संत वाणी

कोई उसके लिए खुद चलता है, किसी को वो बुला लेता है !

श्री आशारामायण,गुरुसेवा,प्रभु जी,गुरुदेव,मेरे राम,हरिओम,आशाराम जी,आसाराम बापू,नारायण,yss,bsk,mum,dpp,syvmr,gurukul,hariomgroup.org,ashram.org,google+,false allegation

ओ प्रेम की मादकता ! तू जल्दी आ | ओ आत्मध्यान की, आत्मरस की मदिरा ! तू हम पर जल्दी आच्छादित हो जा | हमको तुरन्त डुबो दे |विलम्ब करने का क्या प्रयोजन ? मेरा मन अब एक पल भी दुनियादारी में फँसना नहीं चाहता | अतः इस मन को प्यारे प्रभु में डुबो दे | ‘मैं और मेरा …तू और तेरा’ के ढेर को आग लगा दे | आशंका और आशाओं के चीथड़ों को उतार फेंक | टुकड़े-टुकड़े करके पिघला दे | द्वैत की भावना को जड़ से उखाड़ दे | रोटी नहीं मिलेगी ? कोई परवाह नहीं | आश्रय और विश्राम नहीं मिलेगा ? कोई फिकर नहीं | लेकिन मुझे चाहिये प्रेम की, उस दिव्य प्रेम की प्यास और तड़प |

मुझे वेद पुराण कुरान से क्या ?

मुझे सत्य का पाठ पढ़ा दे कोई ||

मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं |

मुझे प्रेम का रंग चढ़ा दे कोई ||

जहाँ ऊँच या नीच का भेद नहीं |

जहाँ जात या पाँत की बात नहीं ||

न हो मंदिर मस्जिद चर्च जहाँ |

न हो पूजा नमाज़ में फर्क कहीं ||

जहाँ सत्य ही सार हो जीवन का |

रिधवार सिंगार हो त्याग जहाँ ||

जहाँ प्रेम ही प्रेम की सृष्टि मिले |

चलो नाव को ले चलें खे के वहाँ ||

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