कथा अमृत

साधना के रास्ते हजार हजार विघ्न

 

bapu1

 

साधना के रास्ते पर हजार-हजार विघ्न होंगे, लाख-लाख कांटे होंगे l उन सबके ऊपर निर्भयतापूर्वक पैर रखो l वे कांटे फूल न बन जायें तो तुम्हारा नाम ‘साधक’ कैसे ?
साधक वह है कि जो हजार विघ्न आयें तो भी न रुके, लाख प्रलोभन आयें तो भी न फंसे l हजार भय के प्रसंग आयें तो भी भयभीत न हो और लाख धन्यवाद मिले तो भी अहंकारी न हो l उसका नाम साधक है l साधक का अनुभव होना चाहिये कि :
हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं l
हम से जमाना है जमाने से हम नहीं ll
पहलाद के पिता ने रोका तो प्रह्लाद ने पिता की बात ठुकरा दी l वह भगवान के रास्ते चल पडा l मीरा को पति और परिवार ने रोका तो मीरा ने उनकी बात को ठुकरा दिया l राजा बलि को गुरू ने रोका तो राजा बलि ने उनकी बात को सुनी अनसुनी कर दी l
दु:ख और चिंता, हताशा और परेशानी, असफलता और दरिद्र्ता भीतर की चीजें होती हैं, बाहर की नहीं l जब भीतर तुम अपने को असफल मानते हो तब बाहर तुम्हें असफलता दिखती है l
भीतर से तुम दीन-हीन मत होना l प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले भक्त की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं l तुम जब निश्चिंत हो जाओगे तो तुम्हारे लिये ईश्वर चिंतित होंगे l
बिगडे तब जब हो कोई बिगड़ने वाली शय l
अकाल अछेध अभेध को कौनसी  वस्तु का भय ll

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