श्रीमद् भगवद् गीता

श्रीमद् भगवद्गीता :6-10 अध्याय

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छठ्ठा अध्याय है आत्मसंयमयोग ।
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।।
जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करनेवाला योगी नहीं है ।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।।
‘योग में आरूढ होने की इच्छावाले मननशील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा है और योगारूढ हो जाने पर सर्वसंकल्पों का अभाव ही कल्याण में हेतु कहा है ।‘
भगवान कहते हैं : ‘‘हे अर्जुन ! जो कामनारहित होकर सत्कर्म करता है वह संन्यासी है, वह योगी है ।‘
निष्काम कर्म तो करने चाहिए लेकिन कर्मों से समय बचाकर फिर अन्तरात्मा में डूबने का, अंतर्मुख होने का अभ्यास भी करना चाहिए ।
भगवान कहते हैं :
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।
‘संसार-समुद्र से अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।‘
इस तरह आत्मसंयमयोग में आत्मोद्धार की प्रेरणा दी है । इसमें भगवद्प्राप्त महापुरुषों के लक्षण दिये गये हैं । ध्यानयोग की समझ और महत्त्व बताकर योगी की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए कहा है कि तपस्वी, ज्ञानी और विद्वानों से भी योगी श्रेष्ठ है ।
तस्माद्योगी भवार्जुन ।
सातवाँ अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग है ।
विज्ञानसहित ज्ञान का विषय और संपूर्ण पदार्थों में कारणरूप व्यापक भगवान का वर्णन करते हुए कहा है :
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।।
‘हे धनंजय ! मेरे सिवाय किंचित्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है । यह संपूर्ण जगत् सूत्र में पिरोये गये सूत्र के मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है ।‘
भगवान कहते हैं कि माया में फँसे हुए मूढ जन मेरे उस सर्वव्यापक रूप को नहीं जानते हैं, लेकिन जो पुरुष मेरी शरण में आता है, निरन्तर मेरेको ही भजता है, वह संसार से तर जाता है ।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।।
ऐसा सुगम उपाय होने पर भी माया द्वारा हरे हुए ज्ञानवाले और आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए तथा मनुष्यों में नीच और दूषित कर्म करनेवाले मूढ लोग मेरेको नहीं भजते हैं ।
इस प्रकार यहाँ आसुरी भाव को प्राप्त हुए पुरुष की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा की गई है । देवताओं की उपासना और उससे प्राप्त होनेवाले फल नाशवान हैं । अतः उसमें लगे हुए पुरुष भगवद्भक्ति से होनेवाले विशुद्ध आनंद के लाभ से वंचित रह जाते हैं ।
आठवाँ अध्याय है अक्षरब्रह्मयोग । इस जगत् की सब चीजें तो क्षर हैं किन्तु ब्रह्म-परमात्मा अक्षर है, अविनाशी है । यह बताते हुए यहाँ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म के विषय में प्रश्नोत्तर किये गये हैं । शुक्ल और कृष्ण पक्ष में जीव की गति का वर्णन आता है ।
इसमें यह सिद्धांत पेश किया गया है कि जो विचार मृत्यु के समय स्पष्ट और गहराई से उठा हुआ हो, वही विचार आगे के जन्म में सबसे बलवान साबित होता है । इस जन्म में पायी हुई धरोहर बाँधकर मरण की लम्बी नींद से उठकर फिर से दूसरे जन्म में अपनी यात्रा शुरू होती है । इस जन्म का अंत अगले जन्म की शुरुआत होती है । इसलिए हमेशा मरण का स्मरण रखकर जीवन का व्यवहार चलाओ । और सब तो अनिश्चित है लेकिन मरण निश्चित है । सूर्य अस्त होता है और आयुष्य क्षीण होता जाता है । एक-एक दिन करके आयु खत्म होती जाती है लेकिन मनुष्य को उसका विचार नहीं आता है ।
भगवान कहते हैं : ‘‘हे अर्जुन ! तू सब काल में समत्वबुद्धिरूप योग से युक्त हो अर्थात् निरंतर मेरी प्राप्ति के लिये साधन करनेवाला हो ।‘
नौवाँ अध्याय है राजविद्याराजगुह्ययोग । इसमें भगवान कहते हैं :
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
यह राजविद्या है । दुनियाँ की सारी विद्याएँ अच्छी हैं, अपनी-अपनी जगह पर ठीक हैं लेकिन आत्मविद्या सब विद्याओं में राजा है । नीतियों में राजनीति और विद्याओं में ब्रह्मविद्या राजा है । राजनीति कोई बुरी चीज नहीं है लेकिन राजनीति में जब दुष्ट लोग घुस जाते हैं, स्वार्थ बढ जाता है तो कुर्सीनीति बन जाती है, घृणास्पद बन जाती है । राजा अगर धर्म को और समाज के हित को ध्यान में रखकर राज्य चलाता है तो राजनीति सही है, नहीं तो फिर वह कुर्सीनीति हो जाती है । अगर राजनीति सही है तो समाज का कल्याण होने में देर नहीं होती, समाज के लोगों के जीवन में उसका असर देखने को मिल सकता है । वैसे ही यह राजविद्या भी गुह्य विद्या है, पवित्र है, प्रत्यक्ष फल देनेवाली है और पाने में सरल है ।
हँसिबो खेलिबो धरिबो ध्यान । अहर्निश कथिबो ब्रह्मज्ञान ।।
खावे पीवे न करे मनभंगा । कहे नाथ मैं तिसके संगा ।।
जो कुछ करें वह उस सर्वव्यापक परमेश्वर को भक्तिभावपूर्वक अर्पण करके परमेश्वरमय हो जायें । उसीको प्राप्त करने की बात भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं ।
दसवाँ अध्याय है विभूतियोग ।
भगवान की महिमा का थोडा-बहुत ख्याल जीव को आये, इसलिए भगवान ने इसमें अपने प्रभाव को बताते हुए कहा है कि : ‘‘हे अर्जुन ! यहाँ बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है ? मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योगमाया के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ । इसलिए मेरेको तत्त्व से जानना चाहिए ।‘

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