संत वाणी

ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि अमृतवर्षी

श्री आशारामायण,गुरुसेवा,प्रभु जी,गुरुदेव,मेरे राम,हरिओम,आशाराम जी,#HappyParentsWorshipDay,आसाराम बापू,नारायण,yss,bsk,mum,dpp,syvmr,gurukul,hariomgroup.org,ashram.org,google+,false allegationधरती में तमाम प्रकार के बीजों में रस भरने की शक्ति है। जैसा बीज होता है, ऐसा रस ले आता है धरती से। ऐसे ही हमारा साहित्य कैसा है ? हमारा संग कैसा है ? हमारा खानपान कैसा है ? हमारी इच्छा कैसी है ? हमारी आवश्यकता कैसी है ? जैसी-जैसी हमारी इच्छा, आवश्यकता, संग, खानपान आदि होते हैं, देर सवेर वैसी ही हमें प्राप्ति होती है।
नश्वर वस्तुओं की इच्छा-वासना बढ़ाने वाला संग करके नश्वर वस्तुओं की ही सत्यबुद्धि से इच्छा और प्रयत्न करते हैं तो हम नश्वर वस्तु और नश्वर शरीर प्राप्त करते जाते हैं… फिर मरते जाते हैं…. फिर जन्मते जाते हैं। यदि हम शाश्वत का ज्ञान सुनें, शाश्वत की इच्छा पैदा हो और मनन करके शाश्वत की गहराई में तनिक सी खोज करें तो शाश्वत आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार भी हो सकता है। वे लोग सचमुच में भाग्यशाली है जिनकी सत्संग में रूचि है और जिन्हें आत्मज्ञान और आत्मविज्ञान श्रवणार्थ मिलता है।
शिवजी ने लक्ष्मण की ओर देखा तो लक्ष्मण जी भगवान राम से प्रार्थना करते हैं- “प्रभु ! आपकी कृपा और आशीर्वाद होगा तो ही मैं सफल हो सकूँगा अन्यथा दोनों भ्राताओं जैसा मेरा हाल भी होगा।” श्रीराम का संकेत पाकर लक्ष्मणजी ने शिवजी से प्रार्थना की किः “नाथ ! उठेंगे तो आप अपनी ही सत्ता से, किन्तु यश इस दास को मिल रहा है।”
शिवजी प्रसन्न होकर उठ खड़े हुए।
राम जी गालों में मन्द-मन्द मुस्कराये।
मुस्कान तीन प्रकार की होती है। एक तो साधारण तौर पर हम लोग ठहाका मारकर खुलेआम हँसते हैं- स्वास्थ्य के लिये यह बहुत अच्छा है।
दूसरी होती है मधुर मुस्कान, जो गालों में ही मुस्करा दी जाती है।
तीसरी है यौगिक मुस्कान, जिसे ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हुए आत्मयोगी पुरूष नेत्रों से मुस्कुरा देते हैं। नेत्रों की यह मुस्कान इतना अधिक महत्त्व रखती है कि हजारों नहीं, लाखों आदमी भी अगर बैठे हों और योगी नेत्रों से मुस्कुरा दिया तो लाखों आदमियों को ऐसी शीतलता, शांति और आनंद मिलेगा जो दुनिया की तमाम सुख-सुविधाओं और साधनों के उपभोग से भी उन्हें नहीं मिल सकता है। जिन्हें श्रीराम, श्रीकृष्ण अथवा महापुरूषों के नेत्रों की मुस्कान मिली होगी, उसका आनंद वे ही जानते होंगे।
निगाहों से वे निहाल हो जाते हैं
जो निगाहों में आ जाते हैं।।
ब्रह्मज्ञानी की दृष्टी अमृतवर्षी।
श्रीकृष्ण ने भी ऐसा ही अमृत बरसाया था अन्यथा बाँसुरी की धून से ग्वाल-गोपियाँ पागल हो जाएँ और गौ के बछड़े दूध पीना छोड़ दें यह संभव नहीं था। बंसी के साथ श्रीकृष्ण के नेत्रों की मुस्कान छलकती थी तभी तो ग्वाल-बाल बावरे हो जाते थे।
सिंधी जगत में एक भजन बना हैः
क्या जादू हणी मुंजे जीय में जोगी….
तिन सामीन खे त संभार्या पई।
करे याद उननजी रहमत खे
मां वर वर ओडां निहार्या पई।।
“मेरे जी में, मेरे हृदय में, मेरे चित्त में वह जोगी जादू लगाकर गया है। एक निगाह डाल दी बस ! अब मैं उन्हें बार-बार याद करती हूँ।”
रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र पर ऐसा ही जादू बरसाया था कि नरेन्द्र में से विवेकानंद हो गये जिन्होंने कहा थाः “मुझे बेचकर चने खा जायें ऐसे विद्वान मेरे कालेज से निकले। मेरी कक्षा के लड़के व मुझे पढ़ानेवाले लोग भी मुझसे आगे थे। काशी में मुझे बेचकर चने खा जाएँ ऐसे विद्वान अभी-भी मिलेंगे फिर भी खेतड़ी के महाराजा रथ में से घोड़ों को हटाकर स्वयं रथ खींचते थे और मुझे बिठाकर स्वागत करते थे, यह मेरे गुरूदेव की निगाह का प्रसाद नहीं तो और क्या है….?”
नूरानी नजर सां दिलबर दरवेशन मोखे निहाल करे छड्यो।
ज्ञान-विज्ञान से जो तृप्त हुए हैं उनकी नजरें नूरानी होती हैं। बाहर से तो वे साधारण दिखती हैं लेकिन उन आँखों से सदैव जो आध्यात्मिकता की ज्योति का प्रकाश बरसता है वह अदभुत होता है।
अमेरिका की डेलाबार प्रयोगशाला में पिछले दस वर्षों से निरंतर रिसर्च करते हुए वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि जो उन्नत एवं उत्तम पुरूष हैं उनकी दृष्टि पड़ते ही या उनके वातावरण में आते ही हमारे एक घन मिलीमीटर रक्त में 1500 श्वेतकण निर्मित होते हैं जो आरोग्यता और प्रसन्नता प्रदान करने में सहायक होते हैं।
विज्ञान तो अब बता रहा है लेकिन हमारे शास्त्र, संत और परम्परा तो सदियों से कहती आ रही है कि दूल्हा-दुल्हन जब आवें तो पहले उन्हें गुरू महाराज के पास शीश नवाने भेजना चाहिए। मरणोपरांत शवयात्रा ले जाते समय श्मशान के मार्ग में कोई मंदिर आता है तो उस मुर्दे को भी देवदर्शन करवाने का विधान है ताकि देवदर्शन के निमित्त किसी हृदय के ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हुए महापुरूष की नजर पड़ जाए तो इस मुर्दे का भी कल्याण हो जाए। यह हमारी व्यवस्था थी।

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