प्रश्नोत्तरी

अनुष्ठान सम्बन्धी कुछ प्रश्न

anusthan prashna

प्रश्नः जप करते समय भगवान के किस स्वरूप का विचार करना चाहिए?

उत्तरः अपनी रूचि के अनुसार सगुण अथवा निर्गुण स्वरूप में मन को एकाग्र किया जा सकता है। सगुण का विचार करोगे, फिर भी अंतिम प्राप्ति तो निर्गुण की ही होगी। जप में साधन और साध्य एक ही हैं जबकिअन्य साधना में दोनों अलग हैं। योग में अष्टांग योग का अभ्यास साधना है और निर्विल्प समाधि साध्य है। वेदांत में आत्मविचार साधन के और तुरीयावस्था साध्य है। किन्तु जप-साधना में जप के द्वारा हीअजपा स्थिति को सिद्ध करना है अर्थात् सतर्कपूर्वक किये गये जप के द्वारा सहज जप को पाना है। मंत्र के अर्थ में तदाकार होना ही सच्ची साधना है।

 

प्रश्नः क्या दो या तीन मंत्रों का जप किया जा सकता है?

उत्तरः नहीं, एक समय में एक ही मंत्र और वह भी सदगुरु प्रदत्त मंत्र का ही जप करना श्रेष्ठ है। यदि आप श्री कृष्ण भगवान के भक्त हैं तो श्रीरामजी, शिवजी, दुर्गामाता, गायत्री इत्यादि में भी श्रीकृष्ण के ही दर्शनकरो। सब एक ही ईश्वर के रूप हैं। श्री कृष्ण की उपासना ही श्रीराम की या देवी की उपासना है। सभी को अपने इष्टदेव के लिए इसी प्रकार समझना चाहिए। शिव की उपासना करते हैं तो सबमें शिव की ही स्वरूपदेखें।

 

प्रश्नः क्या गृहस्थ शुद्ध प्रणव का जप कर सकता है?

उत्तरः सामान्यतया गृहस्थ के लिए केवल प्रणव यानि ‘ॐ’ का जप करना उचित नहीं है। किन्तु यदि वह साधन-चतुष्टय से सम्पन्न है, मन विक्षेप से मुक्त है और उसमें ज्ञानयोग साधना के लिए प्रबल मुमुक्षत्व हैतो वह ॐ’ का जप कर सकता है।

 

प्रश्नः नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र है या षडाक्षरी? इसका अनुष्ठान करना हो तो कितने लाख जप करें?

उत्तरः केवल नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र है एवं नमः शिवाय’ षडाक्षरी मंत्र है। अतः इसका अनुष्ठान तदनुसार करें।

 

प्रश्नः जप करतेकरते मन एकदम  शांत हो जाता है एवं जप छूट जाता है तो क्या करें?

उत्तरः जप का फल ही है शांति और ध्यान। यदि जप करते-करते जप छूट जाये एवं मन शांत हो जाये तो जप की चिंता न करो। ध्यान में से उठने के पश्चात पुनः अपनी नियत संख्या पूरी कर लो।

 

प्रश्नः जब जप करते हैं तो कामक्रोधादि विकार अधिक सतातेसे प्रतीत होते हैं और जप करना छोड़ देते हैं। क्या यह उचित है?

उत्तरः कई बार साधक को ऐसा अनुभव होता है कि पहले इतना काम-क्रोध नहीं सताता था जितना मंत्रदीक्षा के बाद सताने लगा है। इसका कारण हमारे पूर्वजन्म के संस्कार हो सकते हैं। जैसे घर की सफाई करने परकचरा निकलता है, ऐसे ही मंत्रजाप करने से कुसंस्कार निकलते हैं। अतः घबराओ नहीं, न ही मंत्रजप करना छोड़ दो वरन् ऐसे समय में दो-तीन घूँट पानी पीकर थोड़ा कूद लो, प्रणव का दीर्घ उच्चारण करो एवं प्रभुसे प्रार्थना करो। तुरंत इन विकारों पर विजय पाने में सहायता मिलेगी। जप तो किसी भी अवस्था में त्याज्य नहीं है।

 

प्रश्नः अधिक जप से खुश्की चढ़ जाये तो क्या करें?

उत्तरः जप से खुश्की नहीं चढ़ती, वरन् साधक की आसावधानी से खुश्की चढ़ती है। नया साधक होता है, दुर्बल शरीर होता है एवं उत्साह-उत्साह में अधिक प्राणायाम करता है, फिर भूखामरी करता है तो खुश्कीचढ़ने की संभावना होती है। अतः उपरोक्त कारणों का निराकरण कर लो। फिर भी यदि किसी को खुश्की चढ़ ही जाये तो प्रातःकाल सात काजू शहद के साथ लेना चाहिए अथवा भोजन के पश्चात बिना शहद के सातकाजू खाने चाहिए। (सात से ज़्यादा काजू दिनभर में खाना शरीर के लिए हितावह नहीं है।) इसके अलावा सिर के तालू पर एवं ललाट के दोनों छोर पर गाय के घी की मालिश करो। इससे लाभ होता है। खुश्की चढ़नेमें, पागलपन में पक्के पेठे का रस या उसकी सब्जी हितावह है। कच्चे पेठे नहीं लेना चाहिए। आहार में घी, दूध, बादाम का उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने से ठीक होता है। खुश्की या दिमाग की शिकायत मेंविद्युत का झटका दिलाना बड़ा हानिकारक है।

 

प्रश्न: स्वप्न में मंत्र दीक्षा मिली हो तो क्या करें ? क्या पुनः प्रत्यक्ष रूप में मंत्र दीक्षा लेना अनिवार्य है ?

उत्तर: हाँ

 

प्रश्न: पहले किसी मंत्र का जप करते थे, वही मंत्र यदि मंत्रदीक्षा के समय मिले, तो क्या करें ?

उत्तर: आदर से उसका जप करना चाहिए | उसकी महानता बढ़ जाती है |

 

प्रश्न: मंत्रदीक्षा के समय कान में अंगुली क्यों डलवाते हैं ?

उत्तर: दायें कान से गुरुमंत्र सुनने से मंत्र का प्रभाव विशेष रहता है ऐसा कहा गया है |

 

प्रश्न: यदि गुरुमंत्र लिया हो, फिर भी अनुष्ठान किया जा सकता है क्या ?

उत्तर: हाँ, किया जाता है |

 

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