श्रीमद् भगवद् गीता

श्रीमद् भगवद्गीता :16-18 अध्याय

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दैवासुरसंपद्विभागयोग नामक सोलहवें अध्याय में दैवी संपदा और आसुरी संपदा प्राप्त किये हुए लोगों का वर्णन है।

श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है, यह बात

श्रद्धात्रयविभागयोग नाम के सत्रहवें अध्याय में आता है । तामसी

श्रद्धावाले अपना उल्लू सीधा करने के लिये भूत-भैरव को रिझाते हैं, जिससे उन्हें कुछ ऐहिक चुटकुले प्राप्त हो जाते

हैं । जो देवताओं को रिझाकर यहाँ भी और स्वर्गादि में भी सुख पाना चाहते हैं उनकी श्रद्धा राजसी श्रद्धा है ।

किन्तु आत्मदेव सब देवों का देव है, परमात्मदेव है । उसे जानने के लिये, उसे पाने के लिये जो लगा रहता है, जो

यहाँ के सुख की या स्वर्ग के सुखों की भी परवाह नहीं करता है, जो मानता है कि ‘मेरा आत्मा सुखस्वरूप है… मैं

सुखस्वरूप आत्मा हूँ… मुझे अपने इस सोऽहं स्वरूप का साक्षात्कार करना है…’ उसकी श्रद्धा सात्त्विक श्रद्धा है ।

ऐसे लोग जीवन्मुक्ति के पद को पा लेते हैं । सात्त्विक श्रद्धावाला कभी फरियाद नहीं करता, राजसी श्रद्धावाला

मनुष्य फरियाद करता रहता है और तामसी श्रद्धावाला तो विरोधी हो जाता है ।

श्रीमद्भगवद्गीता का अठारहवाँ और आखिरी अध्याय है मोक्षसंन्यासयोग।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।

‘सर्व धर्मों को यानी सर्व कर्मों के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की अनन्य

शरण को प्राप्त हो । मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा । तू शोक मत कर ।‘

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण शरणागत भक्त के प्रति अपनी भक्तवत्सलता बताते हुए अभय वचन देते हैं । भक्त और

भगवान की महिमा लाबयान है ।

श्रीमद्भागवत परमहंससंहिता है । जीते-जी भक्ति और मरने के बाद मुक्ति चाहिए तो श्रीमद्भागवत की कथा है ।

संसार में रहते हुए, जीवन में आनेवाले विघ्न-बाधाओं से जूझते हुए भी परमपद को, परम सुख को पाना है, जीते-जी

मुक्ति पाना है तो श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान है जिसे पाकर आप तो मुक्ति का अनुभव कर ही सकते हैं, औरों को

भी इस परम सुख के मार्ग पर ले जा सकते हैं ।

ॐ शांतिॐ आनन्द

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