False Allegations

कुप्रचार पर भारी अनुभव

जिन भी संतों-महापुरुषों ने संस्कृति रक्षा व जन-जागृति का कार्य किया है, उनके खिलाफ षड्यंत्र रचे गये हैं। जगदगुरू आद्य शंकराचार्य जी का इतना कुप्रचार किया गया कि उनकी माँ के अंतिम संस्कार के लिए उन्हें लकड़ियाँ तक नहीं मिल रही थीं। महात्मा बुद्ध पर बौद्ध भिक्षुणी के साथ अवैध संबंध एवं उसकी हत्या का आरोप लगाया गया। स्वामी विवेकानंदजी पर चारित्रिक आरोप लगाकर उन्हें खूब बदनाम किया गया। संत नरसिंह मेहताजी को बदनाम करने व फँसाने के लिए वेश्या को भेजा गया। संत कबीर जी पर शराबी, कबाबी, वेश्यागामी होने के घृणित आरोप लगाये गये। भक्तिमती मीराबाई पर चारित्रिक लांछन लगाये गये एवं जान से मारने के कई दुष्प्रयास हुए। संत ज्ञानेश्वर जी और उनके भाईयों व बहन को निंदकों द्वारा समाज-बहिष्कृत किया गया था। संत तुकाराम जी को बदनाम करने हेतु उन पर जादू टोना और पाखण्ड करने के झूठे आरोप लगाये गये व वेश्या भेजी गयी। इतना परेशान किया कि उन्हें अपने अभंगों की बही नदी में डालनी पड़ी और उपराम हो के 13 दिनों तक उपवास करना पड़ा।

वर्तमान में भी शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती, स्वामी नित्यानंदजी, स्वामी केशवानन्दजी, श्री कृपालु जी महाराज, संत आशाराम जी बापू, साध्वी प्रज्ञा सिंह आदि हमारे संतों को षड्यंत्र में फँसाकर झूठे आरोप लगा के गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया, अधिकांश मीडिया द्वारा झूठे आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया परंतु जीत हमेशा सत्य की ही होती रही है और होगी।

सत्यमेव जयते। सत्य की ही विजय होती है।

इतिहास उठाकर देखें तो  पता चलेगा कि सच्चे संतों व महापुरुषों की जय-जयकार होती रही है और आगे भी होती रहेगी। दूसरी ओर निंदकों की दुर्गति होती है और समाज उन्हें घृणा की दृष्टि से ही देखता है। अतएव समझदारी इसी में है कि हम संतों का आदर करके या उनके आदर्शों को अपनाकर लाभ न ले सकें तो कम-से-कम उनकी निंदा करके या सुनके अपने पुण्य व शांति को तो नष्ट न करें।

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