संत वाणी, सनातन संस्कृति

स्वधर्मनिष्ठा

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गीता में कहा गया हैः

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।

‘अपने धर्म में मर जाना भी श्रेयस्कर है किंतु दूसरे का धर्म भयावह है।’ (गीताः 3.35)

किसी को धर्मच्युत करने की चाहे कोई लाख कोशिश क्यों न करें, यदि वह बुद्धिमान होगा तो न तो किसी के प्रलोभन में आयेगा न ही भय में, वह तो हर कीमत पर अपने ही धर्म में अडिग रहेगा।

ईसाइयत वाले गाँव-गाँव जाकर प्रचार करते हैं कि ‘हमारे धर्म में आ जाओ। हम तुमको मुक्ति दिलायेंगे।’

एक समझदार वृद्ध सज्जन ने उन्हें पूछाः

“मुक्ति कौन देगा?”

“यीशु भगवान देंगे।”

“यीशु भगवान कौन हैं?”

“वे भगवान के बेटे हैं।”

तब उस वृद्ध सज्जन ने कहाः “हम तो सीधे भगवान का ज्ञान पा रहे हैं, फिर भगवान के बेटे के पास क्यों जायें? भगवान के बेटे मुक्ति क्यों माँगे?”

इतना ज्ञान तो भारत का एक ग्रामीण किसान भी रखता है कि भगवान के बेटे से क्या मुक्ति माँगनी? जिस बेटे को खीलें लगीं और जो खून बहाते-बहाते चला गया, उससे हम मुक्ति माँगे? इससे तो जो मुक्तात्मा-परमात्मा श्रीकृष्ण विघ्न-बाधाओं के बीच भी चैन की बंसी बजा रहे हैं, जिनको देखते ह चिन्ता गायब हो जाती है और प्रेम प्रकट होने लगता है, सीधा उन्हीं से मुक्ति क्यों न ले लें? भगवान के बेटे से हमको मुक्ति नहीं चाहिए। हम तो भगवान से ही मुक्ति लेंगे। कैसी उत्तम समझ है!

भारत का एक बालक कान्वेंट स्कूल में अपना नाम खारिज करवाकर भारतीय पद्धति से पढ़ानेवाली शाला में भर्ती हो गया। उस लड़के की दृष्टि बड़ी पैनी थी। उसने देखा कि शाला के प्रधानाचार्य कुर्ता और धोती पहन कर पाठशाला में आते हैं। अतः वह भी अपनी पाठशाला की पोशाक उतारकर धोती-कुर्ते में पाठशाला जाने लगा। उसे इस प्रकार जाते देखकर पिता ने पूछाः “बेटा ! तूने यह क्या किया?”

बालकः “पिताजी ! यह हमारी भारतीय वेशभूषा है। देश तब तक शाद-आबाद नहीं रह सकता जब तक हम अपनी संस्कृति का और अपनी वेशभूषा का आदर नहीं करते। पिता जी ! मैंने कोई गलती तो नहीं की?”

पिताजीः “बेटा ! गलती तो नहीं की लेकिन ऐसा पहन कैसे लिया?”

बालकः “पिताजी ! हमारे प्रधानाचार्य यही पोशाक पहनते हैं। टाई, शर्ट, कोट, पैन्ट आदि तो ठण्डे प्रदेशों की आवश्यकता है। हमारा प्रदेश तो गरम है। हमारी वेशभूषा तो ढीली-ढाली ही होनी चाहिए। यह वेशभूषा स्वास्थ्यप्रद भी है और हमारी संस्कृति की पहचान भी।”

पिता ने बालक को गले लगाया और कहाः

“बेटा ! तू बड़ा होन हार है। किसी के विचारों से तू दबना नहीं। अपने विचारों को बुलंद रखना। बेटा ! तेरी जय-जयकार होगी।”

पाठशाला में पहुँचने पर अन्य विद्यार्थी उसे देखकर दंग रह गये कि यह क्या ! जब उस बालक से पूछा गया कि ‘तू पाठशाला की पोशाक पहनकर क्यों नहीं आया?’ तब उसने कहाः

“पाश्चात्य देशों में ठण्डी रहती है, अतः वहाँ शर्ट-पैन्ट आदि की जरूरत पड़ती है। ठण्डी हवा शरीर में घुसकर सर्दी न कर दे, इसलिए वहाँ के लोग टाई बाँधते हैं। हमारे देश में तो गर्मी है। फिर हम उनके पोशाक की नकल क्यों करें? जब हमारी पाठशाला के प्रधानाचार्य भारतीय पोशाक पहन सकते हैं तो भारतीय विद्यार्थी क्यों नहीं पहन सकते?”

उस बालक ने अन्य विद्यार्थियों को भी अपनी संस्कृति के प्रति प्रोत्साहित किया। उसने देखा कि कान्वेंट स्कूल में पादरी लोग हिन्दू धर्म की निन्दा करते हैं और माता-पिता की अवहेलना करना सिखाते हैं। हमारे शास्त्र कहते हैं- मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।’ ….और अमेरिका में कहते हैं कि ‘माँ या बाप डाँट दे तो पुलिस को खबर कर दो।’ जो शिक्षा माता-पिता को भी दंडित करने की सीख दे, ऐसी शिक्षा हम क्यों पायें? हम तो भारतीय पद्धति से शिक्षा देनेवाली पाठशाला में ही पढ़ेंगे।’ ऐसा सोचकर उस बालक ने कान्वेंट स्कूल से अपना नाम कटवाकर भारतीय शिक्षा पद्धतिवाली पाठशाला में दर्ज करवाया था।

इतनी छोटी सी उम्र में भी अपने राष्ट्र का, अपने धर्म का तथा अपनी संस्कृति का आदर करने वाले वे बालक थे सुभाषचंद्र बोस।

एक पादरी किसी कान्वेंट स्कूल में विद्यार्थियों के आगे हिन्दू धर्म की निन्दा कर रहा था और अपनी ईसाइयत की डींग हाँक रहा था। इतने में एक हिम्मतवान लड़का उठ खड़ा हुआ और पादरी को भी तौबा पुकारनी पड़े, ऐसा सवाल किया। लड़के ने कहाः “पादरी महोदय ! क्या आपका ईसाई धर्म हिन्दू धर्म की निन्दा करना सिखाता है?”

पादरी निरुत्तर हो गया, फिर थोड़ी देर बाद कूटनीति से बोलाः

“तुम्हारा धर्म भी तो निन्दा करता है।”

उस लड़के ने कहाः “हमारे धर्मग्रन्थ में कहाँ किसी धर्म की निंदा की गयी है? गीता में तो आता हैः न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। ‘इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।’

(गीताः4.38)

गीता के एक-एक शब्द में मानवमात्र का उत्थान करने का सामर्थ्य छुपा हुआ है। ऐसा ज्ञान देनेवाली गीता में कहाँ किसी के धर्म की निन्दा की गयी है? हमारे एक अन्य धर्म ग्रंथ – रचयिता भगवान वेदव्यासजी का श्लोक भी सुन लोः

धर्म यो बाधते न स धर्मः कुवर्त्म तत्।

अविरोधाद् यो धर्मः स धर्मः सत्य विक्रम।।

हे विक्रम ! जो धर्म किसी दूसरे धर्म का विरोध करता है, वह धर्म नहीं कुमार्ग है। धर्म वही है जिसका किसी धर्म से विरोध नहीं है।

पादरी निरुत्तर हो गया।

वही 10-11 साल का लड़का आगे चलकर गीता, रामायण, उपनिषद् आदि ग्रंथों का अध्ययन करके एक प्रसिद्ध धुरंधर दार्शनिक बना और भारत के राष्ट्रपति पद पर शोभायमान हुआ। उसका नाम था डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्।

कैसी हिम्मत और कैसा साहस था भारत के उन नन्हें-नन्हें बच्चों में ! उनके साहस, स्वाभिमान और स्वधर्म-प्रीति ने ही आगे चलकर उन्हें भारत का प्रसिद्ध नेता व दार्शनिक बना दिया।

जो धर्म की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी रक्षा अवश्य करता है। उठो, जागो, भारतवासियो ! विधर्मियों की कुचालों और षडयंत्रों के कारण फिर से पराधीन होना पड़े इससे पहले ही अपनी संस्कृति के गौरव को पहचानो। अपने राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए कमर कसकर तैयार हो जाओ। अब भी वक्त है….. फिर कहीं पछताना न पड़े। भगवान और भगवत्प्राप्त संतों की कृपा तुम्हारे साथ है फिर भय किस बात का? देर किस बात की? शाबाश, वीर ! शाबाश…!!

Greatness of Hinduism-Part 1

Greatness of Hinduism-Part 2

ॐॐॐॐॐॐॐ

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