Parent's Worship Day

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम

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अनादिकाल से महापुरुषों ने अपने जीवन में माता-पिता और सदगुरु का आदर-सम्मान किया है। पूज्य बापू जी ने भी बाल्यकाल से ही अपने माता-पिता की सेवा की और उनसे ये आशीर्वाद प्राप्त कियेः

पुत्र तुम्हारा जगत, में सदा रहेगा नाम। लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम।।

पूज्य श्री अपने सदगुरु भगवत्पाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज की आज्ञा में रहकर खूब श्रद्धा व प्रेम से गुरुसेवा करते थे। माता-पिता और सदगुरु की कैसी सेवा-पूजा करनी चाहिए इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पूज्यश्री के जीवन में देखने को मिलता है। उनकी सेवा से संतुष्ट माता-पिता और सदगुरु ने उन्हें कोई कमी भी नहीं रखी। इसका वर्णन करते हुए पूज्य बापू जी कहते हैं- “मैं अपने-आप में बहुत संतुष्ट हूँ। पिता ने संतोष के कई बार उदगार निकाले और आशीर्वाद भी देते थे। माँ भी बड़ी संतुष्ट रही और सदगुरु भी संतुष्ट रहे तभी तो महाप्रयाण मेरी गोद में किये और उऩ्हीं की कृपा मेरे द्वारा मेरे साधकों और श्रोताओं को संतुष्ट कर रही है, अब मुझे क्या चाहिए ! जो मुझे सुनते हैं, मिलते हैं, वे भी संतुष्ट होते हैं तो मुझे कमी किस बात की रही !”

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