Mahapurush

“भगवान के अवतार” आसारामजी बापू

asaram bapu

Asaram Bapuji

हर कारक पुरुष का अवतार लेनेके पीछे एक हेतु होता है. भगवान कृष्ण सिर्फ ग्वाल गोपियों को मक्खन खिलाने और अधरामृत का पान कराने ही नहीं आये थे. असुरों के त्रास से समाज की रक्षा करना भी उनका एक मिशन था जिस के लिए वे वृन्दावन छोड़कर मथुरा गये.

 गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय ४ के ७ वे श्लोक में कहा है, “जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों  के सामने प्रगट होता हूँ.”

इसमें संदेह होता है कि भगवान के अवतार तो कोई १० बताते है कोई २४ बताते है. तो क्या एक चतुर्युगी याने ४३२०००० वर्ष में सिर्फ १० या २४ बार ही धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है? और भगवान ने यह नहीं कहा कि कितनी हानि होनेपर वे प्रकट होते है. तो अन्य समय में धर्म की रक्षा के लिए भगवान क्यों नहीं आते?

इसका समाधान भी गीता से मिलता है. ७वे अध्याय के १७ वे श्लोक में भगवान कहते है, “ये सभी उदार है परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है– ऐसा मेरा मत है. उपरोक्त दोनों श्लोकों को मिलाने पर यह स्पष्ट होता है कि अन्य समय में जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब भगवान ही ज्ञानी महापुरुषों के रूप में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करते है. ब्रह्मज्ञानी गुरु के तथाकथित शिष्य अपने गुरु को अवतारी महापुरुष मानकर गर्व तो अनुभव करते है पर जब वे अवतार के अनुरूप दैवी कार्य करते है, धर्म की रक्षा के लिए कष्ट सहते है तो वे शिष्य दुखी हो जाते है. लेकिन जो सच्चे शिष्य होते है वे गुरु के प्रत्येक कार्य को ईश्वर का कार्य समझते है और उसमे अपना सर्वस्व न्योच्छावर करने को तैयार रहते है. वे गुरु के दैवी कार्य में अपना सहयोग देते है, कष्टों को सहते है और अपना कर्तव्य निभाते है.

किसी अवतार ने किसी युग में असुरों का संहार कर दिया तो वे नष्ट नहीं हुए. उनका पुनर्जन्म होता है और वे लोगों का खून चूसने का कार्य करते ही रहते है. उनका सामर्थ्य बढ़ता जाता है और उनके रूप बदल जाते है. कलियुग में खून चूसने का काम भ्रष्टाचारी शासकों और मल्टीनेशनल कंपनियों के द्वारा ज्यादा होता है. धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि का काम विधर्मी असुर करते है. उन से धर्म की रक्षा करने का दैवी कार्य करनेवाले भगवान के नित्य अवतार सदगुरु होते है. क्या आपको मालूम है कि कलियुग के कितने असुरों से वे धर्म की रक्षा कर रहे है?

सनातन धर्म को नष्ट करनेवाले कम्युनिस्ट, मुस्लिम, ईसाई मिशनरियां और बहु राष्ट्रीय कंपनियों के रूप में इस युग में विद्यमान असुर जितने बलवान है, अजर अमर है, वैसे असुर किसी युग में नहीं थे. सूना है कि रावण का पुत्र इन्द्रजीत मायावी था. आकाश में छुपकर शत्रु पर वार करता था. लेकिन आकाश में सामने तो रहता था. कम्युनिस्ट तो सामने आये बिना,अपने देश में बैठे बैठे हमारी संस्कृति की आधारशिला को तोड़ चुके है. हमारे ही लोगों के द्वारा हमारा स्वाभिमान और मनोबल नष्ट करके हिंदुओं को हिंदुत्व से विहीन बना रहे है जिसका किसी हिंदू को अनुमान भी नहीं हो सकता. उनके हीKGB के agent Yuri Bezmenov ने भारत में रहकर यह काम किया था. जब उसका हृदय परिवर्तन हुआ तब उसने यह रहस्य खोले तब हमें पता चला. उनकी video file “Breaking India” में यह देख सकते हो. राक्षस रावण बड़ा बलवान था. उसके १० सर थे. एक कट जाता तो फिर से नया सिर आ जाता. लेकिन विश्व के कई देशों से भी ज्यादा धनवान कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ है जो अपने मुनाफे के लिए किसी भी देश का शोषण कर सकते है. यदि पैसे से वे किसी राजा या सरकार को खरीद न कर सके तो उन नेताओं की ह्त्या करके अपने अनुकूल नेताओं को सत्ता में बिठाकर, और उस में भी सफलता न मिले तो मिलिटरी उस देशमे उतारकर भी उस राजा को कैद करके अपना काम कर रहे है. किसी कंपनी की ५० देशो में शाखा है तो मानो उस असुर के ५० सिर है. अगर किसी देश से उसको हटा दिया जाय जैसे कि कोकाकोला जैसे हानिकारक उत्पाद बेचने के कारण तो उसका सिर किसी भी पक्ष की सरकार को खरीदकर फिर से ज़िंदा हो जाता है और उनका शोषक व्यापार चालू हो जाता है. किसी देश के उनके मेनेजर को मार डालने से भी उस कंपनी के शोषण से देश को मुक्ति नहीं मिलती क्योंकि दुसरे ही दिन नया मेनेजर आ जाएगा. इनको कोई नष्ट नहीं कर सकता क्योंकि उनकी शाखाएं अनेक देशों में फैली हुई है. उनके सामान को बेचने के लिए संयमी प्रजा को भोगवादी बनाने के लिए वे संस्कृति के मूल्यों को तोड़ने में तनिक भी हिचकिचाते नहीं. इसके दृष्टांत के लिए एक documentary जिसका नाम Zeitgeist addendum है वह देखो. विधर्मी असुरों के नए अवतार ईसाई मिशनरियों के पास कितना धन है यह उनको भी पता नहीं है. सन १९८९ में सिर्फ एक वर्ष में चर्चों ने विश्व में धर्मांतरण के लिए १४५,००००००००० डॉलर खर्च किये. उनके फुल टाइम नौकर ४०,००००० है, १३००० पुस्तकालय है, २२००० मासिक प्रकाशन निकलते है जैसे हमारे आश्रम के सिर्फ २ है, वीडियो प्रचार के लिए.

४००००००००० ट्रेक्ट चलाते है, १८९० रेडियो और टीवी स्टेशन उनके अपने है. २५०००० विदेशी धर्म प्रचारक पादरी है और उनको तालीम देने के लिए ४०० संस्थाएं है. ऐसे ही इस्लाम के प्रचारक भी विपुल मात्रा में धन खर्च करके धर्मांतरण में लगे है. इतने भयानक असुरों के सामने भी गुरुदेव ने अकेले दशकों तक युद्ध किया और  सनातन धर्म की रक्षा की एवं धराशायी मूल्यों की तथा स्वाभिमान की पुनर्स्थापना की यह मुख्य कारण है इस राजनैतिक षड्यंत्र का.

गुरुदेव निर्दोष साबित होकर जल्दी बाहर आये ऐसी आपकी इच्छा है पर क्या गुरुदेव की भी ऐसी इच्छा है? आप अपनी इच्छा को उनकी इच्छा में मिला दो तो उनके शिष्य हो. अन्यथा आप अपनी अच्छा के अनुकूल उनको चलाकर उनके गुरु बनना चाहते हो. वृन्दावन के ग्वाल गोपियों को छोड़कर श्रीकृष्ण जब अपने दैवी कार्य के लिए चले गये तब उन्हों ने उनकी इच्छा में अपनी इच्छा को मिला दिया. कोई फ़रियाद नहीं की कि हमें कृष्ण की जरूरत है इसलिए वे फिर वृन्दावन आ जाए. इसे समर्पण कहते है. कृष्ण के विरह को भी उन्हों ने भक्ति में बदल दिया और साधना में सफल हो गई. कृष्ण के सान्निध्य में प्रेमा भक्ति के द्वारा और बाद में विरह भक्ति के द्वार उन्हों ने अपना जीवन साधनामय बना दिया.

१.      गुरूजी का स्वरुप इतना व्यापक है कि अनंत ब्रह्माण्ड में भी वह समा नहीं सकता. उनके दैवी कार्य के निमित्त उनका शरीर जिसे वे “मैं” नहीं मानते, जेल में गया है. उनको अपना दैवी कार्य जेल में रहकर सम्पन्न करना या बाहर आकर सम्पन्न करना यह उनकी मौज है. हमारा कर्तव्य यही है कि हम उनके दैवी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दे. गुरु हरगोबिन्द और गुरु गोविन्दसिंह के शिष्यों ने अपने गुरु के दैवी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दिया. सारा जीवन मुग़लों से लड़ने में बिता दिया. उन्हों ने अपना जीवन गुरु के आदेश के अनुसार उनके दैवी कार्य के यज्ञ में समर्पित कर दिया. उन गुरुओं ने भी सनातन धर्म की रक्षा के दैवी कार्य के लिए अपना सर्वस्व, शिष्य समुदाय, बेटे, और संपत्ति को न्योच्छावर कर दिया. औरंगजेब को हराने में वे सफल न भी हुए हो लेकिन धर्म की रक्षा के दैवी कार्य में वे पूर्ण सफल रहे. औरंगजेब के बाद भारत से मुग़ल शासन का अंत हो गया. मुग़ल राजाओं ने उनसे अन्याय किया पर उन्हों ने अपने आप से अन्याय नहीं किया. यदि उन्हों ने यह दैवी कार्य नहीं किया होता तो आज भारत में एक भी हिंदू या सीख नहीं होता, सब मुसलमान होते. रामजी के लिए रावण से युद्ध करनेवाले बंदरों ने और अन्य पशुओं ने भी अपने इष्ट के दैवी कार्य में अपना जीवन समर्पित कर दिया. उन्हों ने अपना कर्तव्य निभाया. बुद्ध के शिष्यों ने भी अपने इष्ट के दैवी कार्य में समाज का विरोध सहकर अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करते हुए धर्म का प्रचार देश विदेश में किया. हम भी ऐसे एक महान अवतारी महापुरुष के शिष्य है. हमें भी अपना कर्तव्य निभाते हुए उनके दैवी कार्य को करना है.

 युग परिवर्तन के इस संधि काल में गुरुदेवने एकांत में जाकर सूक्ष्म जगत में दैवी शक्तियों के द्वारा धर्म की रक्षा के लिए भी यह लीला की हो यह संभव है. और उनके परिणाम देखने को मिलते है कि आसुरी विधर्मी शक्तियों से भारत का शासन छीनकर हिंदुत्व वादी लोगों के हाथ में आ गया. अभी आनेवाले ३-४ साल में देवासुर संग्राम होगा जिसमे बड़े प्राकृतिक संकट भूकंप, युद्ध आदि के द्वारा विश्व में महाविनाश होगा जिसमे आसुरी तत्त्वों की पराजय होगी और बाद में दैवी साम्राज्य की स्थापना होगी. हमें अपनी अध्यात्मिक साधना के द्वारा इस में सुरक्षा और सेवा का मौक़ा मिलेगा. इसलिए अपनी साधना और सेवा को हमें बढ़ाना चाहिए |

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