tatvik

आत्मश्रद्धा – मानसिक राज्य की सम्राट

bapuji

 

दरबदर की पनाहों में दस्तक देकर

अनसुनी राहत को समझ लेते है

दुःख भरी ख़मोशो में भी चुपके से

खुशनुमा तरन्नुम बिखेरते है

ये शख्स अंधों के  शहर में आईने बेचते है.

 

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।

प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।।

विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना।

प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति।।

‘कार्य में विघ्न आयेगा’ ऐसे भय से कार्य का प्रारंभ ही न करना यह हीन पुरुष का लक्षण है। मध्यम पुरुष कार्य का प्रारंभ तो कर देता है किंतु बीच में विघ्न आने पर कार्य छोड़ देता है। उत्तम पुरुष का यह लक्षण है कि बार-बार विघ्न आये, आघात पड़े, घायल हो जाय फिर भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता। उसकी दृष्टि में यदि कार्य उत्तम होता है तो बीच में आने वाले विघ्नों की वह कोई परवाह नहीं करता।  मानवमात्र की सफलता का मूल उसकी आत्मश्रद्धा में निहित है। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है। तन-बल, मन-बल, बुद्धि-बल एवं आत्मबल ऐसे कई प्रकार के बल हैं, उनमें आत्मबल सर्वश्रेष्ठ है। आत्मबललल   में अचल श्रद्धा यह विजय प्राप्त करने की सर्वोत्तम कुंजी है। जहाँ आत्मबल में श्रद्धा नहीं है वहीं असफलता, निराशा, निर्धनता, रोग आदि सब प्रकार के दुःख देखने को मिलते हैं। इससे विपरीत जहाँ आत्म बल में अचल श्रद्धा है वहाँ सफलता, समृद्धि, सुख, शांति, सिद्धि आदि अनेक प्रकार के सामर्थ्य देखने को मिलते हैं।  जैसे-जैसे मनुष्य अपने सामर्थ्य में अधिकाधिक विश्वास करता है, वैसे-वैसे वह व्यवहार एवं परमार्थ दोनों में अधिकाधिक विजय हासिल करता है। अमुक कार्य करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा विश्वास और श्रद्धा-यह कार्यसिद्धि का मूलभूत रहस्य है।

जिसके अंतःकरण में आत्मश्रद्धा स्थित हो वह भले एकदम अकेला हो, साधनविहीन हो फिर भी सफलता उसी का वरण करती है। उसके रोम-रोम में व्याप्त आत्मश्रद्धारूपी लौहचुंबक आस-पास से अनगिनत साधनरूपी लौहकणों को खींच लेता है। अपने इष्टावतार श्री रामचन्द्रजी के जीवन का ही दृष्टांत लें। जिसने देवताओं तक को अपना दास बना लिया था ऐसे रावण को हराने का निश्चय जब उन्होंने किया तब उनके पास कौन-से साधन थे ? समुद्र को पार करने के लिए उनके पास एक छोटी-सी नौका तक न थी। रावण एवं उसकी विशाल सेना से टक्कर ले सके ऐसा एक भी योद्धा उस वक्त उनके पास न था फिर भी श्रीराम ने निश्चय किया सीता को पाने का, रावण को हराने का तो अमित शक्तिवाला रावण भी रणभूमि की धूल चाटने लगा। यह क्या सिद्ध करता है ?

क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।

कार्यसिद्धि में पहले साधनों की नहीं, वरन् आत्मश्रद्धा की जरूरत है। आत्मश्रद्धा के पीछे साधन तो उसी प्रकार जुट जाते हैं जैसे देह के पीछे छाया।  ध्रुव का उदाहरण देखें।  ‘दूसरों को भले यह असाध्य लगे किन्तु मेरे लिए कुछ भी असाध्य नहीं है’ – ऐसे दृढ़ आत्मविश्वास से उसने भयंकर तप शुरु किया, जिसके फलस्वरूप भगवान विष्णु को दर्शन देने ही पड़े।  आपका जीवन आपकी श्रद्धा के अनुसार ही होगा। जीवन को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को अपना जीवन उत्साह, उमंग एवं उल्लास के साथ जीना चाहिए एवं अपनी शक्तियों पर विश्वास रखकर, सफलता के पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

कोई ज़ख्म ताज़ा

दर्द के नग्मे सुना है

मुस्कुराने का ईल्म

आंसुओं को छुपता है

आँखे मूंदकर, दिल की नज़र से

देखते दिखने का राज़ उकेरते है

अचरज नहीं

जीते जी हर पुकार अपनों सी है

हैरानी क्यों

हक़ीक़त पलपल के सपनों सी है

खुद से जुदा, ईमान को संवारते

हर नज़र में नूर को देखते है

आत्मबल में श्रद्धा रखने वाले मनुष्यों ने ही इस जगत में सामान्य मनुष्यों के लिए असंभव दिखते कार्यों को सिद्ध कर दिखाया है। ‘अमुक कार्य मैं’ जरूर कर सकूँगा।’ ऐसा दृढ़तापूर्वक मानने एवं तदनुसार प्रयत्न में लगना इसी का नाम श्रद्धा है। किसी बात को न मानना, किन्तु तदनुनासार प्रयत्न न करना यह श्रद्धा नहीं, वरन् कायरता अथवा प्रमाद है।  आत्मबल में श्रद्धा उत्पन्न होते ही कायर शूरवीर हो जाते हैं, प्रमादी एवं आलसी उद्यमी हो जाते हैं, मूर्ख विद्वान हो जाते हैं, रोगी निरोग हो जाते हैं, दरिद्र धनवान हो जाते हैं, निर्बल बलवान हो जाते हैं और जीव शिवस्वरूप हो जाते हैं।  असफलता से हताश न हों। बारिश से पूर्व तेज गर्मी पड़ती है, उस गर्मी से व्याकुल न हों। जब लंबी कूद लगानी हो तो पाँच-दस कदम पीछे हटना पड़ता है। अतः असफलताओं से निराश मत हो। हिम्मत रखो। ज्यादा मेहनत करो। ज्यादा तीव्र पुरुषार्थ करो। कायर न बनो। कर्त्तव्य से च्युत न हो। अंतःकरण में आत्मश्रद्धा रखकर ज्यादा से ज्यादा पुरुषार्थ करो। सफलता आपका ही वरण करेगी।

जिसमें वक्ता होने की लेशमात्र भी योग्यता न थी ऐसे महान ग्रीक वक्ता डिमोस्थिनिस को ही देखें। जिसके द्वारा उच्चारण भी स्पष्ट नहीं हो पाता था, सभा में खड़े होते ही जिसके पैर थर-थर काँपने लगते थे एवं जिसमें पूरी विद्वता भी न थी ऐसे डिमोस्थिनिस ने निश्चय किया कि ‘मुझे सर्वोत्कृष्ट वक्ता होना है, मुझमें ऐसा होने का पूरा सामर्थ्य है’ और उसने सागरतट पर जाकर, सागर की लहरों को जीवित श्रोता मानकर बोलने की शुरुआत की। परिणाम क्या हुआ उसे सारा विश्व जानता है वह ग्रीक जगत का सर्वश्रेष्ठ वक्ता बना। इतना ही नहीं, अर्वाचीन काल में भी इस कला के  अभ्यासियों के लिए सर्वोत्तम आदर्श बना।

किसी भी उच्च उद्देश्य का निश्चय करते समय संकोच न करो, ‘अमुक कार्य को करने की मेरी योग्यता नहीं है’ ऐसे संशय को अपने हृदय में जरा-सी स्थान न दो। व्यवहार में आपकी स्थिति चाहे कितनी भी दरिद्र क्यों न हो ? फिर भी चिंता न करो। धन-वैभव के तमाम आकर्षण देखकर आकर्षित न हो जाओ। अनंत-अनंत आकर्षणों को देखकर भी, जो सर्वोच्च है उस अपने आत्मस्वरूप में ही मस्त रहो। बड़े-बड़े वैभवों से परिपूर्ण व्यक्ति भी आपके आत्मबल के आगे नन्हें लगेंगे।

आत्मश्रद्धा मानसिक राज्य की सम्राट है। मन की अन्य शक्तियाँ मानों, उसकी सेना के सैनिक हैं। वे शक्तियाँ अपने सम्राट की प्रेरणा से बढ़ती हैं। सैनिक अपने सम्राट के पीछे चलेंगे, उसके विश्वास के पीछे चलेंगे, उसके लिए मर मिटेंगे लेकिन जिस समय सम्राट डगमगा जायेगा, उसी समय उसकी सेना भी नष्ट हो जायेगी अर्थात् आत्मश्रद्धा के डगमगाते ही मन की शक्ति भी नष्ट हो जायेगी।

पूरा विज्ञान जगत एडीसन का नाम बहुत अच्छे से जानता है। उसने एक साथ कई प्रयोग शुरु किये थे। प्रत्येक प्रयोग में कोई-न-कोई गलती होती थी। हजारों रुपयों के साधन एवं लाखों रूपयों की यंत्र-सामग्री स्थापित करने पर भी इच्छित परिणाम नहीं आता था। वह पुनः नये तरीके से बार-बार प्रयोग करता किन्तु मुख्य गलती हो ही जाती थी। आगे क्या करें ? यह समझ में नहीं आ रहा था। एक रात्रि को उसकी प्रयोगशाला में आग लगी और सब जलकर खाक हो गया।

सुबह एडिसन ने उसी राख के ढेर पर खड़े होकर अपनी डायरी में लिखाः “दैवी-प्रकोप की भी अपनी कीमत होती है। इस भयंकर आग में मेरी सिद्धियों के साथ मेरी गलतियाँ भी जल गयीं। ईश्वर का आभार है कि अब सब नये सिरे से शुरु हो सकेगा।” उसके दूसरे ही क्षण से उसने एक छोटी सी झोंपड़ी में एकदम सादे साधनों के द्वारा अपने प्रयोग द्वारा अपने प्रयोग शुरु किये। सब कुछ भस्म कर देने वाली आग उसके उत्साह को भस्म न कर सका!

विश्वविख्यात नेपोलियन बोनापार्ट ने एक सामान्य सैनिक के रूप में काम काज शुरु किया था। “रास्ता ढूँढ लूँगा और नहीं मिलेगा तो रास्ता स्वयं बना सकूँगा।” ऐसा कहकर नेपोलियन दृढ़तापूर्वक चल पड़ा अपने कार्य को सिद्ध करने। अपने संपूर्ण जीवन में दूसरों के द्वारा बनाये गये मार्गों को ढूँढने में उसने समय नहीं बिगाड़ा वरन् अनेकानेक अवरोधों के बीच भी अपना रास्ता आप बना लिया। दृढ़ निश्चय एवं आत्मश्रद्धा से अपने मार्ग में आने वाली अनेकों मुसीबतों को पैरों तले कुचल कर जीवन को सफलता के शिखर पर ला खड़ा किया। फ्रांस का महान सम्राट बनकर उसने अपने वाक्य को सिद्ध कर बताया। इतिहास इसका साक्षी है।

पोलियो से पीड़ित एक व्यक्ति बैसाखी बिना नहीं चल पाता था। उसके डॉक्टर ने अनेक उपाय किये किन्तु वह बैसाखी के बिना नहीं चल पाता था। एक बार दवाखाने में आग लगी, ज्वालाएँ आसमान को चूमने लगीं, बैसाखी को ढूँढने का समय ही न था और वह एक पल भी बिगाड़ता तो जल जाता। उसने सीधे ही दौड़ना शुरु किया। बैसाखी सदा के लिए अपने आप छूट गयी। कहाँ से आयी यह शक्ति ? आत्मा के अखूट भंडार में से ही न!  आत्मश्रद्धा से संपूर्ण जीवन में परिवर्तन आ जाता है। असफलता के बादल बिखरकर सफलता का सूर्य चमकने लगता है।

गली गली में मशहूर

कद्र की बात जश्ने तारीफ है

सुकून-ए-दिल से हुनर हो ,

सुर की लगन और तमिल है

महफ़िलों के दौर में हश्र का बयान क्या

आज की बात अभी निचोकर दिखाते है

ये शख्स अन्धो के शहर में आईने बेचते है

आत्म श्रद्धा एक रसायन व् टॉनिक है.  जिसने इसे सहेजा वह सच्चा धनवान, सत्तावान और पराक्रमी वीर बना है.  उसकी वेशभूषा, परिस्थिति इसके विपरीत हो तो भी उसे निश्चय से विचलित नहीं कर सकते।  वासनागत अज्ञान, संस्कारगत अज्ञान और तमाम भ्रांतियां आत्म श्रद्धा से मिटाकर शुद्ध स्वरुप को निहारने का सामर्थ्य सम्प्राप्त हो जाता है.  ये बात काव्य रूप में हो, सत्संग के रूप में हो या अनमोल वचनों के रूप में हो, समझकर दिल में उतरने भर की देर!  फिर क्या घटित नहीं हो सकता ?

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