#Justice4Bapuji

अति हो गयी जुल्म की

julm ki ati ho gyi

ओ तूफान ! उठ ! जोर-शोर से आँधी और पानी की वर्षा कर दे | ओ आनन्द के महासागर ! पृथ्वी और आकाश को तोड़ दे | ओ मानव ! गहरे से गहरा गोता लगा जिससे विचार एवं चिन्ताएँ छिन्न-भिन्न हो जायें | आओ, अपने हृदय से द्वैत की भावना को चुन-चुनकर बाहर निकाल दें, जिससे आनन्द का महासागर प्रत्यक्ष लहराने लगे |
 ओ प्रेम की मादकता ! तू जल्दी आ | ओ आत्मध्यान की, आत्मरस की मदिरा ! तू हम पर जल्दी आच्छादित हो जा | हमको तुरन्त डुबो दे | विलम्ब करने का क्या प्रयोजन ? मेरा मन अब एक पल भी दुनियादारी में फँसना नहीं चाहता | अतः इस मन को प्यारे प्रभु में डुबो दे | ‘मैं और मेरा …तू और तेरा’ के ढेर को आग लगा दे | आशंका और आशाओं के चीथड़ों को उतार फेंक |टुकड़े-टुकड़े करके पिघला दे | द्वैत की भावना को जड़ से उखाड़ दे | रोटी नहीं मिलेगी ? कोई परवाह नहीं | आश्रय और विश्राम नहीं मिलेगा ? कोई फिकर नहीं | लेकिन मुझे चाहिये प्रेम की,उस दिव्य प्रेम की प्यास और तड़प |
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