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संबोधन

Bapu

आज की जागरण बेला में प्रभात कालीन शंख ध्वनि गुंजायमान है.  इन पावन पलों को जिवंत करने करने यहाँ उपस्थित  और जो नहीं आ पाएं और इस सुप्रचार की पावन सेवा करना चाहते है, सभी साधक भाई बहनों का  हार्दिक स्वागत.  मनुष्य की हीन वृत्ती तथा निंदक भावना भूतकाल में ही नही थी अपितु ये विकृत प्रवाह आज भीं देखा  जा रहा है.  व्यवहार में वेदान्त को कैसे उतारना जीवन में किस प्रकार जोड़ना और सत्त्व के विकास के साथ निर्मल जीवन किस प्रकार जीना, इन विषयों पर बोधक उपदेश देने वाले अनेक प्राणियों के भाग्य बदलने वाले पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी महाराज के सम्बन्ध में भी कुछ अबुध गिनेगिनाये लोग उल्टी बाते करते रहते हैं। देशभर में फैले पूज्यश्री के अनेकों आश्रमों तथा श्री योग वेदान्त सेवा समिति की विभिन्न शाखाओं के माध्यम से जीवन के सर्वांगीण विकास, आदिवासी-उत्थान, नारी शक्ति-जागृति, व्यसन मुक्ति, अभियान, निर्धनों की सहायता, आसन-प्राणायाम के माध्यम से रोगनिवारण, आयुर्वैदिक औषधनिर्माण, सत्संग-कीर्तन द्वारा समाज में आध्यात्मिकता की भावना को चिरस्थायी बनाते हुए विचार-प्रदूषण समाप्त करने तथा जप-ध्यान द्वारा आत्मविकास एवं सेवाकार्यों द्वारा आत्मनिर्माण व जीवनोत्थान की अनेकानेक प्रवृत्तियाँ चलती हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति, समाज, गाँव, राज्य, देश एवं अन्ततः विश्व का उत्थान होता है, कल्याण होता है, शान्ति व प्रेम का साम्राज्य फैलता है, वैर, घृणा, द्वेष, मारकाट एवं अशांति को तिलांजली मिलती है।  सत्य के पक्षधर पत्रकार व समाचार पत्र जगत में लोकप्रियता के शिखर की ऊँचाइयों को दिनप्रतिदिन सफल होकर छूते जाते हैं व समाचार जगत में ही नहीं अपितु मानवमात्र के हृदय में भी आदर व सम्मानजनक स्थान प्राप्त करते है लेकिन सदैव सत्य की निन्दा, विरोध, छिद्रान्वेषण व भ्रामक कुप्रचार में संलग्न लेखक व पत्र-पत्रिकाएँ एक दिन जनता की नज़रों से तो गिरते ही हैं, साथ ही साथ लोगों को भ्रमित व पथभ्रष्ट करने का पाप के भागीदार भी बनते हैं।

किसी सात्त्विक-सज्जन लेखक-पत्रकार से पूछा गया किः

“आज के युग में लेखन क्षेत्र में कलम को चन्द रुपयो की खातिर गिरवी रखकर सत्यता एवं सज्जनता के विरुद्ध राष्ट्रविरोधी ताकतों तथा असामाजिक तत्त्वों के इशारों पर जो अनर्गल व अश्लील कुप्रचार किया जा रहा है, उसमें आप भी सम्मिलित होकर लाभ प्राप्त क्यों नहीं करना चाहते?”

वे कोई विद्वान, सुलझे हुए व चिंतक लेखक थे। उन्होंने तपाक से उत्तर दिया किः “मैं अपनी कलम में स्याही भरकर लिखता हूँ, पेशाब नहीं।”

सोशल मीडिया आज के उस नाजुक दौर में, जबकि भारतीय संस्कृति को समूल नष्ट करने के राष्ट्रव्यापी षडयंत्रों की व्यूह रचना की जा रही है, संतों व महापुरुषों के अनुभवों एवं दिव्य ज्ञानामृत को लोकहित में प्रचारित-प्रसारित कर ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित आदर्शों व सिद्धान्तों की जितनी अच्छी तरह से रक्षा कर सकता है, उतना देश का अन्य कोई साधन नहीं कर सकता है तथा यही मीडिया असत्य व अनर्गल कुप्रचारों के फैलाव से राष्ट्र का जितना विनाश कर सकता है, उतना अन्य कोई साधन राष्ट्र को पतन के गर्त में नहीं धकेल सकता है।

महान चिन्तक ईमर्सन से उसके किसी मित्र ने कहाः “एक व्यापारी आपकी घोर निन्दा करता और कई लोग उसके साथ जुड़े हैं।”

ईमर्सनः “वह व्यापारी भले ही मेरी निन्दा करे, किन्तु तुम क्यों उसकी निन्दा करते हो? हमारे पास अनेक अच्छे काम हैं। हमारे जीवन का विकास करने की, सत्व के मार्ग पर चलने की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ पड़ी हैं। उनको छोड़कर ऐसी व्यर्थ की चर्चाओं में समय देने की क्या आवश्यकता ?”

मित्रः “किन्तु लोग ऐसा बोलते ही क्यों हैं? दूसरे की निन्दा क्यों करते हैं?”

ईमर्सनः “लोगों की जीभ है इसलिए बोलते हैं। उनको अपनी बुद्धि का उपयोग करने की स्वतन्त्रता है। उनको यदि अपनी बुद्धि का उपयोग कुएँ में कूदने के लिए करना है, तो उन्हें किस प्रकार रोका जाए?”

मनुष्य सब कुछ करने के लिए स्वतंत्र है। यदि उसका अधम तत्त्व उत्तम तत्त्व के नियंत्रण में रहे तो ही सच्ची स्वतंत्रता होगी। हमें यह देखना है कि क्या इस नियम का निर्वाह हमारे जीवन में हो रहा है?

सोशल मिडिया आज विचार क्रांति का पर्याय बन गया है.  कुप्रचार हो या सुप्रचार दोनों को अपने अपने रास्ते प्रभावी ढंग से संचालन किया जा सकता है.  आप समझ रहे है कि, ये माध्यम घर बैठे जीवन जीने की कला का शिक्षण बन कर रह गया है.

आध्यत्मिक एवं धार्मिक सिद्धांत कच्ची मिटटी के नहीं बने है.  वे बहुत ही मजबूत आधार पर खड़े है.  बात केवल इतनी भर हैं कि, पुराने समय के लोग शास्त्रों एवं आप्त पुरुषों को प्रमाण मानकर उस आधार पर धर्म मान्यताओं का प्रतिपादन करते थे और अब तर्क, प्रमाण, उदाहरण आदि को ठीक समझा जाता हैं.  इन कसौटियों पर भी धर्म के सिद्धांत खरे पूर्णतया खरे हैं.  उत्कृष्टतावादी चिंतन, आध्यात्मिक साधना और आदर्शवादी व्यवहार से समन्वित देव जीवन, सामान्य और जटिल परिस्थितियों के बींच किस प्रकार जिया जा सकता हैं इसका अनुभव हमने पिछले पंद्रह महिनों के हर पल अनुभव करते जिया हैं.  न चाहते हुवे भी हिन्दू धर्म पर अन्यायकारी  कुठाराघात होते रहे है.

वैज्ञानिक अध्यात्म और आध्यात्मिक पत्रकारिता का नूतन अध्याय सोशल मीडया में सुप्रचार के तहत लिखने का प्रण ले.   आश्रम द्वारा प्रकाशित तमाम साहित्य  सांस्कृतिक, आदर्शवादी मूल्यों की धरोहर है.   इसे लाखों जन जन तक जागरण हेतु पहुँचाने के लिए संघर्षरत और दृढ़ संकल्प रहेँगे।    इसे व्यवहार में चालायित करने के क्या साधन होंगे, प्रभावी ऑन लाइन सुप्रचार के लिए इन साधनों को कैसे शुरू करे, अपना विचार और सन्देश मीमांसा किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत हो इसकी जानकारी आपको मिलेगी।

नर नहीं, वह जंतु हैं जिस नर को धर्म का भान नहीं,

व्यर्थ है वह जीवन जिसमें आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं।।

चांदी के चंद टुकड़ों पर अपनी ज़िंदगी बेचनेवालों,

मुर्दा हैं वो देश जहाँ पर संतों का सम्मान नहीं।

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