श्रीमद् भगवद् गीता

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ग्यारहवाँ अध्याय विश्वरूपदर्शनयोग है । भगवान के विश्वरूप का दर्शन करने की इच्छा रखनेवाले अर्जुन को
भगवान ने दिव्य चक्षु प्रदान किये । उन दिव्य चक्षुओं से भगवान को असंख्य हाथ-मुख-नेत्रवाले और अनंत रूपवाले
देखकर अर्जुन को आश्चर्य और रोमांच के साथ कुछ भय भी हुआ । तब श्रीकृष्ण ने अपने चतुर्भुज रूप का दर्शन
कराके अपने सौम्यरूप को पुनः धारण किया और अनन्य भक्ति से उसे प्राप्त करने की बात बताई ।
भक्तियोग नामक बारहवें अध्याय में सगुण और निर्गुण भक्ति की महिमा और भक्त के प्रति भगवान की प्रीति का
वर्णन है ।
तेरहवाँ अध्याय क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग है । इसमें शरीर तो क्षेत्र है और उस क्षेत्र को जाननेवाला क्षेत्रज्ञ आत्मा है । यह
शरीर, यह अंतःकरण, यह संसार क्षेत्र है, उसे जाननेवाला साक्षी चैतन्य आत्मा है और वह क्षेत्रज्ञ है । तो तुम शरीर
या प्रकृति का अंतःकरण नहीं, पर उसे जाननेवाले हो ।
गुणत्रयविभागयोग नाम के चौदहवें अध्याय में प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन है : सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण ।
इन तीनों गुणों का प्रमाण जैसा कम-ज्यादा होता है, वैसा जीवन का व्यवहार होता है । आदमी कभी सज्जन लगता
है, कभी स्वार्थी लगता है और कभी दुष्ट लगता है । जिस वक्त जिस गुण का प्रभाव ज्यादा होता है वैसा वह
लगता है । वास्तव में, प्रकृति के गुणों का जो आधार है वह आत्मा तो वैसे-का-वैसा, अचल, अविकारी रहता है ।
लेकिन आदमी शरीर और मन के साथ एक होकर गुणों के प्रभाव में आकर अपने को वैसा मान लेता है । अपने
अविनाशी स्वरूप को जानना है, आत्मा का ज्ञान पाना है तो सत्त्वगुण बढाना चाहिए । सात्त्विक वातावरण, सात्त्विक
आहार-विहार और सात्त्विक संग से सत्त्वगुण बढता है । सत्त्वात्संजायते ज्ञानं… सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है ।
पंद्रहवाँ अध्याय है पुरुषोत्तमयोग । पुरुषों में जो उत्तम है उस सच्चिदानंद चैतन्य परमात्मा का ज्ञान देनेवाला यह
अध्याय है । भगवान कहते हैं :
गच्छ्नत्यमूढाः पदमव्ययं तत् ।।
‘… जो मूढ नहीं हैं, वे अव्यय पद को प्राप्त होते हैं ।‘
वह अव्यय पद कैसा है ?
न तद्भासयते सूर्योन शशांको न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।।
उस स्वयंप्रकाशस्वरूप परमपद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकता
है और जिस परमपद को प्राप्त होकर मनुष्य फिर संसार में वापस नहीं आते हैं वही मेरा परम धाम है ।
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श्रीमद् भगवद्गीता :11-15 अध्याय

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