संत वाणी

धर्म के लिए बलिदान देने वाले चार अमर शहीद

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Endearingly called ‘Bapu ji'(Asaram Bapu Ji), His Holiness is a Self-Realized Saint from India. Pujya Asaram Bapu ji preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being; be it Hindu, Muslim, Christian, Sikh or anyone else.

धन्य है पंजाब की माटी जहाँ समय-समय पर अनेक महापुरुषों का प्रादुर्भाव हुआ ! धर्म की पवित्र यज्ञवेदी में बलिदान देने वालों की परंपरा में गुरु गोविंदसिंह के चार लाडलों को, अमर शहीदों को भारत भूल सकता है? नहीं, कदापि नहीं। अपने पितामह गुरु तेगबहादुर की कुर्बानी और भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत पिता गुरु गोविन्दसिंह ही उनके आदर्श थे। तभी तो 8-10 वर्ष की छोटी सी अवस्था में उनकी वीरता र धर्मपरायणता को देखकर भारतवासी उनके लिए श्रद्धा से नतमस्तक हो उठते हैं।

गुरुगोविंदसिंह की बढ़ती हुई शक्ति और शूरता को देखकर औरंगजेब झुँझलाया हुआ था। उसने शाही फरमान निकाला कि ‘पंजाब के सभी सूबों के हाकिम और सरदार तथा पहाड़ी राजा मिलकर आनंदपुर को बरबाद कर डालो और गुरु गोविंदसिंह को जिंदा गिरफ्तार करो या उनका सिर काटकर शाही दरबार में हाजिर करो।’

बस फिर क्या था? मुगल सेना द्वारा आनंदपुर पर आक्रमण कर दिया गया। आनंदपुर के किले में रहते हुए मुट्ठीभर सिक्ख सरदारों की सेना ने विशाल मुगल सेना को भी त्रस्त कर दिया। किंतु धीरे-धीरे रसद-सामान घटने लगा और सिक्ख सेना भूख से व्याकुल हो उठी। आखिरकार अपने साथियों के विचार से बाध्य होकर अनुकूल अवसर पाकर गुरुगोविंदसिंह ने आधी रात में सपरिवार किला छोड़ दिया।

…..किंतु न जाने कहाँ से यवनों को इसकी भनक मिल गयी और दोनों सेनाओं में हलचल मच गयी। इसी भागदौड़ में गुरु गोविन्दसिंह के परिवार वाले अलग होकर भटक गये। गुरु गोविंदसिंह की माता अपने दो छोटे-छोटे पौत्रों, जोरावरसिंह और फतेहसिंह के साथ दूसरी ओर निकल पड़ी। उनके साथ रहने वाले रसोइये के विश्वासघात के कारण ये लोग विपक्षियों द्वारा गिरफ्तार किये गये और सूबा सरहिंद के पास भेज दिये गये। सूबेदार ने गुरु गोविन्दसिंह के हृदय पर आघात पहुँचाने के ख्याल से उनके दोनों छोटे बच्चों को मुसलमान बनाने का निश्चय किया।

भरे दरबार में गुरु गोविन्दसिंह के इन दोनों पुत्रों से सूबेदार ने पूछाः “ऐ बच्चो ! तुम लोगों को दीन(मजहब) इस्लाम की गोद में आना मंजूर है या कत्ल होना?”

दो-तीन बार पूछने पर जोरावरसिंह ने जवाब दियाः

“हमें कत्ल होना मंजूर है।”

कैसी दिलेरी है ! कितनी निर्भीकता ! जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते रहते हैं, उस नन्हीं सी सुकुमार अवस्था में भी धर्म के प्रति इन बालकों की कितनी निष्ठा है !

वजीद खाँ बोलाः “बच्चो ! दीन इस्लाम में आकर सुख से जीवन व्यतीत करो। अभी तो तुम्हारा फलने-फूलने का समय है। मृत्यु से भी इस्लाम धर्म को बुरा समझते हो? जरा सोचो ! अपनी जिंदगी व्यर्थ क्यों गँवा रहे हो?”

गुरु गोविंदसिंह के लाडले वे वीर पुत्र… मानो गीता के इस ज्ञान को उन्होंने पूरी तरह आत्मसात् कर लिया थाः स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। जोरावरसिंह ने कहाः “हिन्दू धर्म से बढ़कर संसार में कोई धर्म नहीं। अपने धर्म पर अडिग रहकर मरने से बढ़कर सुख देने वाला दुनिया में कोई काम नहीं। अपने धर्म की मर्यादा पर मिटना तो हमारे कुल की रीति है। हम लोग स क्षणभंगुर जीवन की परवाह नहीं करते। मर-मिटकर भी धर्म की रक्षा करना ही हमारा अंतिम ध्येय है। चाहे तुम कत्ल करो या तुम्हारी जो इच्छा हो, करो।”

गुरु गोविन्दसिंह के पुत्र महान,

न छोड़ा धर्म हुए कुर्बान………

इसी प्रकार फतेहसिंह ने भी धर्म को न त्यागकर बड़ी निर्भीकतापूर्वक मृत्यु का वरण श्रेयस्कर समझा। शाही सल्तनत आश्चर्यचकित हो उठी कि ‘इस नन्हीं-सी आयु में भी अपने धर्म के प्रति कितनी अडिगता है ! इन नन्हें-नन्हें सुकुमार बालकों में कितनी निर्भीकता है !’ किंतु अन्यायी शासक को भला यह कैसे सहन होता? काजियों और मुल्लाओं की राय से इन्हें जीते-जी दीवार में चिनवाने का फरमान जारी कर दिया गया।

कुछ ही दूरी पर दोनों भाई दीवार में चिने जाने लगे तब धर्मांध सूबेदार ने कहाः “ऐ बालको ! अभी भी चाहो तो तुम्हारे प्राण बच सकते हैं। तुम लोग कलमा पढ़कर मुसलमान धर्म स्वीकार कर लो। मैं तुम्हें नेक सलाह देता हूँ।”

यह सुनकर वीर जोरावरसिंह गरज उठाः “अरे अत्याचारी नराधम ! तू क्या बकता है? मुझे तो खुशी है कि पंचम गुरु अर्जुन देव और दादागुरु तेगबहादुर के आदर्शों को कायम करने के लिए मैं अपनी कुर्बानी दे रहा हूँ तेरे जैसे अत्याचारियों से यह धर्म मिटनेवाला नहीं, बल्कि हमारे खून से वह सींचा जा रहा है और आत्मा तो अगर है, इसे कौन मार सकता है?”

दीवार शरीर को ढकती हुई ऊपर बढ़ती जा रही थी। छोटे भाई फतेहसिंह की गर्दन तक दीवार आ गयी थी। वह पहले ही आँखों से ओझल हो जाने वाला था। यह देखकर जोरावरसिंह की आँखों में आँसू आ गये। सूबेदार को लगा कि अब मुलजिम मृत्यु से भयभीत हो रहा है। अतः मन ही मन प्रसन्न होकर बोलाः “जोरावर ! अब भी बता दो तुम्हारी क्या इच्छा है? रोने से क्या लाभ होगा?”

जोरावर सिंहः “मैं बड़ा अभागा हूँ कि अपने छोटे भाई से पहले मैंने जन्म धारण किया, माता का दूध और जन्मभूमि का अन्न जल ग्रहण किया, धर्म की शिक्षा पायी किंतु धर्म के निमित्त जीवन-दान देने का सौभाग्य मुझसे पहले मेरे छोटे भाई फतेह को प्राप्त हो रहा है। मुझसे पहले मेरा छोटा भाई कुर्बानी दे रहा है, इसीलिए मुझ आज खेद हो रहा है।”

लोग दंग रह गये कि कितने साहसी हैं ये बालक ! जो प्रलोभन दिये जाने और जुल्मियों द्वारा अत्याचार किये जाने पर भी वीरतापूर्वक स्वधर्म में डटे रहे।

उधर गुरु गोविंदसिंह की पूरी सेना युद्ध में काम आ गयी। यह देखकर उनके बड़े पुत्र अजीतसिंह से नहीं रहा गया और वे पिता के पास आकर बोल उठेः

“पिताजी ! जीते जी बंदी होना कायरता है और भागना बुजदिली है। इनसे अच्छा है लड़कर मरना। आप आज्ञा करें, मैं इन यवनों के छक्के छुड़ा दूँगा या मृत्यु का आलिंगन करूँगा।”

वीर पुत्र अजीतसिंह की बात सुनकर गोविंदसिंह का हृदय प्रसन्न हो उठा और वे बोलेः

“शाबाश ! धन्य हो पुत्र ! जाओ, स्वदेश और स्वधर्म के निमित्त अपना कर्तव्यपालन करो। हिन्दू धर्म को तुम्हारे जैसे वीर बालकों की कुर्बानी की आवश्यकता है।”

पिता से आज्ञा पाकर अत्यंत प्रसन्नता तथा जोश के साथ अजीतसिंह आठ-दस सिक्खों के साथ युद्ध स्थल में जा धमका और देखते ही देखते यवन सेना के बड़े-बड़े सरदारों को मौत के घाट उतारते हुए खुद भी शहीद हो गया।

ऐसे वीर बालकों की गाथा से ही भारतीय इतिहास अमर हो रहा है। अपने बड़े भाइयों को वीरगति प्राप्त करते देखकर उनसे छोटा भाई जुझारसिंह भला कैसे चुप बैठता? वह भी अपने पिता गुरु गोविंदसिंह के पास जा पहुँचा और बोलाः

“पिताजी ! बड़े भैया तो वीरगति को प्राप्त हो गये, इसलिए मुझे भी भैया का अनुगामी बनने की आज्ञा दीजिए।”

गुरु गोविन्दसिंह का हृदय भर आया और उन्होंने उठकर जुझार को गले लगा लिया। वे बोलेः “जाओ, बेटा ! तुम भी अमरपद प्राप्त करो, देवता तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।”

धन्य है पुत्र की वीरता और धन्य है पिता की कुर्बानी ! अपने तीन पुत्रों की मृत्यु के पश्चात् स्वदेश तथा स्वधर्म पालन के निमित्त अपने चौथे और अंतिम पुत्र को भी प्रसन्नता से धर्म और स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर चढ़ने के निमित्त स्वीकृति प्रदान कर दी !

वीर जुझारसिंह ‘सत् श्री अकाल’ कहकर उछल पड़ा। उसका रोम-रोम शत्रु को परास्त करने के लिए फड़कने लगा। स्वयं पिता ने उसे वीरों के देश से सुसज्जित करके आशीर्वाद दिया और वीर जुझार पिता को प्रणाम करके अपने कुछ सरदार साथियों के साथ निकल पड़ा युद्धभूमि की ओर। जिस ओर जुझार गया उस ओर दुश्मनों का तीव्रता से सफाया होने लगा और ऐसा लगता मानो महाकाल की लपलपाती जिह्वा सेनाओं को चाट रही है। देखते-देखते मैदान साफ हो गया। अंत में शत्रुओं से जूझते-जूझते वह वीर बालक भी मृत्यु की भेंट चढ़ गया। देखनेवाले दुश्मन भी उसकी प्रशंसा किये बिना न रह सके।

धन्य है यह देश ! धन्य हैं वे माता-पिता जिन्होंने इन चार पुत्ररत्नों को जन्म दिया और धन्य हैं वे चारों वीर पुत्र जिन्होंने देश, धर्म और संस्कृति के रक्षणार्थ अपने प्राणों तक का उत्सर्ग कर दिया।

चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति हो अथवा चाहे कितनी भी बड़े-बड़े प्रलोभन आयें, किंतु वीर वही है जो अपने धर्म तथा देश की रक्षा के लिए उनकी परवाह न करते हुए अपने प्राणों की भी बाजी लगा दें। वही वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य है। किसी ने सच कहा हैः

जिसको नहीं निज देश पर निज जाति पर अभिमान है।

वह नर नहीं पर पशु निरा और मृतक समान है।।


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