संत वाणी

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय

श्री आशारामायण,गुरुसेवा,प्रभु जी,गुरुदेव,मेरे राम,हरिओम,आशाराम जी,आसाराम बापू,नारायण,yss,bsk,mum,dpp,syvmr,gurukul,hariomgroup.org,ashram.org,google+,false allegation

स्वप्नावस्था में दृष्टा स्वयं अकेला ही होता है | अपने भीतर की कल्पना के आधार पर सिंह, सियार, भेड़, बकरी, नदी, नगर, बाग-बगीचे की एक पूरी सृष्टि का सर्जन कर लेता है | उस सृष्टि में स्वयं एक जीव बन जाता है और अपने को सबसे अलग मानकर भयभीत होता है | खुद शेर है और खुद ही बकरी है | खुद ही खुद को डराता है | चालू स्वप्न में सत्य का भान न होने से दुःखी होता है | स्वप्न से जाग जाये तो पता चले कि स्वयं के सिवाय और कोई था ही नहीं | सारा प्रपंच कल्पना से रचा गया था | इसी प्रकार यह जगत जाग्रत के द्वारा कल्पित है, वास्तविक नहीं है |यदि जाग्रत का दृष्टा अपने आत्मस्वरूप में जाग जाये तो उसके तमाम दुःख-दारिद्रय पल भर में अदृश्य हो जायें |

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