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वैशाख मास की महापुण्यप्रद अंतिम तीन तिथियाँ (1 से 4 मई 2015)

श्रुतदेवजी राजा जनक से कहते हैं : ‘‘राजेन्द्र ! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में जो अंतिम तीन पुण्यमयी तिथियाँ हैं – त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा । ये बडी पवित्र व शुभकारक हैं । इनका नाम ‘पुष्करिणी है, ये सब पापों का क्षय करनेवाली हैं । पूर्वकाल में वैशाख शुक्ल एकादशी को शुभ अमृत प्रकट हुआ । द्वादशी को भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की । त्रयोदशी को उन श्रीहरि ने देवताओं को सुधा-पान कराया । चतुर्दशी को देवविरोधी दैत्यों का संहार किया और पूर्णिमा के दिन समस्त देवताओं को उनका साम्राज्य प्राप्त हो गया । इसलिए देवताओं ने संतुष्ट होकर इन तीन तिथियों को वर दिया : ‘वैशाख की ये तीन शुभ तिथियाँ मनुष्यों के पापों का नाश करनेवाली तथा उन्हें पुत्र-पौत्रादि फल देनेवाली हों ।

जो सम्पूर्ण वैशाख में प्रातः पुण्यस्नान न कर सका हो, वह इन तिथियों में उसे कर लेने पर पूर्ण फल को ही पाता है । वैशाख में लौकिक कामनाओं को नियंत्रित करने पर मनुष्य निश्चय ही भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है ।

जो वैशाख में अंतिम तीन दिन ‘भगवद्गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है और जो ‘श्री विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने में भूलोक व स्वर्गलोक में कौन समर्थ है । जो वैशाख के अंतिम तीन दिनों में ‘भागवत शास्त्र का श्रवण करता है, वह जल से कमल के पत्ते की भाँति कभी पापों से लिप्त नहीं होता । उक्त तीनों दिनों के सम्यक् सेवन से कितने ही मनुष्यों ने देवत्व प्राप्त कर लिया, कितने ही सिद्ध हो गये और कितनों ने ब्रह्मत्व पा लिया । इसलिए वैशाख के अंतिम तीन दिनों में पुण्यस्नान, दान और भगवत्पूजन आदि अवश्य करना चाहिए ।

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