False Allegations

धाक-धमकी के आरोप झूठे

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दूध का दूध पानी का पानी

पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू और श्री नारायण साँईं जी पर सूरत की जिन दो सगी बहनों को मोहरा बनाकर बलात्कार और यौन-शोषण का आरोप लगवाया गया है उनकी एफ आई आर ही उनके झूठ और उनके साथ मिले हुए षड्यंत्रकारियों की सुनियोजित साजिश की पोल खोल देती है। आइये, नजर डालें एफ आई आर में लिखे हुए कुछ पहलुओं परः

छोटी बहन को आश्रम में आने से क्यों नहीं रोका ?

बड़ी बहन का कहना है कि ‘उसके साथ सन् 2001 में तथाकथित घटना घटी थी।’ 2002 में उसकी छोटी बहन आश्रम में रहने के लिए आयी थी। अगर किसी लड़की के साथ कहीं बलात्कार हुआ हो तो क्या वह चाहेगी कि उसकी छोटी बहन भी ऐसी जगह पर रहने आये ? कदापि नहीं। सवाल उठता है कि इसने अपनी छोटी  बहन को आश्रम में आने से मना क्यों नहीं किया ?

क्या ऐसा सम्भव है ?

कोई भी स्त्री बलात्कार करने वाले पुरुष से घृणा करने लगती है, उससे दूर जाने का  प्रयास करती है, भले ही पुलिस में शिकायत न की हो। लेकिन यहाँ तो इस महिला (बड़ी बहन) का बापू जी के प्रति बर्ताव हमेशा अच्छा ही रहा था। लड़की आश्रम की वक्ता बनी, प्रवचन किये, मंच पर से हजारों भक्तों के सामने बापू जी के गुणगान करती रही। यदि उसके साथ दुष्कर्म होता तो क्या ऐसा सम्भव है ?

क्या कोई अपने साथ दुष्कर्म करने वाले के प्रति इतनी निष्ठा व पूज्यभाव रख सकता है ?

गाँववालों से तफतीश करने पर पता चला कि दोनों लड़कियाँ आश्रम छोड़ने के बाद भी सत्संग में जाती थीं। और तो और 2013 में बारडोली (गुजरात) में छोटी बहन नारायण साँईं जी के दर्शन करने आयी थी और उसके फोटोग्राफ एवं विडियो भी अदालत में प्रस्तुत किये गये हैं, जिसमें स्पष्ट दिख रहा है कि पति पत्नी दोनों बड़े श्रद्धाभाव से साँईं जी के दर्शन कर रहे हैं।

कैसे बेतुके और हास्यास्पद आरोप !

छोटी बहन ने आरोप लगाया है कि 2002 में सूरत में बापू जी की कुटिया में नारायण साँईं जी ने उनके साथ दुष्कर्म किया। उसके बाद वह घर चली गयी और फिर दूसरे ही दिन साँईं जी के हिम्मतनगर स्थित महिला आश्रम में चली गयी। सोचने वाली बात है कि एक दिन उसके साथ दुष्कर्म हुआ और वह घर चली गयी और दूसरे दिन वह अपने घर जैसी सुरक्षित जगह को छोड़कर उनके आश्रम चली गयी और 2 साल तक बड़ी श्रद्धा-निष्ठा, समर्पणभाव से बतौर संचालिका वहाँ रही।

छोटी बहन के अनुसार 2004 में वह आश्रम से घर चली गयी थी और 2010 में उसकी शादी हो गयी। तब भी उसने माँ बाप को सा कुछ नहीं बताया और 1 अक्तूबर 2013 को ही उसने पहली बार पति को बताया और 6 अक्तूबर 2013 को एफ आई आर दर्ज की गयी। यह कैसे सम्भव है कि पीड़ित महिला 11 वर्षों तक अपने किसी सगे-संबंधी को अपनी व्यथा न बताये।

धाक-धमकी के आरोप झूठे

दोनों बहनों ने एफ आई आर में लिखवाया है कि “हम उनके धाक और प्रभाव के कारण किसी को कह नहीं पाते थे, आज तक किसी को नहीं कहा।” 2008 में गुजरात के समाचार पत्रों में सरकार ने छपवाया था कि आश्रम द्वारा कोई भी पीड़ित व्यक्ति अगर शिकायत करे तो पुलिस उसके घर जाकर उसकी शिकायत दर्ज करेगी और उसका नाम भी गोपनीय रखा जायेगा। ऐसा होने पर भी ये बहने सामने क्यों नहीं आयीं ? अचम्भे की बात है कि बापू जी का तथाकथित धाक होने के बावजूद भी दोनों बहनों को आश्रम से जाने के 6-7 साल बाद, आज तक भी किसी प्रकार की कोई भी धमकी या नुकसान नहीं पहुँचा, उनके साथ सम्पर्क भी नहीं किया गया। जबकि बलात्कार करने वाला व्यक्ति, जिसके देश-विदेश में करोड़ों जानने-मानने वाले हों, उसे तो सतत यह डर होना चाहिए कि ‘कहीं यह बाहर जाकर मेरी पोल न खोल दे।’ इसके विपरीत बापू जी और नारायण साँईं को तो ऐसा कोई डर कभी था ही नहीं क्योंकि ऐसा दुष्कर्म हुआ ही नहीं।

इतने सारे झूठ अपने-आपमें काफी हैं किसी भी प्रबुद्ध व्यक्ति को सच्चाई समझने के लिए। क्योंकि जो सच बोलता है या  लिखता है उससे ऐसी गलतियाँ कभी नहीं हो सकतीं। लेकिन जब मनगढंत और झूठी कहानी पेश करनी होती है तो वहाँ कौन मौजूद था, कौन नहीं, क्या हुआ ? इसमें अक्सर गलतियाँ हो जाती हैं। अतः मेरी सभी देशवासियों से अपील है कि वे अपने स्वविवेक का उपयोग करके सत्य को देखें, न कि मीडिया के चश्मे से।
–वरिष्ठ पत्रकार श्री अरूण रामतीर्थकर

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