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शिक्षक और शिक्षा प्रणाली

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शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक डॉ. राधाकृष्णन को देश का सर्वोच्च अलंकरण “भारत रत्न” प्रदान किया. राधाकृष्णन के मरणोपरांत उन्हें मार्च 1975 में अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है. इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे. उन्हें आज भी शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श शिक्षक के रूप में याद किया जाता हैं. आज भी उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में संपूर्ण भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाकर डॉ.राधाकृष्णन के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. इस दिन देश के विख्यात और उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके योगदान के लिए पुरुस्कार प्रदान किए जाते हैं.

*    ज्ञान हमें शक्ति देता है, प्रेम हमें परिपूर्णता देता है।
*    धन, शक्ति और दक्षता केवल जीवन के साधन हैं खुद जीवन नहीं।
*    आध्यात्मक जीवन भारत की प्रतिभा है।
*   यदि मानव  दानव  बन जाता  है तो ये उसकी  हार  है , यदि मानव महामानव बन जाता है
तो ये उसका चमत्कार  है .यदि मनुष्य  मानव  बन जाता है तो ये उसके जीत है।
*   केवल निर्मल मन वाला व्यक्ति ही जीवन के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकता है. स्वयं
के साथ ईमानदारी आध्यात्मिक अखंडता की अनिवार्यता है।
Pandit Madan Mohan Malaviya created history in Indian education with this institution – the first of its kind in the country. He chose Banaras as the site, because of the centuries old tradition of learning, wisdom and spirituality inherent to the place. His vision was to blend the best of Indian education called from the ancient centres of  learning – Takshashila and Nalanda and other hallowed institutions, with the best tradition of modern universities of the west. Great minds and personalities like Annie Besant, Mahatma Gandhi, Rabindranath Tagore, Shyama Charan De and many others joined hand with him in his quest for knowledge, arousing the national spirit in India
and winning freedom with the power of education and righteousness.

पंडित मालवीयजी के विचार पारम्परिक, धर्म समन्वयक और नैतिक अधिष्ठान के प्रवर्तक माने जाते है।   शिक्षक की गोद में सृजन और प्रलय खेलते है।   आचार्य चाणक्य ने एक नन्हे को ऐसे संस्कार दिए कि जिसे चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में इतिहास जानता है।   संस्कृत के जाने माने कवि कालिदास भी संस्कारों का परिणाम है।   शिक्षक के जीवन और शिक्षाओं का विद्यार्थी पर बड़ा प्रभाव रहता है।   केवल पुस्तकों में लिखी आजीविका चलने शिक्षा देकर शिक्षक का कर्तव्य पूरा नहीं होता।  लौकिक विद्या के साथ चरित्र निर्माण की, आदर्श मानव बनने की शिक्षा भी दीजिये।

माण्डूक्योपनिषद के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है।  अपरा विद्या और परा विद्या।   भौतिक, रसायन, जीव जैसे विज्ञान,  इतिहास अपरा विद्या कहलाते है।  आत्मा-परमात्माका ज्ञान जो देश-काल-कारण से परे है इसे परा विद्या कहते है।

प्राचीन काल  में हमारे शिक्षा संस्थानों में जिन्हें गुरुकुल  कहते थे, दोनों प्रकार की विद्याओं का अध्ययन किया जाता था।   आज के समय में परा विद्या का कोई स्थान नहीं नजर आता ।  आत्माभिव्यक्ति एवं आत्मानुभूति की पूर्ण उपेक्षा करने के कारण आधुनिक शिक्षा को ही प्राधान्य देने वाले समृध्द देश के विद्यार्थिओं में अशांति, ईर्षा, तनाव, चिंता, नैतिक अधिष्ठान का अभाव जैसी समस्याएं  बाल्य काल से ही पंनप रही है।   मानसिक अशांती का कारण नई पीढ़ी ने जानने के बदले करने की शिक्षा अपनाई है।   यूनेस्को के अनुसार अमेरिका, जापान, और स्वीडन में युवा ५४% आत्महत्या से मृत्यु होते है।  जापान के स्वास्थ्य मंत्रालयानुसार ४२ से उपर के आयु के ४४% जापानी मानसिक विक्षिप्तता के शिकार है।

पूज्य बापूजी कहते है कि, निष्काम कर्म, संस्कृति सेवा, भगवन का सुमिरन और एकांत में आत्म विचार करके आत्मा आनंद में आनेवाले  महान हो जाते  है ।   जो भी कार्य करे पुरे मनोयोग से करे, उसे आलस्य या लापरवाही से बिगड़ने नहीं दे।   ईमानदारी, निष्ठा और लगन से योग्यताओं का विकास होता है ।  अत: योग्यताओं के साथ आत्म परिक्षण, निरीक्षण और नियंत्रण परिष्कारता हर पल की सजगता व प्रयास होना चाहिए।

शिक्षा प्रणाली की भूमिका क्या होनी चहिये?  तनाव और अशांति भरे वर्तमान में गुरुकुल शिक्षा पध्दति का जीर्णीद्धार समय की मांग है।   इससे आजीविका के साथ संयम सदाचार, सच्चाई, परदुःखकातरता, जैसे सद्गुण पाने की एवं ईश्वर प्राप्ति की विद्या भी मिले ।   उनके जीवन में उद्यम, साहस, धैर्य, बुध्दि, शक्ति, पराक्रम जैसे गुणों का सहज में विकास हो और बिना छल-कपट, ईर्ष्यारहित मानसिक तनाव के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो ।   जो लोग योगविद्या और आत्मविद्या का सहारा लेकर सुबह थोड़ा अभ्यास करते है वे लौकिक विद्या के भी अच्छे रहस्य खोज लेते है ।   स्वामी विवेकानंद लौकिक विद्या के साथ आत्मविद्या और योगविद्या को भी आत्मसाथ  किया तो ओजस्वी तेजस्वी बनकर जीवन को आदरणीय बनाया ।  इन विद्याओं को भूलकर केवल ऐहिक विद्या का अध्ययन जीवन का अनादर है ।   पूज्य बापूजी गुरुकुल में ऐसी शिक्षा प्रणाली को अपनाकर सांस्कृतिक जतन कर रहे है।

डॉ राधाकृष्णनजी लिखते है कि, आप केवल ईटों से राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते ।   युवाओं के मन मस्तिष्क भी सुदृढ़ करने होंगे ।   चरित्र निर्माण अध्यात्म के बिना संभव नहीं है ।   शिक्षकों को इन विद्याओं से सुसम्पन्न होने के लिए किसी आत्मनुभावनिष्ठ सद्गुरु से मार्गदर्शन लेना होगा ।   तभी बच्चों को पढ़ा सकेंगे |

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