संत वाणी

गुरु का प्यार निराला

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सेवा करने की स्वाधीनता मनुष्यमात्र को प्राप्त है | अगर वह करना ही चाहे तो अलग बात है | सेवा का अर्थ है : मनवाणीकर्म से बुराईरहित हो जानायह विश्व की सेवा हो गई | यथाशक्ति भलाई कर दो यह समाज की सेवा हो गई | भलाई का फल छोड़ दो यह अपनी सेवा हो गई | प्रभु को अपना मानकर स्मृति औरप्रेम जगा लो यह प्रभु की सेवा हो गई | इस प्रकार मनुष्य अपनी सेवा भी कर सकता है, समाज की सेवा भी कर सकता है, विश्व की सेवा भी कर सकता है और विश्वेश्वर की सेवा भी कर सकता है |

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