संत वाणी

अपनी संस्कृति का आदर करें….

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किसी गाँव का एक लड़का पढ़-लिखकर पैसे कमाने के लिए विदेश गया। शुरु में तो उसे कहीं ठिकाना न मिला, परंतु धीरे-धीरे पेट्रोल पंप आदि जगहों पर काम करके कुछ धन कमाया और भारत आया। अब उसके लिए अपना देश भारत ‘भारत’ नहीं रहा, ‘इंडिया’ हो गया।

परदेश के वातावरण, बाह्य चकाचौंध तथा इन्द्रियगत ज्ञान से उसकी बुद्धि इतनी प्रभावित हो गयी थी की वह सामान्य विवेक तक भूल गया था। पहले तो वह रोज माता-पिता को प्रणाम करता था, किंतु आज दो वर्ष के बाद इतनी दूर से आने पर भी उसने पिता को प्रणाम न किया बल्कि बोलाः

“ओह, पापा ! कैसे हो?”

पिता की तीक्ष्ण नजरों ने परख लिया कि पुत्र का व्यवहार बदल गया है। दूसरे दिन पिता ने पुत्र से कहाः

“चलो, बेटा ! गाँव में जरा चक्कर लगाकर आयें और सब्जी भी ले आयें।”

पिता पुत्र दोनों गये। पिता ने सब्जीवाले से 250 ग्राम गिल्की तौलने के लिए कहा।

पुत्रः “पापा ! आपके इंडिया में इतनी छोटी-छोटी गिल्की? हमारे अमेरिका में तो इससे दुगनी बड़ी गिल्की होती है।”

अब इंडिया उसका अपना न रहा, पिता का हो गया। कैसी समझ ! अपने देश से कोई पढ़ने या पैसा कमाने के लिए परदेश जाय तो ठीक है, किंतु कुछ समय तक वहाँ रहने के बाद वहाँ की बाह्य चकाचौंध से आकर्षित होकर अपने देश का गौरव तथा अपनी संस्कृति भूल जाय, वहाँ की फालतू बातें अपने दिमाग में भल ले और यहाँ आने पर अपने बुद्धिमान बड़े-बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार करें, इससे अधिक दूसरी क्या मूर्खता होगी?

पिता कुछ न बोले। थोड़ा आगे गये। पिता ने 250 ग्राम भिंडी तुलवायी। तब पुत्र बोलाः

“ह्वाट इज़ दिस, पापा? इतनी छोटी भिंडी ! हमारे अमेरिका में तो बहुत बड़ी-बड़ी भिंडी होती है।”

पिता को गुस्सा आया किंतु वे सत्संगी थे, अतः अपने मन को समझाया कि कबसे डींग हाँक रहा है… मौका देखकर समझाना पड़ेगा। प्रकट में बोलेः

“पुत्र ! वहाँ सब ऐसा खाते होंगे तो उनका शरीर भी ऐसा ही भारी-भरकम होगा और उनकी बुद्धि भी मोटी होगी। भारत में तो हम सात्त्विक आहार लेना पसन्द करते हैं, अतः हमारे मन-बुद्धि भी सात्त्विक होते हैं।”

चलते-चलते उनकी तरबूज के ढेर पर गयी। पुत्र ने कहाः “पापा ! हम वॉटरमेलन (तरबूज) लेंगे?”

पिता ने कहाः “बेटा ! ये नींबू हैं। अभी कच्चे हैं, पकेंगे तब लेंगे।”

पुत्र पिता की बात का अर्थ समझ गया और चुप हो गया।

परदेश का वातावरण ठंडा और वहाँ के लोगों का आहार चर्बीयुक्त होने से उनकी त्वचा गोरी तथा शरीर का कद अधिक होता है। भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी हों, शरीर चाहे कितना भी हृष्ट-पुष्ट और गोरा हो लेकिन उससे आकर्षित नहीं होना चाहिए।

वहाँ की जो अच्छी बाते हैं उनको तो हम लेते नहीं, किंतु वहाँ के हलके संस्कारों के हमारे युवान तुरंत ग्रहण कर लेते हैं। क्यों? क्योंकि अपनी संस्कृति के गौरव से वे अपरिचित हैं। हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा प्रदत्त ज्ञान की महिमा को उन्होंने अब तक जाना नहीं है। राम तत्त्व के, कृष्ण तत्त्व के, चैतन्य-तत्त्व के ज्ञान से वे अनभिज्ञ हैं।

वाईन पीने वाले, अण्डे-मांस-मछली खाने वाले परदेश के लेखकों की पुस्तकें खूब रुपये खर्च करके भारत के युवान पढ़ते हैं, किंतु अपने ऋषि मुनियों ने वल्कल पहनकर, कंदमूल, फल और पत्ते खाकर, पानी और हवा पर रहकर तपस्या-साधना की, योग की सिद्धियाँ पायीं, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पाया और इसी जीवन में जीवनदाता से मुलाकात हो सके ऐसी युक्तियाँ बताने वाले शास्त्र रचे। उन शास्त्रों को पढ़ने का समय ही आज के युवानों के पास नहीं है।

उपन्यास, अखबार और अन्य पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने को समय मिलता है, मन मस्तिष्क को विकृत करने वाले तथा व्यसन, फैशन और विकार उभारने वाले चलचित्र व चैनल देखने को समय मिलता है, फालतू गपशप लगाने को समय मिलता है, शरीर को बीमार करने वाले अशुद्ध खान-पान के लिए समय मिलता है, व्यसनों के मोह में पड़कर मृत्यु के कगार पर खड़े होने के लिए समय मिलता है  लेकिन सत्शास्त्र पढ़ने के लिए, ध्यान-साधना करके तन को तन्दुरुस्त, मन को प्रसन्न और बुद्धि को बुद्धिदाता में लगाने के लिए उनके पास समय ही नहीं है। खुद की, समाज की, राष्ट्र की उन्नति में सहभागी होने की उनमें रुचि ही नहीं है।

हे भारत के युवानो ! इस विषय में गंभीरता से सोचने का समय आ गया है। तुम इस देश के कर्णधार हो। तुम्हारे संयम, त्याग, सच्चरित्रता, समझ और सहिष्णुता पर ही भारत की उन्नति निर्भर है।

वृक्ष, कीट, पशु, पक्षी आदि योनियों में जीवन प्रकृति के नियमानुसार चलता है।  उन्हें अपने विकास की स्वतंत्रता नहीं होती है लेकिन तुम मनुष्य हो। मनुष्य जन्म में कर्म करने की स्वतन्त्रता होती है। मनुष्य अपनी उन्नति के लिए पुरुषार्थ कर सकता है, क्योंकि परमात्मा ने उसे समझ दी है, विवेक दिया है।

अगर तुम चाहते हो सफल उद्योगपति, सफल अभियंता, सफल चिकित्सक, सफल नेता आदि बनकर राष्ट्र के विकास में सहयोगी हो सकते हो, साथ ही किसी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सत्संग-सान्निध्य तथा मार्गदर्शन पाकर अपने शिवत्व में भी जाग सकते हो। इसीलिए तुम्हें यह मानव तन मिला है।

भर्तृहरि ने भी कहा हैः

यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा

यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।

आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्

प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः।।

“जब तक काया स्वस्थ है और वृद्धावस्था दूर है, इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों को करने में अशक्त नहीं हुई हैं तथा जब तक आयु नष्ट नहीं हुई है, तब तक विद्वान पुरुष को अपने श्रेय के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। घर में आग लग जाने पर कुआँ खोदने से क्या लाभ?”

(वैराग्यशतकः 75)

अतः हे महान देश के वासी ! बुढ़ापा, कमजोरी व लाचारी आ घेरे, उसके पहले अपनी दिव्यता को, अपनी महानता को, महान पद को पा लो, प्रिय !

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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