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व्यसनमुक्त समाज की ओर (२ अक्टूबर)

asharam ji bapu 1011

पूज्य बापूजी कहते है,” जिसमे शांति हो उसे नशा कहते है. गुटखा, बीड़ी, दारू, जैसे व्यसन तन मन को भयंकर हानी पहुँचते हैं. इनमे इच्छा शक्ति दुर्बल होती है. मनुष्य देवता बनने के बदले पशु से भी बदतर बन जाता हैं. व्यसनों से मुक्त होने में ही सार हैं. शराब सब पापों, अनाचारों की जननी हैं. ये लत चरित्र का पतन, धन की बरबादी सामाजिक प्रतिष्ठा का हनन करके जीवन के सुख शांति को ग्रहण लगा देती हैं. शरीर बल कमजोर, मन का उन्मत्त होना, बुध्दि और संकल्प शक्ति का अस्तित्व न रहना और रोगप्रतिकारक शक्ति का क्षीण होना नए रोगों को आमंत्रण देता है. इस कारण अकाल मृत्यु का शिकार होना अवश्यंभावी होता है. नशा करनेवाले ये सब जानते हैं, गन्दी आदत की ललक और विवेकहीनता उन्हें व्यसन छोड़ने की लिए संकल्पित नहीं होने देती।
ऐसी स्थिति में संतों और महापुरुषों की शरण में जाना एक मात्र उपाय है. वे सामर्थ्य, सद्भाव, और शुभ संकल्प के अमिट भंडार होते हैं, उनकी अहैतुक कृपा भरी नजर असंभव लगने कार्य को संभव बना देती हैं. पिजुअ बापूजी के शिबिरों मेंसत्संग सरिता का अनुभव होता है. परमात्मा-रसस्वादन का प्रागट्य अवचेतन मन की गहराई तक पहुंचकर अन्य मिटनेवाले रस तुच्छ लगते है. जीवन – उल्हास का उदय होने लगता है,




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