tatvik

ईश्वर का अनुसन्धान !

bapu 1

पूर्ण सुख, पूर्ण शांति, पूर्ण प्रेम, पूर्ण ज्ञान अपूर्ण चीजों को ले लेकर जीवन खत्म कर देने पर भी नहीं मिलेगा। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं का जब विवेक जगता, इस बात का पता चल जाता तब वे पूर्ण सुख-शांति पाने के लिए अपना राजपाट छोड़कर जिन्होंने पूर्ण सुख को जाना है, पूर्ण शांति पायी है, पूर्ण ज्ञान को प्राप्त किया है ऐसे महापुरुषों के पास अरण्यों में पहुँच जाते। जिनका विवेक नहीं जगता वे लोग संसार की सामग्रियों से सुखी होने का परिश्रम करते-करते बूढ़े हो जाते हैं और फिर अंत में पछताते हैं कि, संसार में कोई सार नहीं।
संसार में परिश्रम अधिक है और सुख अल्प है। वह भी सुख नहीं, सुख का आभास मात्र। The Young persons say, “Life is full of joys’’ but the  wise persons say,”Life is full of sorrows.”
जवान बोलते हैं कि जिन्दगी मजा लेने के लिए है और बुजुर्ग लोग बोलते हैं कि जिन्दगी दुःखों का घर है। वास्तव में वह न मजा लेने के लिए है और न दुःखों का घर है। जिन्दगी है जीवनदाता को पहचानने के लिये, जिन्दगी के रहस्य को जानने के लिये। जिन्दगी का रहस्य अछूता रह जाता है और जिन्दगी पूरी हो जाती है। शरीर के खानपान में और व्यवहार में ही आयु बीत जाती है। आखिर में इस शरीर को जला देना है। इसको अच्छा  खिलाया-पिलाया, चर्बी अधिक बढ़ाई तो मुट्ठी भर राख अधिक होगी और क्या अधिक सुविधा में रहने की जितनी आदत बनेगी, असुविधा उतनी अधिक खटकेगी। अहं का पोषण करने की जितनी आदत बनेगी, अपमान उतना अधिक चुभेगा। सामग्रियों के बीच रहने की जितनी आदत बनेगी, सामग्रियों की अनुपस्थिति में उतनी अधिक बेचैनी होगी।
अपने दोषों को खोजो।

जो अपने दोष देख सकता है,वह

कभी-न-कभी उन दोषों को

दूर करने के लिए भी

प्रयत्नशील होगा ही।

ऐसे मनुष्य की

उन्नति निश्चित है।

देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित जो अखण्ड है, एकरस है, अभी है, यहाँ है, सदा है, सर्वत्र है वही हमारा आत्मा होकर बैठा है। वह सत् है। शरीर हमारा सत् नहीं है। वह चित् है। शरीर में दिखनेवाली चेतना उसी आत्मदेव की है। शरीर में जो थोड़ा बहुत आनन्द आता है खाने-पीने, देखने-सुनने आदि का, वह हाड़-मांस के शरीर का आनन्द नहीं है, उस अनन्त के आनन्द की एक झलक मात्र है। उसके एक पाद से सारा विश्व आनन्दित हो रहा है। त्रिपाद ब्रह्म से विश्व, तैजस और प्राज्ञ, स्थूल, सूक्ष्म और कारण ये तीनों क्रिया-कलाप कर रहे हैं और सुख की झलक पा रहे हैं। ब्रह्म का चतुर्थ पाद है तुरीय। इस गुणातीत तत्त्व को जो जान लेता है वह त्रिपाद में भी अपने उसी गुणातीत तत्त्व को जो जान लेता है वह त्रिपाद में भी अपने उसी गुणातीत स्वरूप का दर्शन करता है, अनुभव करता है। अनुभव करने वाला आप अलग नहीं बचता। वह स्वयं अनुभव स्वरूप हो जाता है। वह स्वयं अपने को ब्रह्म स्वरूप में पा लेता है जान लेता है।

आज हक़ीक़त खुद गुमाँ करती है,
नगमा ए रूह खुद बयाँ करती है.

नज़र नज़र के फेर में अजनबी हूए<
आश्ना ए रूह खुद बयाँ करती है.
वो जो दिल के खानो में शायद मिले,
पशेमाँ ए रूह खुद बयाँ करती है.

किसी भी देश में चले जाओ, वहाँ आकाश मौजूद मिलेगा। किसी भी काल में देखो, आकाश मौजूद मिलेगा। किसी भी वस्तु में देखो, आकाश मौजूद मिलेगा। ऐसे ही वह परमात्मा आकाश से भी अत्यंत सूक्ष्म है। किसी भी ब्रह्माण्ड में चले जाओ, उसका अस्तित्व है ही।

आकाश के बिना कोई वस्तु टिक नहीं सकती। आकाश के बिना कोई वस्तु अपना अस्तित्व रख नहीं सकती। आकाश का त्याग करके कोई वस्तु रह नहीं सकती। ऐसे ही चिदाकाश परमात्मा का त्याग करके इस भूताकाश के बाप की ताकत नहीं कि ठहर सके।

चिदाकाश चिदघन परमात्मा इतना सूक्ष्म है कि मच्छर में भी चेतना और ज्ञान का अंश उसी का है। बेक्टेरिया में भी चेतना उसी की है। घन सुषुप्ति में पड़े हुए पत्थर और पहाड़ में भी सत्ता उसी चिदघन परमात्मा की है।

होठों से निकले आसमाँ बिखर गए,
शफ़क़ ए रूह खुद बयाँ करती है.

रौनकों का अक्स फ़िज़ा में घुल गया,
नूर ए रूह खुद बयाँ करती है.

तब्दीली दरिया की सज़दा है दुवाओं का,
अब्र ए रूह खुद बयाँ करती है.

सुबह हुई। तुमने आँख खोलकर बाहर निहारा। जगत की उत्पत्ति हुई। काम-काज, जगत-व्यवहार की प्रवृत्ति की। यह जगत का पालन-पोषण हुआ। रात को निद्रा में गये, सब जगत समेट लिया, छू कर दिया। यह प्रलय हुआ। इस प्रकार तुम भी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते हो। वे समष्टि के ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं और तुम अपने व्यष्टि शरीर के ब्रह्मा, विष्णु, महेश हो।

समष्टि चेतन और व्यष्टि चेतन में उपाधि भेद है, अधिष्ठान से भेद नहीं है। जैसे घड़े का आकाश और मठ का आकाश। घड़ा छोटा है और मठ बड़ा है। घड़े का आकाश घड़े की उपाधि के कारण छोटा लगता है और मठ का आकाश मठ की उपाधि से बड़ा लगता है। घड़े को और मठ को हटा दो तो आकाश एक ही है।

ऐसे ही ईश्वर भाव और जीवभाव की उपाधि हटा दो तो ब्रह्म एक ही है, चैतन्य परमात्मा एक ही है। घड़े में आया हुआ आकाश घटाकाश है ऐसे ही प्रकृति के पंचभौतिक देह में आया हुआ चैतन्य अपने को जीव मानता है। माया में आया हुआ चैतन्य अपने को ईश्वर जानता है। वह अपने को ईश्वर जानता है और यह कमबख्त अपने को जीव मानता है। वह प्रकृति के आधीन है और ईश्वर प्रकृति को वश में रखता है।

जनाबे कुदरत की इक ज़ुबाँ महसूस करो,
रब्त ए रूह  खुद बयाँ करती है.

जलों  तुम अक्सर चराग़ाँ की तरहा,
फ़ितरते ए रूह  खुद बयाँ करती है.

भगवान शंकर वशिष्ठजी महाराज से कहते हैं- हे मुनीश्वर इस प्रकार की जिसकी मति है वह सदा उस आत्म-परमात्मदेव का पूजन करता है। सुख-दुःख में सम रहना, लाभ-हानि में सम रहना यह उस देव की अर्चना है। तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण इन तीनों गुणों से जो क्रिया-कलाप होता है वह उस परमात्म-शिव की सत्ता से होता है। ऐसा समझकर शान्तात्मा होना यह उस कल्याण-स्वरूप शिव को बिल्वपत्र चढ़ाना है। यह जो कुछ दृश्यमान जगत है वह पंचभौतिक है। वह प्रकृति की सत्ता से संचालित होता है। प्रकृति और जगत में ओतप्रोत चिदाकाश स्वरूप देव व्याप्त है ऐसा समझना उस कल्याण-स्वरूप शिव को पंचामृत से स्नान कराना है। जहाँ कहीं उस देव को निहारना, आत्मप्रकाश से देखना यह उस देव के आगे दीया करना है। ऐसे सर्वव्यापक देव की मीठी स्मृति, मीठी समझ की सुवास फैलाना यह उस देव को धूप-दीप करना है। बुद्धिमानों के लिए यह अन्तरंग देव की उपासना है। जो बालक मति के हैं उनके लिए लोटे में जल ले जाना, वृक्ष से बिल्वपत्र ले जाना, चंदन-धूप-दीप से शिवालय में पूजा करने का विधान ऋषिश्वरों ने बनाया है। जो दस कोस नहीं चल सकते उनके लिए दो फर्लांग भी चलना अच्छा है। ऐसा करते-करते वे ऊँचाई पर आयेंगे तब इस अन्तरंग देव की उपासना करके उस देव से एक हो जाएँगे।
बदल रहा मंज़र खिल गयी तक़दीरें,
ईन्साफ़ ए रूह खुद बयाँ करती है.

उल्फ़त का मजमून हैं कायनाते उफ़क़,
 तर्जुमा ए रूह खुद बयाँ करती है.

आत्मदेव की पूजा-अर्चना कैसे की जाती है ? वृत्ति का अपने आत्मानुभव में रहना ही उस आत्मदेव की पूजा है। वृत्ति जहाँ से उठती है उस चैतन्य में सदा 'मैं' रूप से स्थित होना ही आत्मदेव की अर्चना है। जैसे तरंग जिस पानी से उठती है उस पानी को ही अपना स्वरूप माने। तरंग अपने को पानी से अलग न माने अपितु पानी ही माने तो वह शहनशाह है। एक तरंग कह दे कि मुझमें बड़ी-बड़ी स्टीमरें चलती हैं, हजारों-हजारों मच्छ कच्छ मुझमें ही घूमते फिरते हैं, अगर वह अपने को ससीम मानकर कहे तो यह अहंकार है। तरंग अगर अपने को जल मानकर ऐसा कहे तो यह बन्दगी है। ऐसे ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष कहते हैं कि अनंत अनंत सृष्टियाँ मुझ ही में हैं तो वे अपने को देह नहीं मानते। महापुरुष सोऽहम् कहते हैं, शिवोहम कहते हैं अथवा स्वामी रामतीर्थ मैं शाहों का शाह हूँ.. कहते हैं,मैं देवों का देव हूँ, मुझमें अनंत सृष्टियाँ हैं. मैं ईश्वरों का ईश्वर हूँ आदि कहते हैं तब अपने को देह मानकर नहीं अपितु ब्रह्मस्वरूप मानकर कहते हैं। अपना सर्वोच्च अनुभव इस प्रकार साधकों की उन्नति के लिए कभी-कभी प्रकट कर देते हैं।

किन्हीं अनजान लोगों ने रामतीर्थ से पूछाः

आप देवों के देव हैं

आप ईश्वर हैं ?

हाँ, मैं ईश्वर हूँ…. ब्रह्म हूँ।

सूरज, चाँद, तारे आपने बनाये ?
हाँ, जब से हमने बनाये हैं तबसे हमारी आज्ञा में चल रहे हैं।
आप तो अभी आये। आप की उम्र तो तीस-इक्कतीस साल की है !
तुम इस विषय में बालक हो। मेरी उम्र कभी हो नहीं सकती। मेरा जन्म ही नहीं तो मेरी उम्र कैसे हो सकती है ? जन्म इस शरीर का हुआ। मेरा कभी जन्म नहीं हुआ।

न मे मृत्युशंका न में जातिभेदः

पिता नैव मे नैव माता न जन्मः

न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

ज्ञान तीन प्रकार का होता हैः एक इन्द्रियगत ज्ञान, दूसरा बुद्धिगत ज्ञान और तीसरा सनातन ज्ञान। इन्द्रियगत ज्ञान अज्ञान है। अज्ञान है इसका मतलब यह नहीं कि ज्ञान का अभाव। इन्द्रियगत ज्ञान ज्ञान तो है लेकिन अधूरा ज्ञान है। आँखें देखती हैं लेकिन उसमें बुद्धिवृत्ति न मिलाओ तो सामने दिखने वाला व्यक्ति कौन है….. कैसा है इसका पता नहीं चलेगा। आँख तो दिखा देती है कढ़ाई जैसा आकाश लेकिन बुद्धि का उपयोग करेंगे तो पता चलेगा कि आकाश कढ़ाई जैसा दिखता है पर वास्तव में वैसा है नहीं। आँख की डीझाइन ऐसी है और खूब दूरी है इसलिए आकाश कढ़ाई जैसा लगता है।

ठूँठे में चोर दिखता है पर चोर है नहीं। आँख दिखा देती है सब लेकिन वह सब वास्तविक ज्ञान नहीं है।

इन्द्रियाँ कह देती हैं कि यह अच्छा है लेकिन जो सब अच्छा है वह सब ले लेने का नहीं है। उसमें तुम्हारा अधिकार है कि नहीं यह सोचना पड़ेगा। यहाँ धर्म की जरूरत पड़ेगी। किसी का मकान अच्छा है, किसी का स्कूटर अच्छा है, किसी की गाड़ी अच्छी है, किसी की पत्नी अच्छी है, किसी का पुत्र अच्छा है, किसी का कुछ अच्छा है…. तुम्हें जो अच्छा लगे वह सब लेते जाओ ऐसा नहीं है। वहाँ धर्म की जरूरत है, नियंत्रण की जरूरत है।

व्यर्थ के आकर्षण से आदमी इतना बदल गया है कि खुद आनन्द-स्वरूप होते हुए, सुख-स्वरूप होते हुए ईश्वर का सनातन अंश होते हुए भी वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है। ऐसे आदमी की बुद्धि मोह रूपी दलदल में फँसी है। उसे धर्म का, सत्संग का, ईश्वर का कोई ख्याल नहीं है। ऐसे आदमी को पशु कह दें तो पशुओं का अपमान हो जाता है। पशु नाराज हो जाएँगे। पशु तो अपने कर्मों को काटकर उन्नति की ओर जा रहे हैं जबकि ऐसा आदमी अपने पुण्यों का नाश करके पतन की ओर जा रहा है। पशु तो उन्नत होता-होता इन्सानियत की ओर आ रहा है। आदमी अगर इन्द्रियगत ज्ञान के बहाव में बहता जाय तो पशुओं से भी बदतर दशा में चला जाय।

बुद्धिगत ज्ञान का आदर करने से आदमी का चित्त कामना रहित होता है। कामना रहित चित्त में एक अनोखा सामर्थ्य पैदा होता है। जो जरूरी है वह उसके द्वारा होने लगता है। जो बिन जरूरी है वह उसकी हाजरी मात्र से रूकने लगता है। सूर्यनारायण की हाजरी मात्र से फूल खिलने लगते हैं, पक्षी किल्लोल करने लगते हैं, हवाएँ शुद्ध होने लगती हैं, हानिकारक जन्तुओं का नाश होने लगता है। श्रीकृष्ण की हाजरी मात्र से ग्वाल और गोपियों को आनन्द आने लगता है। माँ का चित्त महकने लगता है। दुर्जनों का चित्त भयभीत होकर उनकी प्राणशक्ति क्षीण होने लगती है।

रावण को रामजी ने नहीं मारा। रावण ने राम जी के द्वारा अपने आपको मरवाया।

आत्मशक्ति क्षीण करने वाली दो मुख्य चीजें हैं- सुख की लालसा और दुःख का भय।

अगर नगण्य वस्तु में भी तुम विश्वास करते हो तो तुम्हारा चैतन्य वहाँ से भी तुम्हें सहाय करता है तो सचमुच में विधिवत् प्राणप्रतिष्ठा हुई हो ऐसी मूर्ति की आराधना उपासना से अथवा सच्चे कोई आत्मवेत्ता संत, जो अमूर्त आत्मा में टिके हो, रमण महर्षि जैसे, रामकृष्ण जैसे, लीलाशाह बापू जैसे ब्रह्मवेत्ता आत्म-साक्षात्कारी पुरुषों के प्रति श्रद्धा-भक्ति से इस लोक और परलोक में लाभ सहज में होने लगे इसमें क्या आश्चर्य है ? गुरु ने विधिवत् मंत्र दिया हो उसका जप करें, जिन्होंने अपने आत्म-स्वरूप को पाया है ऐसे महापुरुषों के मार्गदर्शन पर चलने लग जायें तो कल्याण होने में कोई सन्देह नहीं है। तुम्हारी भावना के बल से खड़िया पलटनवाले बाबाजी का स्टीकर इतना काम कर सकता है तो जो सचमुच में जगे हैं ऐसे वेदव्यासजी, श्रीकृष्ण, श्रीरामजी, संत कबीर जी, ज्ञानेश्वर महाराज, एकनाथजी महाराज, पूज्यपाद लीलाशाहजी भगवान आदि आदि सत्पुरुषों की बात को पकड़कर चलने लग जायें तो कितना काम हो जायेगा ! उसको तो पैडल रिक्शा में से टैम्पो मिला लेकिन तुमको तो जीव में से ब्रह्म मिल जायेगा।

गीता ने कहाः

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।

जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के, तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक कर्मों का ऋणानुबन्ध चुकाना ही पड़ता है। अतः निष्काम कर्म करके ईश्वर को सन्तुष्ट करें। अपने आत्मा परमात्मा का अनुभव करके यहीं पर, इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करें।

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान।।

अभ्यास ही गुरु है।तुम कठिन से कठिन अभ्यास करो, साधना का अभ्यास करो तो तुम अपने साध्य तक पहुँच जाओगे। अन्यथा, गुरु तुम पर दया करके यदि कोई चमत्कार भी कर दिखायें और तुम्हें समाधि-दशा में भी पहुँचा दें, पर अभ्यास के अभाव में तुम उसका सत्फल नहीं प्राप्त कर सकोगे और तुम्हारी स्थिति त्रिशंकू की भाँति बन सकती है। अतः गुरु-उपदेश को श्रवण करने के लिए सदैव तत्पर रहो। गुरु-आश्रम में रहकर योगाभ्यास करने वाला शिष्य विविध विघ्न-बाधाओं से निर्भीक रहता है। जो भी संकट साधना-यात्रा में आते हैं, उन्हें सहर्ष पार कर जाते हैं।

जब तक मनुष्य को अपनी वर्त्तमान स्थिति की तुच्छता का ख्याल नहीं आता और अपनी महान स्थिति को पाने की इच्छा नहीं होती तब तक भले ही ब्रह्माजी का उपदेश देते हों या साक्षात् श्रीहरि अवतरित हो जायें फिर भी विवेक नहीं जागेगा।

विकार पहले मन में उठता है। फिर इन्द्रियों में आकर तुम्हें गिराता है। धन में विकार उठे और बुद्धि उसे सहयोग न दे तो तुम निर्विकारीता में आ जाओगे। विकार उठने के प्रसंग में बुद्धि अगर भगवान की शरण ले ले कि, हे भगवान ! हे दयालु प्रभु ! तू मुझे बचा। मेरे मन में अभी विकार उठ रहे हैं, मुझे कुसंकल्प हो रहे हैं, मनुष्य जन्म मिला है, सत्संग मिला है…. अभी मुझमें लोभ आ रहा है, मुझमें काम आ रहा है, मुझमें क्रोध आ रहा है, मुझमें मोह जग रहा है। हे मेरे नाथ ! मैं तेरी शरण हूँ; तो तुरन्त वह अन्तर्यामी तुम्हें प्रेरणा करेगा कि अब ऐसा करो, विकारों से बचने का यह तरीका है।

माया तो घेरेगी ही, उसका झमेला तो इर्दगिर्द आयेगा ही, मन का तो सदियों से विकारी होने का स्वभाव है। अगर भीतर ही भीतर भगवान की शरण ली जाय, भगवान को प्रार्थना की जाय तो विकारों से उबारना बड़ा आसान है। उसमें दस वर्ष भी नहीं चाहिए, दस महीने भी नहीं चाहिए अगर यह तरीका आ जाय।

दुनियाँ के हंगामों में आँख हमारी लग जाये

हे मेरे मालिक तू मेरे ख्वाबों में आना…..

प्यार भरा पैगाम लिये….।।

ब्रह्मविद्या के अधिकारी-कृत उपासक। अकृत उपासक।

कृत उपासक
जो अधिकारी साधक उपासना द्वारा अपने उपास्य देवता का साक्षात्कार होने तक तत्त्वज्ञान या ब्रह्मविद्या आत्मसात् करने के लिए प्रवृत्त होता है वह कृत उपासक कहलाता है। ऐसे कृत उपासक साधकों का वासनाक्षय और मनोनाश तत्त्वज्ञान होने के पूर्व ही उपासना द्वारा काफी मात्रा में सिद्ध हो जाता है। अतः तत्त्वज्ञान होने के बाद उनको जीवनमुक्ति सहज सिद्ध हो जाती है।

जो अधिकारी साधक किसी प्रकार की उपासना किये बिना तत्त्वज्ञान या ब्रह्मविद्या आत्मसात् करने के लिये प्रवृत्त होता है वह अकृत उपासक कहलाता है। आजकल प्रायः सब जिज्ञासु साधक अकृत उपासक ही देखे जाते हैं। तत्त्वज्ञान की महिमा सुनकर उसकी प्राप्ति के लिए उत्सुक हो जाते हैं। असम्प्रज्ञात समाधियोग के बिना ही ऐसे साधक जड़-चेतन का विवेक करके कुछ समय के लिये मनोनाश एवं वासनाक्षय का पुरुषार्थ करते हैं। शमदमादि साधनों से श्रवण, मनन व निदिध्यासन का संपादन करते हैं। इस प्रकार क्रमशः तमाम सांसारिक बन्धनों का नाश करने वाले तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं। इस तत्त्वज्ञान के द्वारा वे अविद्याग्रंथि, सन्देह, कर्म, जन्म और मरणादि सब बन्धनों से आखिर में मुक्त हो जाते हैं लेकिन अभी उनको जीवन्मुक्तावस्था प्राप्त नहीं होती।

कठ एवं मुण्डकोपनिषद् के मंत्रों से भी सिद्ध होता है कि जो पुरुष हृदयरूपी गुहा में ब्रह्मरूप चैतन्य का साक्षात्कार करता है वह अविद्याग्रंथि और हृदयग्रंथि का नाश करके, सब सन्देहों को निर्मूल करके प्रारब्ध कर्म के सिवाय संचित व क्रियमाण कर्मों का नाश करता है। मन का निरोध होने पर जिस पुरुष को सदा पवित्र रहने वाले आत्मा का साक्षात्कार होता है…. आकाशरूप हृदयगुफा में स्थित सच्चिदानंदस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होता है उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं। वह ऐसे पद को पाता है जहाँ से वापस लौटना नहीं पड़ता। उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
मनोनाश और वासनाक्षय
अकृत उपासक में से तत्त्वज्ञान सिद्ध करके बने हुए आत्मज्ञानी ने प्रारम्भ में तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिये कुछ समय के लिये मनोनाश व वासनाक्षय किया था। लेकिन उसके लिये दृढ़ अभ्यास के अभाव से, भोग देने वाले प्रारब्ध कर्मों के कारण से मन व वासना पुनः प्रकट होते हैं। इसलिए अकृत उपासक में से तत्त्वज्ञानी बने हुए पुरुष को तत्त्वज्ञान प्राप्त करने के लिए यद्यपि पुनः पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता लेकिन मनोनाश व वासनाक्षय के लिये पुरुषार्थ अवश्य करना पड़ता है।

मनोनाश क्या है?
श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण में मुनिशार्दूल महाराज वशिष्ठजी कहते हैं- “हे रघुकुलतिलक श्रीराम ! साक्षी आत्मा की उपाधिरूप मन को साक्षी आत्मा से अलग करके साक्षी आत्मा होना यह मनोनाश है”

मन का नाश करने के दो उपाय हैं- योग और ज्ञान।

योग माने सब वृत्तियों के निरोधरूप असम्प्रज्ञात समाधि। इस असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति सम्प्रज्ञात समाधि से होती है। सम्प्रज्ञात समाधि आत्माकार वृत्तियों के प्रवाहयुक्त अंतःकरण से साक्षी चैतन्य का अनुभव होता है। असम्प्रज्ञात समाधि में तमाम वृत्तियों का निरोध हो जाने से अंतःकरण शांत हो जाता है। वृत्तिसहित अंतःकरण शुद्ध साक्षीस्वरूप हो जाता है। दोनों समाधियों में इतना ही भेद है।

वासना का क्षय कैसे होता है?
वासना के स्वरूप को जाने बिना वासना का नाश नहीं हो सकता। वासनाक्षय करने से पहले वासना का स्वरूप जान लेना आवश्यक है। वासना का स्वरूप बताते हुए श्री वशिष्ठजी महाराज कहते हैं-

“अपने अपने देश, काल, आचार तथा कुलधर्म में, अपने स्वभाव में जो अच्छे या बुरे शब्द हैं उनमें जीव का अभिमान होता है। इस अभिमान की दृढ़ भावना से आगे-पीछे का विचार किये बना पदार्थों का ग्रहण किया जाता है। इस ग्रहण से जो सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न होते हैं उन्हें ‘वासना’ कहते हैं।

अंतत: ईश्वर अनुसन्धान आत्म अनुसन्धान ही हैं. हर दृश्य वस्तु का सार पृथ्वी तत्व हैं, पृथ्वी का सार जल तत्व, जल तत्व का सार तेज तत्व, तेज तत्व का सार वायु तत्व, वायु तत्व का सार आकाश तत्व, आकाश का सार महातत्व, महातत्व का सार प्रकृति, प्रकृति का सार आत्मा चैतन्य ! इस समझ को शुद्ध अंत: करण में उसीकी सत्ता से समझना ईश्वर-आत्मा अनुसन्धान होता हैं।

Advertisements
Standard

Your Opinion

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s