Question & Answer

असली-नकली संत (Real – fake saint)

धर्म-अध्यात्म के नाम पर ढोंगियों की बाबागीरी

असली-नकली संत

प्रश्न: आजकल सामान्य मनुष्य के लिए सच्चे संत और नकली संत का भेद समझना कठिन हो गया है. एक ही तरह के आरोप दोनों पर लगे हो, एक जैसे दोनों के वस्त्र हो, और एक जैसे ही जीवन परिवर्तन के अनुभव दोनों के अनुयायी बताते हो तब कैसे जाने कि कौन असली संत है और कौन ढोंगी?

ऐसे ढोंगी संतो के द्वारा लाखो अनुयायिओं और अरबो की संपत्ति का साम्राज्य कैसे स्थापित हो सकता है ?

उत्तर: सच्चे महात्मा और पाखंडी महात्मा का फर्क करना आजकल के सामान्य लोगों की समस्या ही नहीं है, सब युग में सब वर्ग के लोगों की यह समस्या रही है. त्रेता युग में भी रावण ने सीताजी को धोखा देने के लिए साधू का वेश धारण किया था और हनुमानजी को भी कालनेमि असुर ने साधू वेश धारण करके ठगने का प्रयास किया था. यह बात सर्वविदित है. प्राचीन काल में शासन का यह कर्तव्य होता था कि जनता की श्रद्धा से कोई पाखंडी ठग खिलवाड़ न करे इसलिए सिर्फ राज्य में आयोजित शास्त्रार्थ के द्वारा प्रमाणित मत, साधना, तत्त्वज्ञान आदि का प्रचार प्रसार ही हो सकता था. इसी वजह से जब भारत में पाखंडी मत पंथ वाले संत बढ़ गये और वेदिक धर्म का ह्रास होने लगा तब आदि गुरु शंकराचार्य ने प्रत्येक राज्य में शास्त्रार्थ के द्वारा उन पाखंडियों की पोल खोलकर वेदिक धर्म की स्थापना की. लेकिन धर्म निरपेक्ष शासन में राष्ट्र के धर्म की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य नहीं रहा. सब अपने अपने मत का प्रचार कर सकते है चाहे वे शास्त्र सम्मत हो या कपोल कल्पित. इसलिए ऐसे ढोंगी लोग बढ़ गये जो समाज को वेदिक मार्ग से गुमराह करते हो.

प्राचीन काल में बचपन से विद्यार्थी को धर्म की शिक्षा  गुरुकुल में दी जाती थी जिस से वे सच्चे वेदिक धर्म और अवैदिक पाखंडी पंथ का भेद समझ सकते थे और समाज की पाखंडियों से रक्षा भी कर सकते थे. लेकिन वर्त्तमान समय में सिर्फ रोटी कमाने की विद्या ही स्कूल कोलेज में पढ़ाई जाती है, क्योंकि सेकुलर सरकार का धर्म की शिक्षा देने का दायित्व नहीं रहा. दुसरे मजहब वाले तो मदरसा और ईसाई स्कूलों में अपने मजहब की शिक्षा देते है, पर हिंदू लोग ऐसा कुछ नहीं करते क्योंकि वे सेकुलर है. और हिंदू माता पिता भी अपने बच्चों को लौकिक शिक्षा देकर अच्छी नौकरी धंधा दिलाना और  उसे अधिक धन देना ही अपना कर्तव्य समझते है, उनको धर्म की शिक्षा देने के लिए उनके पास समय नहीं है, और सच पूछो तो धर्म का ज्ञान भी उनके पास नहीं है. कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हिंदू विरोधी लोगों के द्वारा बनाये गये पाठ्य क्रम का अभ्यास करते करते, भोगवादी चलचित्रों और वीडियो चेनलों के प्रोग्राम देखते देखते उनके हिंदुत्व के संस्कारों को और धार्मिकता को प्रायः नष्ट कर दिया गया है. कम्युनिस्ट दुसरे देशो की विचारधारा को Ideological subversion के द्वारा नष्ट कैसे करते है इसे आप Yuri Bezmenov की Breaking India video file में देख सकते हो. इसलिए पढ़े लिखे लोग भी धर्म के विषय में उतने ही अज्ञानी होते है जितने अनपढ़ लोग. कभी कभी अनपढ़ लोग पढ़े लिखे लोगों से धर्म के विषय में ज्यादा समझदारी रखते है. अतः लोग जीवन में सबसे  ज्यादा मूल्यवान वस्तु धर्म के विषय में बुरी तरह ठगे जाते है.

जैसे शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी उसी विद्यालय में प्रवेश लेते है जो Government recognized याने सरकार द्वारा प्रमाणित हो, जाली प्रमाण पत्र देनेवाली किसी शिक्षा संस्थान से बिना पढ़े लिखे भी कोई प्रमाण पत्र दे तो उसे नहीं लेते और कठोर मानसिक परिश्रम करके प्रतिष्ठित कोलेज से प्रमाण पत्र लेते है क्योंकि वे जानते है जाली प्रमाण पत्र से नौकरी नहीं मिलती. लेकिन धर्म के क्षेत्र में वेदिक धर्म के अनुसार मुक्ति के लिए इन्द्रिय संयम, धर्म का आचरण, उपासना, ध्यान आदि के क्रम से ले जानेवाले संतो के पास ही सब लोग नहीं जाते. बिना संयम और परिश्रम के ही मुक्ति देनेवाले के चक्कर में फंस जाते है. जैसे धन कमाने के लिए नौकरी, धंधा आदि करना पड़ता है लेकिन कोई कहे कि तुम्हे कुछ करना नहीं पड़ेगा, न नौकरी और न धंधा. तुम्हारे घर में जो पैसे है वो हमको दे दो हम तुमको दुगुने पैसे देंगे. तो लोभी लोग  उनके चक्कर में आकर धनिक बनने के बदले बिल्कुक दरिद्र बन जाते है. उनके पास जो धन था वह भी चला जाता है और वे बुरी तरह ठगे जाते है. और इमानदारी से धंधा करनेवाले की तुलना में ऐसे ठग ज्यादा धनवान होते है. रजनीश के पास कितना धन था उसकी एक झलक निम्न अंश से मिलेगी:

The Oregonian reported Sheela’s public claim to the press in late 1985 that Rajneesh was like an insatiable child making incessant demands of her to expand his fleet of Rolls-Royces beyond the 93 he already had (he wanted one for every day of the year) and to procure other costly items. “He wanted to make it into the record books as the man with the most [Rolls Royces], and it was costing the financially shaky commune $200,000 a month [for these Rolls Royces were never “gifts” free and clear, as the Rajneeshees claimed].” He also kept demanding a certain $4 million diamond wristwatch, “telling her to divert funds from the commune’s needs if necessary.” (Part 4, April 2011) David Knapp corroborated the general truth of the latter part of Sheela’s statement in his testimony to the FBI; according to the FBI’s summary document, “Knapp recalled a meeting between Sheela and some of her people and three members of the ‘Hollywood’ group, including Hasya. ‘Sheela was opposed to Hasya purchasing [for Rajneesh] a Calista watch for 2.5 to 3 million dollars….

In late August 1981 Rajneesh moved out west to the 64,000-acre Big Muddy Ranch procured for nearly $6 million by Ma Sheela in high-desert terrain mainly in Oregon’s Wasco County, 160 miles by slow-going road southeast of Portland. Now along the John Day River and adjacent canyons and hills they created an impressive state-of-the-art reservoir, sewage system, 85-bus free public transport system, suburban style residential spaces, telecommunications center, 10-megawatt power substation, airstrip, 88,000 square-foot meeting hall, 3,000 acres of cleared farmland, verdant areas with gardens and extensive tree-plantings, dairy and poultry farms, a post office, school and meditation “university,” fire and police departments, shopping malls, visitors’ hotels, restaurants, and disco-bar, casino and other delights to cater to this most carnal of spiritual crowds. (A hotel, restaurant, and disco-bar were also created in Portland to help raise funds.)

तो लाखों लोगों को अनुयायी बनाना या अरबों का साम्राज्य बनाना इन ठगों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है, ऐसी घटनाएँ कई बार होती है. ऐसे ही जो कहे कि संयम की कोई जरूरत नहीं है, तुम्हें धर्म आचरण की आवश्यकता नहीं है, तुम चाहे दुराचरण करते रहो, मैं तुमको सीधी मुक्ति दे देता हूँ. तो उनके चक्कर में आनेवाले अपना संयम, पवित्रता और धार्मिकता की संपत्ति को भी खो देते है और मुक्ति से भी वंचित रह जाते है. ऐसा रजनीश जैसे कई तथाकथित पाखंडी गुरुओं ने किया है और बाद में उनकी वास्तविकता प्रकट हुई कि वे कितने पाखंडी थे. ऐसे ही रामपाल ने भी “बंदगी  छोड़” का उपदेश देकर अनेक को ईश्वर की भक्ति के मार्ग से भ्रष्ट कर के अपना पंथ चलाया है. जिनके विकार मिटे नहीं हो उनसे भक्ति छुडाकर उसे कोई विकारों से कैसे मुक्त कर सकेगा? यदि वास्तव में मनुष्य बुद्धिमान होता तो वह एक के दो देनेवाले के चक्कर में नहीं आता और अपने धन की सुरक्षा कर लेता लेकिन लोभी उनके चक्कर में आ जाते है. ऐसे ही सच्चा साधक होता तो सोचता कि सब धर्मो ने संयम की अनिवार्य आवश्यकता बताई है, और अंतःकरण के विकारों को मिटाए बिना मुक्ति मिलना संभव ही नहीं है फिर ये विकारों को मिटाए बिना ही संस्कारों को छीन लेनेवाला मुक्ति कैसे दे सकेगा? वह अवश्य पाखंडी होगा. लेकिन जिनका लक्ष्य निरंकुश वासना तृप्ति का है, वे व्यभिचार को स्वीकृति देनेवाले ढोंगी गुरु के चक्कर में आ जाते है. फिर सम्भोग से समाधी के बदले वे पागलपन, और AIDS  जैसे यौन रोगों के शिकार हो जाते है. इस के प्रमाण चाहिए तो साथ में संलग्न एक तटस्थ विदेशी विद्वान लेखक का अंग्रेजी लेख पढ़ो तो मालूम पड़ेगा कि कितनी चालाकी से उस पाखंडी गुरु ने बड़े बड़े लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी काम वासना, धन की लोलुपता और महापुरुष कहलाने की महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति की. उस लेख का एक अंश निचे दिया गया है जिसमे उनकी वास्तविकता का दर्शन होता है:

This legacy involved very misleading or imbalanced teachings as well as quite helpful wisdom, some really bad advice along with genuinely good counsels, a slew of lies about himself and his movement, dozens of glaring errors in his discussions of world religions and other subjects, personal role-modeling of voracious materialist greed and conniving ambition for fame and power, narcissistic ego-inflation along with authoritarian power-plays and lack of empathy, intellectual dishonesty and petty oneupsmanship tactics, a hypocritical inability to live what he preached (e.g., telling everyone to “go beyond the mind” while talking for tens of thousands of hours from a heavily opinionated and error-prone mind; preaching that the enlightened one lives in tension-free ease viewing life as a play while he himself frequently used laughing gas/nitrous oxide and valium to the point of incoherence, said some of his closest people), a penchant by Rajneesh and his appointed leaders for deceitful spinning or rationalizing nearly every time they were confronted on anything of importance, heavy solicitations and numerous scams by his appointed leaders to fleece his followers and their families of as much of their money and possessions as possible (especially from 1980 onward), crushing work-loads for exploited disciples (routinely 15-18 hours, 7 days a week, at the Oregon ranch in USA from 1981-5), a commune at Poona, India and then one in Oregon often buzzing with ecstatic excitement and groovy sensuality but also debauched by wanton sex (and countless venereal diseases), a several-year period of violence at Poona and branch-communes worldwide (resulting in bruises, blood, even broken bones and rapes) until it was banned by the Rajneesh Foundation in 1979, and diverse criminal activity from the mid-1970s to mid-1980s in both India and Oregon. The crimes, as recounted by former disciples, included drug running, swindling and prostitution by many ashramites to pay for their lengthy stays in India or funnel money to the commune; extensive immigration fraud and tax fraud conducted by Rajneesh and Foundation leaders in India and then the USA; currency and gold smuggling when they moved to the USA in 1981; a slew of frivolous lawsuits launched to harass and intimidate local Oregon citizens from 1982-1985; failing to pay many of their loans in the USA; arson (one incident in India to defraud an insurance company, another arson attack in USA to destroy county records), racketeering, burglary, assault, conspiracy and illegal electronic surveillance (the largest such wiretapping-bugging operation ever uncovered); criminal bioterrorism sickenings of some 750 Oregonians and attempted assassinations of select outsiders and insiders in 1984-1985 by some of Rajneesh’s top circle of people, led by his authorized lieutenant, Ma Sheela; and intermittent poisonings of scores if not hundreds of Rajneesh sannyasins from the late 1970s until Sheela and her “Dr. Mengele” Ma Puja left in 1985. In all, just assessing the illegal activity in the USA from 1981-1985 (not to mention earlier crimes in India), 32 Rajneeshees were charged with crimes in Oregon; 23 pleaded guilty; 2 were convicted at trial; 4 still remain fugitives; 8 served prison time.

The Rajneesh legacy also includes deliberately divided and broken families, serial noncommittal relationships, sham marriages to defy immigration laws, mass abortions and sterilizations of women (many suffering from surgical complications) and vasectomies for men all ordered by the guru, a few thousand neglected children, and, for too many periods of time, neglect by Rajneesh of the spiritual welfare and bodily-emotional-financial welfare of tens of thousands of young adults and older disciples who had given to this mesmerizing little man so much of their lives—their souls, minds, energy, money and years of labor. The majority of these disciples never or only rarely complained, having been brainwashed to regard all the manipulation, neglect and/or abuse as a “test,” a “game,” a “big joke” by the Bhagwan and his elites.

सच्चे महात्मा अपने अनुयायिओं को व्यभिचार, हिंसा, आदि अपराधिक कृत्यों से मुक्त करते है और पाखंडी महात्मा खुद भी ऐसे कृत्य करते है और अपने अनुयायिओं को ऐसे कृत्य करने में प्रवृत्त करते है.

महात्मा के आत्मज्ञान का अनुभव कोई बाह्य लक्षण से मालूम नहीं पड़ता. किसी के पास योग की सिद्धि हो तो उसकी सिद्धि देखकर मालूम पड़ता है कि वह आकाशमे उड़ सकता है, पानी पर चल सकता है. लेकिन आत्मज्ञान का ऐसा कोई बाह्य लक्षण नहीं होता. सिर्फ  उनके सान्निध्य से जिज्ञासु के संशय मिटने लगते है और उसे अनायास शान्ति का अनुभव होता है. और उनकी वाणी श्रुति, युक्ति और अनुभूति से सम्पन्न होती है. तो कोई सच्चा महात्मा है कि नहीं वो सब लोग नहीं जान सकते फिर भी जैसे कोई मरीज शस्त्रक्रिया को नहीं जानता हो फिर भी जब उसे शस्त्र क्रिया करानी हो तो किसी प्रमाणभूत विश्वविद्यालय से जिसने अंतिम परीक्षा का प्रमाण पत्र प्राप्त किया हो ऐसे अनुभवी डॉक्टर के पास जाएगा, जिसने बिना किसी विश्वविद्यालय में अभ्यास किये ही अपने नाम के आगे डिग्रियां लिख दी हो, या जिसने जाली प्रमाणपत्र देने वाले विद्यालय से प्रमाण पत्र लिया हो, या जिसने अंतिम परीक्षा पास न की हो ऐसे डॉक्टर के पास नहीं जाएगा चाहे वह कम कीमत में भी इलाज कर देता हो. तो एक बार मरने से बचने के लिए भी लोग इतनी सावधानी रखते है पर बार बार मौत से बचाने के विषय में अपने गुरु के चयन में सावधानी नहीं रखते. वे यह नहीं देखते कि उनको मुक्ति देने की बात करनेवाला किसी सत् सम्प्रदाय की गुरु परम्परा से जुड़े हुए ब्रहमज्ञानी महात्मा के विश्व विद्यालय से अंतिम परीक्षा पास कर के आया है या किताबे पढकर खुद ही गुरु बन बैठा है. उसका उपदेश उपनिषद के श्रुति से सम्मत है या मनघडंत है. वह मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार के पथ का मार्ग दर्शन करता है कि लौकिक लाभ, शारीरिक स्वास्थ्य और बुद्धि की योग्यता बढाने पर ही ध्यान देता है. कलियुग में अनेक सम्प्रदाय चल पड़े है जो वेद विरोधी है. कोई कहता है कि हमारे मजहब में जुड जाओ तो तुम्हे सब कुछ करने की छूट मिलेगी, चाहे कितने भी पाप करो तुमको प्रभु ईसा मसीह की शरण लेने मात्र से स्वर्ग मिलेगा. हिंसा करो, मांसाहार करो, शराब पीओ, व्यभिचार करो, सब पाप करो और फिर क्षमा मांग लो. फिर दुसरे दिन वही करते रहो. कोई कहेगा कि हमारे मजहब में आनेवाले को ही जन्नत मिलता है दुसरे सब जहन्नुम में जाते है. और जन्नत में शराब के चश्मे है, और हूरें मिलती है. कोई सम्प्रदाय वाले कहते है कि हमारे भगवान की शरण आ जाओ तुमको मरने के बाद उनके लोक की प्राप्ति होगी और वहाँ उनकी दया से मुक्ति मिलेगी, और कोई कहता है हमारे सम्प्रदाय में आओगे तो मरने के बाद तुमको हमारे गुरु कंधे पर बिठाकर स्वर्ग में ले जाएंगे. कोई कहता है हमारा Art of living कोर्स कर लो तुम तनाव मुक्त हो जाओगे. तुम्हारी योग्यता बढ़ जायेगी. जीवन का लक्ष्य केवल तनाव मुक्त होकर लौकिक सफलता की योग्यता प्राप्त करना ही है क्या? क्या उस कोर्स करनेवाले को आत्मज्ञान हो जाएगा? जब कोर्स बनानेवाले और सिखानेवाले को ही आत्मज्ञान नहीं हुआ तो कोर्स करनेवाले को कैसे होगा? यदि उसे आत्मज्ञान हुआ होता तो वह आत्मज्ञान का निःशुल्क उपदेश देकर लोगों का अज्ञान मिटाता, सनातन धर्म की साधनाओ को जोड़कर कोई कोर्स बनाकर आध्यात्मिकता का बिजनेस नहीं करता. जिस कोर्स करने से जन्म मरण से मुक्ति न मिले वह कोर्स वास्तव में जीने की कला नहीं सिखाता. जीने की कला तो सच्चे महापुरुष सिखाते है जिस से जन्म मरण के चक्कर से मुक्ति मिल जाय. बाकी तो Art of living के नाम पर एक अध्यात्मिकता की बिक्री का बिजनेस है, जिसका सच्ची आध्यात्मिकता से कोई सम्बन्ध ही नहीं है. कोई कहता है भावातीत ध्यान करो तुमको इतने लाभ होंगे. तुम आकाश में ऊपर उठ जाओगे. आकाश में उठ जान ही योग का लक्ष्य है क्या? बहुतसे पक्षी आकाश में उड़ते है. शरीर जमीं से ऊपर उठ भी गया तो भी तुम तो शरीर में ही बैठे हो. देहाध्यास से ऊपर उठे बिना भावातीत ध्यान से आत्मज्ञान होगा क्या? अगर आत्मज्ञान नहीं होता तो वह ध्यान किस कामका?  कोई कहता है योग कर के समाधी सिद्ध होगी तब मुक्ति मिलेगी. समाधी से जागने पर उस योगी को विक्षेप हो जाता है. वह योगी भी एक अंतःकरण से जुड़ा हुआ जीवात्मा ही है, महात्मा नहीं. इस तरह अनेक वेद विरोधी मजहबो और संप्रदायों के जंगल में अनपढ़ और सुशिक्षित, अमीर और गरीब सब उलझते जाते है. कुछ भक्ति मार्ग पर चलने वाले सम्प्रदाय है तो कुछ योग मार्ग पर चलनेवाले सम्प्रदाय है वे अपनी अपनी जगह पर ठीक है पर सब अनुयायिओं को एक ही दायरे में जिंदगीभर बांधकर रखते है और उनको अंतिम सत्य तक पहुँचने नहीं देते. ऐसे धर्मों और संप्रदायों की पोल खोलते हुए अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ वेदिक स्टडीज के निदेशक डॉ. डॉ.डेविड फ्राली अपनी पुस्तक ‘उत्तिष्ठ कौन्तेय’ में लिखते है: “अध्यात्म का यदि कोई सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है तो वह है वेदान्त. वेदान्त हमें अंतिम चिरंतन सत्य तक ले जाने में सक्षम है. आत्मा की जिज्ञासा तक ले जानेवाला ही धर्म है और वह हमें आत्मज्ञान के मार्ग पर छोड़ देता है. यदि कोई धर्म यह कार्य नहीं कर सकता तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं. उसमे कुछ कमी अवश्य है. जो धर्म उच्चतम सत्य को स्वीकार नहीं करता यानी आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य को स्वीकार नहीं करता वह हमें वहाँ तक पहुँचा ही नहीं सकता अपितु आधे रास्ते में ही हमें भटकने के लिए छोड़ देगा अथवा हमें उससे बाहर होकर आधे रास्ते में उसे छोड़ना पड़ेगा. जिस धर्म से आत्मज्ञान प्राप्त न हो अथवा आत्मज्ञान की प्राप्ति जिस धर्म का लक्ष्य न हो क्या वह धर्म है?” जीते जी मुक्ति देनेवाले जीवन्मुक्त महापुरुष कभी कभी कहीं कहीं होते है जो शिष्य को उसकी योग्यता के अनुसार उसे धर्माचारण, निष्काम कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग आदि के द्वारा उन्नत करते हुए उसे वेदान्त के उपदेश के द्वारा अंतिम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार तक पहुँचाने की योग्यता रखते है. ऐसे महात्मा के अधिकारी शिष्य को ही इसी जीवन में जन्म मरण से मुक्ति, शाश्वत सुख की प्राप्ति  और दुखो की आत्यंतिक निवृत्ति का अनुभव होता है. वे अध्यात्मिकता का व्यापार नहीं करते. खुल्ले हाथ आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान को लुटाते है जिसका लाभ समाज के हर वर्ग के लोग चाहे गरीब हो चाहे अमीर, अनपढ हो या सुशिक्षित हो, ले सकते है.

प्रायः इन बातों से अनभिग्य लोग जो वे नहीं कर सकते ऐसा कोई करता है तो उसे महात्मा मानने लगते है. “वे तो आकाश में उड़ते है. बड़े महात्मा है.” तो तो फिर चिड़िया को भी महात्मा कहना पड़ेगा. “वे तो पानी में ही रहते है, बाहर आते नहीं.” तो तो फिर मछली और कछुए को भी महात्मा कहना पड़ेगा. “पाइलट बाबा की जापानी शिष्या तो जमीं में गाड़ देने के बाद सात दिन समाधी में रही और फिर बाहर आई. बड़ी महात्मा है.” तो तो फिर अलास्का के मेढक को उनसे बड़ा महात्मा कहना पड़ेगा जो शून्य से निचे १८ डिग्री सेल्शियस तापमान होने पर भी बर्फ में समाधि लगाकार २१८ दिन के बाद जिन्दा हो जाते है. “ये बड़े महात्मा है उनको नील बिंदु दीखता है, प्रकाश दीखता है याने आत्मा का दर्शन हो गया है. वे कुण्डलिनी जगा देते है.” वेदान्त की दृष्टि से आत्मा दृष्टा है, दृश्य नहीं. यदि प्रकाश या नील बिंदु दिख गया तो वह आत्मा का दर्शन नहीं है. वह तो एक दृश्य है जो उनको दिखा. ध्यान या समाधि में किसी को कुछ दिख जाए और उसे वह आत्मा का दर्शन माने तो यह बात वेदान्त से सम्मत नहीं है. वेदान्त उनको आत्मज्ञानी नहीं मानता. कुण्डलिनी जगाने का सामर्थ्य भी एक अभ्यास जन्य सिद्धि है. जिसे अज्ञानी लोग भी प्राप्त कर सकते है. उसका भी वेदान्त निर्दिष्ट आत्मज्ञान से कोई सम्बन्ध नहीं है. कुण्डलिनी योग के द्वारा किसी ने सम्पूर्ण यात्रा की हो तो वह बात दूसरी है. ऐसे योगी का अनुभव वेदान्त के तत्त्वज्ञानी के अनुभव से एकरूप हो जाएगा जैसे काक भुशुण्डिजी का अनुभव वसिष्ठ मुनि के अनुभव से एकरूप था. वे किसी नील बिंदु या प्रकाश दिखने को ही आत्मा का दर्शन नहीं मानते. “वे तो बड़े कठिन योगासन करते है. बड़े महात्मा है.” योगासन एक शारीरिक कसरत है. उस से शारीरिक स्वास्थ्य, बल, प्राप्त हो सकते है. पर योगासन या प्राणायाम करनेवाला योग के एक अंग को ही जानता है. योग का प्रचार प्रसार करके लोगों को शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करने की युक्तियाँ बताना अच्छी बात है पर सिर्फ योगासन करने के कारण ही कोई आत्मज्ञानी है ऐसा मानना शास्त्र सम्मत नहीं है. योगासन और प्राणायाम से रोग मिट सकते है, उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त हो सकता है मानसिक शक्तियां विकसित हो सकती है पर क्या पतंजलि मुनि ने योग दर्शन का लक्ष्य इसे ही बताया है? योग दर्शन का लक्ष्य है अष्टांग योग के द्वारा अविद्या, अस्मिता, राग द्वेष और अभिनिवेश की निवृत्ति. अगर कोई योग सिखाने वाला इस लक्ष्य के लिए योग नहीं सिखाता तो वह महायोगी पतंजलि को एक चिकित्सक के रूप में ही पेश कर रहा है. यह सच्ची आध्यात्मिकता नहीं है. योगासन करनेवाले से भी ज्यादा लचीला शरीर gymnastics के कुशल अभ्यासी का और Ballet dancer का हो सकता है. तो क्या उनको भी महात्मा कहोगे? “वे तो आकाश में हाथ घुमाकर रुपये के नोट निकालते है. बड़े महात्मा है.” अगर उन्हों ने सच्चे नोट निकाले है तो कहीं न् कहीं से उठाये है, और नए नोट निकाले हो तो जाली नोट बनाने का अपराध किया. “हवा में हाथ घुमाकर नोट, सोने के गहने, भस्म आदि निकालने से आत्मज्ञान का क्या सम्बन्ध है? ऐसा तो जादूगर भी कर सकते है और कर्ण पिशाची या भूत प्रेत वश करने वाले लोग भी कर सकते है. लेकिन भोलेभाले लोग ऐसे लोगों के चक्कर में आ जाते है. और उनके पास करोड़ों, अरबों की संपत्ति हो जाती है. किसी ने सिद्धि के बल से लोहे को सोने में परिवर्तित कर दिया तो भी वह आध्यात्मिकता नहीं है. वैज्ञानिक भी एक धातु को दूसरी धातु में बदल सकते है. तब तो फिर वैज्ञानिक को भी बड़ा महात्मा कहना पड़ेगा. ऐसे एक सूर्य विज्ञान से पदार्थो को बदलने वाले बाबा से पोल ब्रंटन बनारस में मिले थे. उनके सामने विशुद्धानंद ने मरी हुई चिड़िया को जिन्दा कर दी. फिर भी सत्य के जिज्ञासु पोल ब्रंटन ने उनको महात्मा नहीं कहा. A Search in Secret India नामकी पुस्तक में उनको ‘बनारस का जादूगर’ बताया है. और रमण महर्षि के सान्निध्य में उनको बिना पूछे ही अपने प्रश्नों के उत्तर मिलने लगे. उनके दर्शन और सत्संग से जो आध्यात्मिक लाभ हुआ उसके आधार पर उनको सच्चे महात्मा बताया है.

ऐसे लोगो को भी अगर कोई लौकिक अनुभव होता है जैसे किसी का रोग मिट गया, या किसी की मनोकामना पूर्ण हो गई तो यह कोई आध्यात्मिकता का प्रमाण नहीं है. कारण वैज्ञानिक अध्ययन से सिद्ध हुआ है  कि Placebo effect के प्रभाव से ७० -८०% लोग दवाई के रंग का पानी देनेपर भी रोग मुक्त हो जाते है. और वास्तव में किसी ने अपने आशीर्वाद से रोग मिटाया हो तो भी यह एक मानसिक सिद्धि ही है जिसे अज्ञानी भी प्राप्त कर सकते है. तो किसीकी कृपा से जीवन परिवर्तन का अनुभव होने से भी वह कृपा करनेवाला आत्मज्ञानी है ऐसा सिद्ध नहीं होता. डॉक्टर की कृपा से भी मरीज को परिवर्तन का अनुभव होता है, धनवान की कृपा से भी किसी निर्धन की दरिद्रता मिट सकती है. परिवर्तन यदि उसके विकारों को मिटाता हो, उसका जीवन संयमी और सदाचारी बनता हो, उसका वैराग्य बढाता हो और उसकी संसार से विरक्ति और ईश्वर में प्रीति बढती हो, उसकी समझ वैदिक ज्ञान के अनुरूप बनती हो तो उसे आध्यात्मिक परिवर्तन कह सकते है. जो “बंदगी  छोड़” का उपदेश देकर प्रारम्भ से ही ईश्वर की भक्ति छुडा देता हो उसके अनुयायी की ईश्वर में प्रीति कैसे बढ़ सकती है? उपरोक्त परिवर्तन पाखंडी महात्मा के शिष्यों में देखने को नहीं मिलता. और अगर कहीं देखने को मिल भी जाए तो वह उसकी श्रद्धा का फल है, श्रद्धेय की कृपा का नहीं.

किसी दो महात्मा पर एक समान आरोप लग गये इसलिए वे दोनों अपराधी है ऐसा सिद्ध नहीं होता. किसीके आश्रम की छानबीन करने पर पुलिस को शस्त्र मिले, हिंसा का सामना करना पड़ा, और किसी के आश्रम में कोई अवैद्य शस्त्र नहीं मिले, हिंसा की घटना नहीं हुई, इन प्रमाणों पर भी ध्यान देना पड़ेगा.

तो जिन को सच्चे महात्मा के सान्निध्य के द्वार स्वयं उनकी महानता के अनुभव हुए है उनको तो यह प्रश्न नहीं हो सकता कि दोनों में फर्क क्या है पर जिन लोगो का मीडिया द्वारा brain washing किया गया है, जो अपनी स्वतंत्र विचार शक्ति खो बैठे है, जो धर्म शास्त्रों के स्थान पर विदेशी मिडिया के प्रकाशनों को ही पढते है, जिन्हों ने मिडिया को ही अपना गुरु बना रखा है वैसे demoralized लोगों के पास तो बुद्धि ही नहीं है कि वे इस बात को समझ सके कि हिंदू संस्कृति को बदनाम करने के लिए विधर्मी लोग कितने षड्यंत्र कर रहे है. उनको कितने भी प्रमाण दो कांची के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का, कृपालु महाराज का, साध्वी प्रज्ञासिंह और असीमानंद का, सत्य साईबाबा का, स्वामी नित्यानंद का, स्वामी केशवानंद का, जो षड्यंत्रों के द्वारा आरोपों के शिकार हुए पर बाद मे निर्दोष सिद्ध हुए ऐसे अनेक दृष्टांत देखने पर भी वे इस सत्य को नहीं स्वीकार कर पायेंगे क्योंकि उनका Brainwash हो चुका है. वे मीडिया की दृष्टि से ही देखने के लिए मजबूर है जैसे हिप्नोटिस्ट की दृष्टि से ही देखने के लिए हिप्नोटाइज किया गया व्यक्ति मजबूर होता है. हजारों पादरियों के यौन शोषण के अपराध सिद्ध हो चुके है उनकी रिपोर्टिंग भारतीय मिडिया क्यों नहीं करता? भारत में भी कई ऐसे अपराध पादरी करते है, अन्य धर्म के मुल्ला भी करते है. उनके अपराधों को मिडिया क्यों नहीं दिखाता? इस तरह के प्रश्न उसके दिमाग में नहीं आयेंगे. अगर वे तटस्थता से सोचते तो उनको मालूम पड़ जाता कि हिंदू संस्कृति को बदनाम करके धर्मांतरण करने वाले विधर्मी लोग ऐसे षड्यंत्र रचते है.

भारत से कहीं ज्यादा जघन्य यौन शोषण के अपराध कई अन्य देशों में होते है. फिर भी उन देशों के मिडिया उनको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने देश को बदनाम करने के लिए नहीं दिखाता. और भारत में भी जो अपराध होते है उनमे हिंदू के अपराध को ही दिखाए जाते है. अन्य धर्म के आम आदमी भी ऐसे जघन्य अपराध करते है. उन का कभी मिडिया के द्वारा क्यों प्रचार नहीं होता? इतना भी सोचते तो उनको मालूम पड़ जाता कि हिंदू लोगों को परंपरागत चरित्र के मूल्यों को छोड़कर पाश्चात्य जीवन शैली अपनाने के इच्छुक कोंडोम बनानेवाली कम्पनियाँ, AIDS की  दवाइयां बनाने वाली कम्पनियाँ, आदि का भी इसमें हाथ है इतना तो एक जर्मनी की मनोवैज्ञानिक Maria Wirth भी समझ सकती है, पर demoralized and Brain washed हिंदू यह कभी नहीं समझ पायेगा. जब उसके गले में फंदा आएगा तभी वह समझ पायेगा.

(Maria Wirth blog, 27 January 2014 पर पूरा लेख पढ़ सकते हो.)

मिडिया इन दोंनो को एक समान अपराधी क्यों बताता है? मिडिया एक बिजनेस है. और वह पैसे देनेवाले के अनुकूल ही कार्य कर सकता है. इसलिए उनको ‘PAID MEDIA’ कहा जाता है. उनको सत्य क्या है यह मालूम है क्योंकि असत्य दिखाने के लिए ही पैसे मिले है उनको. उनकी आमदनी का आधार सत्य को न समझने पर है, इसलिए उनको आप कभी भी सत्य नहीं समझा सकोगे. “It is difficult to get a man to understand something, when his salary depends on his not understanding it.”  Upton Sinclair.

इस लेख में पाखंडी और सच्चे आत्मज्ञानी महापुरुष का भेद तो बताया ही है पर सच्चे आत्मज्ञानी और अधूरे अज्ञानी गुरु का भेद बताने का प्रयास भी किया गया है. भक्तिमार्ग, योग मार्ग, कुण्डलिनी योग के मार्ग से आध्यात्मिकता का प्रचार करनेवाले सत् सम्प्रदाय से भिन्न अन्य मजहबों, पंथों, और संप्रदायों के सब महात्मा पाखंडी या ढोंगी है ऐसा कहने का तात्पर्य नहीं है. वे अपने अनुयायिओं को शारीरिक स्वास्थ्य लाभ, मानसिक शांति, अंतःकरण की शुद्धि, लौकिक योग्यता और दिव्य अनुभव तो दे सकते है पर उनको आत्मज्ञान देकर जन्म मरण से मुक्त नहीं कर सकते. कोई ठग या चोर तो मनुष्य का धन छीन लेता है लेकिन ऐसे अधूरे गुरु मनुष्य को अपने दायरे में रखकर उस का जन्म मरण से मुक्ति पाने का अधिकार ही छीन लेते है इसलिए वे ठग या चोर से भी ज्यादा खतरनाक है. कुछ सच्चे आत्मज्ञानी गुरु से दीक्षा लेनेवाले लोग भी ऐसे अधूरे गुरुओं को देखकर समझते है कि वे भी सत्संग करते है, वे भी आसन प्राणायाम सिखाते है, इसलिए वे भी हमारे गुरु जैसे ही है. और उनके चक्कर में आ जाते है. ऐसे भोलेभाले भक्तों को यह लेख पढकर अवश्य मालूम पड़ेगा कि सच्चे आत्मज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का शिष्यत्व मिलना कलिकाल में कितना दुर्लभ और सौभाग्यपूर्ण है और उनको प्राप्त करके उनका त्याग करना कितना दुर्भाग्यपूर्ण और नालायकी का काम है. जो ऐसे सदगुरु के शिष्य होने के लायक नहीं होते वे नालायक लोग ही निंदकों और भ्रष्ट मिडिया के बहकावे में आकर मोक्ष का मार्ग छोड़कर नर्क का पासपोर्ट ले लेते है.

  • एक डॉक्टर जी की डायरी

Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of this blogger.

Author is Former Member of Western Sahitya Academy, is a writer based in North India. He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Author, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.

He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world with unknown name.

 

 

 

 

 

 

 

 

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5 thoughts on “असली-नकली संत (Real – fake saint)

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