संत वाणी

इश्क इलाही

ilahi

पठान परिवार का 20 वर्षीय स्वरूपवान युवक रज्जब अली खां दुल्हा बना, सर पर सेहरा बांधे बारात के साथ अपना ब्याह रचाने जा रहा था, साथ में उसका छोटा भाई भी था। संवत् 1644 की यह बात है। बारात सांगानेर (राजस्थान) से आमेर जा रही थी, जहां लड़की वाले बारात आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। आमेर के निकट बारात पहुंची तो दूल्हे को सहसा याद आया कि प्रसिद्ध संत दादू जी यहीं रहते थे। अत: वह अपने परिजन बारातियों के साथ दादूजी के यहां गया। सन्ध्या हो चुकी थी। दादू जी उस समय ध्यानस्थ थे, अत: इन लोगों को कुछ देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। बाराती तो चलने के लिए उतावले थे, पर पठान दूल्हा शांत भाव से संत के यहां बैठा ही रहा कि संत ध्यान करके उठें तो मिलूं। अंतत: संत ध्यान करके उठे तो देखा, एक सजा-धजा सेहरा बांधे दूल्हा अपने साथियों के साथ बैठा है। दूल्हे ने जैसे ही उन्हें प्रणाम किया तो संत कह उठे-

“रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर।

आया था हरि-भजन को, करै नरक का ठौर।।’

अर्थात्, “रज्जब अली! तूने तो गजब कर दिया, जो अपने सर पर ब्याह का मौर बांधकर ब्याह रचाने चला है, क्योंकि तू तो भगवान का भजन करने के लिए संसार में आया था, लेकिन अब जा रहा है नरक में जगह बनाने।’ और रज्जब भी क्या खूब आदमी था। जैसे ही दादू के ये शब्द उसने सुने, पता नहीं उसे क्या हुआ, चट अपना मौर-सेहरा और दूल्हे का वेश सब कुछ उतारकर साथी को थमा दिया और बोला, “दादू, मुझे सोते से जगा दिया। मैं अब विवाह नहीं करूंगा। जिन्दगी भर अविवाहित रहकर संत-सेवा, हरि का भजन करूंगा।’ फिर सेहरा और मौर आदि अपने छोटे भाई को थमाकर बोला- “भैया! उस लड़की से तू ही शादी कर ले, जिससे उसके घर वाले दु:खी न हों।’ भाई और बाराती स्तब्ध, अवाक्। सच ही रज्जब को वैराग्य हो गया। यद्यपि संत दादू ने भी उससे कहा था, “रज्जब! तेरी इच्छा हो तो जा, विवाह करके गृहस्थी कर। मेरे कहे को भूल जा।’, पर रज्जब अपने निश्चय पर अटल रहा, बोला, “यह जन्म तो भजन करते ही बिताऊंगा, चाहे जो हो।’ साथ ही उसने वहीं संत दादू से दीक्षा भी ले ली। छोटे भाई ने उस लड़की से विवाह कर लिया। और रज्जब गुरु के साथ ही रहकर उनकी सेवा तथा हरिभक्ति में लीन रहने लगा। घर-परिवार छूट गया। उन्होंने आगे चलकर दादू की वाणी, भक्ति-पदों का संकलन किया, जो आज हिन्दी जगत को उपलब्ध है। वे स्वयं भी काव्य-रचना में सक्षम हुए। एक बार अकबर का चहेता कवि (चारण) दूरसा आढ़ा, जिसे जहांगीर ने भी पुरस्कृत किया था, रज्जब को चुनौती दे बैठा। उसने यह दोहा सुनाकर उसका उत्तर मांगा कि-

“बावन अक्षर सप्त स्वर, गल भाषा छत्तीस।

इतने ऊपर जो कथे, तो मानूं कवि ईश।’

साथ ही शर्त रखी कि “यदि मैं रज्जब से परास्त हो गया तो अपने पास पुरस्कार में प्राप्त सब कुछ रज्जब को सौंप दूंगा। अगर रज्जब हारा तो उसे मेरी पालकी कंधे पर उठाकर चलना होगा।’ परन्तु रज्जब ने उसके दोहे के जवाब में यह दोहा पढ़कर उसे लज्जित कर दिया कि,

“बावन अक्षर सप्त स्वर, गल भाषा छत्तीस।

इतने ऊपर हरि-भजन, अनअक्षर जगदीश।’

अर्थात् सभी अक्षरों, सप्त स्वरों तथा 36 भाषाओं से भी ऊपर है भगवान हरि का भजन और जगदीश नाम सभी अक्षरों से ऊपर है। तब वह चारण भी रज्जब का शिष्य बन गया।

रज्जब एक कथा वाचक पंडित की कथा सुनने जाता था। उस पंडित की श्ौली उन्हें अत्यधिक रुचती थी। आगे चलकर रज्जब भी उसी की श्ौली में हरि-कथा कहने लगा। एक बार संत दादू शिष्य मण्डली सहित यात्रा कर रहे थे, तो मार्ग में छिछले पानी वाला नाला पड़ा, जिसमें कीचड़ भरा था। दादू जी के शिष्य उस नाले को पत्थरों से पाटने के लिए पत्थर खोजने लगे, जिससे गुरुदेव बिना कीचड़ में पैर रखे पार जा सकें। तभी रज्जब उस छिछले नाले में जा लेटा और दादू से आग्रह किया कि “आप मेरे ऊपर पैर रखते हुए पार चले जाइए।’ दादू उसके ऊपर पैर रखते हुए उस पार चले गए। बाद में जब दादू संसार छोड़ गए तो उनके वियोग में गुरुभक्त रज्जब ने अपनी आंखें ढांप लीं, ताकि वे किसी को देख न सकें। जब संतों ने उन्हें आंखें खोलने के लिए विवश करना चाहा तो रज्जब ने उनसे कहा-“गुरुदेव चले गए। अब मैं दुनिया में देखूं तो किसे देखूं! कौन है देखने लायक? मुझे तो अपने गुरुदेव के दर्शन की ही सदैव अभिलाषा रही थी, वे नहीं रहे तो अन्य किसी को देखने की मेरी इच्छा नहीं है।’ संत रामचरणदास ने रज्जब के लिए ठीक ही कहा है-

“दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रज्जब सा जाण।

एक शब्द में उद्धरा, रही न खेंचा तान।।’

सच ही दादू के शब्दों से रज्जब का उद्धार हो गया था, क्योंकि रज्जब ने जीवन में मात्र यही चाहा कि,

“रज्जब’ की अरदास यह, और कहै कछु नाहिं।

यो मन लीजै हेरि, मिले न माया माहिं”।

अर्थात् “रज्जब की मात्र यही अरदास है कि, हे हरि! आप एक बार मेरे मन को अपना लें, जिससे कि वह माया में लिप्त न हो।’ रज्जब दीर्घायु बिताकर संवत् 1946 में 122 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए। वे “रसखान’ के पथ के ही पथिक रहे और दोनों ही पठान परिवारों के रत्न थे।

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