श्रीमद् भगवद् गीता

श्रीमद् भगवद्गीता :1-5 अध्याय

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इसमें पहला अध्याय है अर्जुनविषादयोग । अर्जुन ने महाभारत के युद्ध के मैदान में जब अपने सगे-संबंधियों को देखा तो ‘उनके साथ युद्ध करना पडेगा और युद्ध में वे मारे जायेंगे’ – ऐसा सोचकर वह खिन्न हो गया । उसका मन विषाद से इतना भर गया कि वह धनुष-बाण छोडकर रथ पर बैठ गया ।
जीवन में विषाद तो हर किसीको आता है लेकिन उस विषाद को अगर भगवान के सामने रखो, भगवान के आगे अपनी व्यथा प्रकट करो तो आपका विषाद भी योग बन जायेगा ।
जैसे अर्जुन ने श्रीकृष्ण के आगे अपनी व्यथा प्रकट कर दी कि ‘युद्ध के लिये तैयार खडे हुए स्वजनों को मारकर पाया हुआ राज्य मुझे नहीं चाहिए । मैं ऐसा पापकर्म नहीं करूँगा । इससे तो अच्छा यह होगा कि मुझ शस्त्ररहित को कौरव रण में मार दें ।‘
लेकिन श्रीकृष्ण ने देखा कि स्वजनों के मोह के कारण यह ऐसी कायरतापूर्ण बातें कर रहा है । तब दूसरे अध्याय में उन्होंने अर्जुन को हृदय की दुर्बलता का त्याग करके युद्ध के लिए तैयार हो जाने का उपदेश दिया । यह दूसरा अध्याय सांख्ययोग है, ज्ञानयोग है ।
संसार में रहकर र्इंट, चूना, लोहे-लक्कड का ज्ञान तो हर कोई पा लेता है । लेकिन यहाँ भगवान वह ज्ञान पाने को नहीं कह रहे हैं । यहाँ तो वे भगवतत्व संबंधी ज्ञान की बात कर रहे हैं । देह की नश्वरता और आत्मा की अमरता का ज्ञान पाने की बात कर रहे हैं । स्वधर्म का आचरण कैसे किया जाय, यह समझा रहे हैं । भगवान अर्जुन से कह रहे हैं : ‘‘जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और आत्मा तो न कभी जन्मता है, न मरता है । फिर शोक किसका करना ? अगर स्वधर्म को नहीं निभायेगा यानी सहज कर्तव्य कर्म को नहीं करेगा, क्षात्रधर्म के अनुसार युद्ध नहीं करेगा तो तेरी अपकीर्ति होगी जो तेरे लिए मरण से भी बढकर दुःखदायी होगी ।‘
इसलिए हरेक मनुष्य को संस्कारप्राप्त सहज कर्तव्यकर्म को करते-करते अमर आत्मा का ज्ञान पा लेना चाहिए । फल की आशा छोडकर अपने कर्तव्यकर्म को उत्तम रीति से करनेवाला पुरुष स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिवाला) हो जाता है । समय पाकर वह जन्म-मरणरूप बन्धन से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त हो जाता है ।
तीसरा अध्याय कर्मयोग है । कर्म तो सब करते हैं लेकिन वे कर्म करके बंधन बनाते हैं । कोई विरला गुरुमुख कर्म को योग बना लेता है । कर्म के ऐहिक फल का त्याग करके कर्मयोगी अनंतगुना फल पा लेता है । जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे । भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है : ‘‘मुझ अंतर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त के द्वारा संपूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और संतापरहित होकर युद्ध कर ।‘ ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नाम के चौथे अध्याय में भगवान कहते हैं : ‘‘बहुत काल से लुप्तप्राय हुए इस अविनाशी योग को मैंने सूर्य से कहा था ।‘ तब आश्चर्य प्रकट करते हुए अर्जुन ने कहा : ‘‘आपका जन्म अर्वाचीन है और सूर्य तो प्राचीन है, फिर आपने सूर्य से अविनाशी योग कैसे कहा ?’
श्रीकृष्ण कहते हैं : ‘‘जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब मैं अपनी योगमाया से, अपने अविनाशी स्वरूप को साकार रूप में प्रकट करने की शक्ति से साकार रूप में प्रकट होता हूँ । मेरे बहुत अवतार हो चुके हैं एवं तुम्हारे भी बहुत जन्म हो चुके हैं । मैं उन सबको जानता हूँ , तुम नहीं जानते ।
स्वधर्म का पालन करते रहना ठीक है, पर उसके साथ चित्तशुद्धि भी जरूरी है । कर्म करें लेकिन वह कर्म पूरे मनोयोग से करें तो वह कर्म विकर्म बन जाएगा, विशेष कर्म बन जायेगा ।
कर्म की गति गहन है, इसलिए कर्म के तत्त्व को भली-भाँति समझकर कर्मबन्धन से मुक्त हो जाना ही बुद्धिमानी है । आसक्तिरहित होकर कर्म करनेवाले के यज्ञरूप कर्म विलीन हो जाते हैं ।‘
सर्व प्रकार के यज्ञों में ज्ञानयज्ञ की श्रेष्ठता बताते हुए भगवान कहते हैं : तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।
‘‘उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ । उनको भली-भाँति दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोडकर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्मतत्त्व को भली-भाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे ।
यह उस ज्ञान की बात है, जिसके समान इस संसार में पवित्र करनेवाला कुछ भी नहीं है । इस ज्ञान का आश्रय लेकर विवेकरूपी तलवार से अपने हृदय में स्थित अज्ञानजनित संशय का छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग करता हुआ युद्ध के लिये खडा हो जा ।‘
यह संसार भी युद्ध का मैदान है । इसमें जो ज्ञान का आश्रय लेकर बाहर-भीतर के शत्रुओं से युद्ध करेगा, वह सफल हो जायेगा ।
कर्मसंन्यासयोग नाम के पाँचवें अध्याय में सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय है । सांख्ययोगी और कर्मयोगी का व्यवहार बाह्य रूप से भले अलग दिखाई पडता हो, किंतु अंत में तो दोनों सच्चिदानंद परमात्मा के ज्ञान, आनंद और शांतिरूपी एक ही लक्ष्य को प्राप्त होते हैं ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।
जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है । मनुष्य के शुभाशुभ कर्मों के फल को सर्वव्यापी परमेश्वर ग्रहण भी नहीं करता, त्याग भी नहीं करता परंतु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसीसे सब मनुष्य मोहित हो रहे हैं । लेकिन जिस मनुष्य ने परमात्मा के तत्त्वज्ञान द्वारा अपना अज्ञान नष्ट किया है, वह मुक्त है ।

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