संत वाणी

जीवन

जैसे बड़े होते-होते बचपन के खेलकूद छोड़ देते हो, वैसे ही संसार के खेल

कूद छोड़कर आत्मानन्द का उपभोग करना चाहिये | जैसे अन्न जल का सेवनकरते हो, वैसे ही आत्मचिन्तन का निरन्तर सेवन करना चाहिये | भोजन ठीक से होता है तो तृप्ति की डकार आती है वैसे ही यथार्थ आत्मचिन्तन होते ही आत्मानुभवकी डकार आयेगी, आत्मानन्द में मस्त होंगे | आत्मज्ञान के सिवा शांति का कोई उपाय नहीं |

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