष्ण देव भीतर से प्रसन्न हुवे और उसकी हृदय अंतर्गत यात्रा के बारे में निश्चिन्त ही गए.  पूज्य बापूजी भी अपने साधना के रुम में  सद्गुरु का हो चित्र थे.  इससे मन एकाग्र जल्दी होकर अनगिनत लाभ होते हैं.
               स्वामी अखंडानंदजी को उनके भक्त ने भोजन के लिए निमंत्रित किया।   संयोग ऐसा हुवा कि, भक्त ये बात भूल गया.  उसका इन्तजार करते रहे, बाद में फलाहार ले लिया.  इधर भक्त को निमंत्रण याद आया.  बहुत दुःख हुवा।  प्रायश्चित के रूप में ५ दिनों तक भोजन नहीं करने  निश्चय कर लिया।  दो दिन के बाद स्वामी जी को किसी ने जाकर बता दिया।  तब स्वामी स्वयं उसके घर पहुंचे।   सद्गुरु घर पर आए देख उनके चरणो में गिर पड़ा.  स्वामीजी उसे गले लगाकर कहा,” बीटा इतना दुखी मत हो  सबसे होती है.  हम कल तुम्हारे यहां भोजन करने आयेंगे।”
             कई घटित घटनाए मिल जाएगी।  ऋण से मुक्ति नहीं हो सकती।
 
  
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