संत वाणी, Saint and People, Satsang

आत्मनिरीक्षण

pujayshri

 

एक शिल्पी ने अत्यंत सुन्दर मूर्ति बनायी। काम पूरा होने पर उसने मूर्ति की ओर खूब सूक्ष्मता से निहारा और फिर रोने लगा। लोग इकट्ठे हो गये। शिल्पकला को जानने वाले लोगों ने पूछाः इतनी बढ़िया मूर्ति बनायी है। उसे देखकर रोते क्यों हो?”

मैंने मूर्ति बनायी। फिर ढूँढा कि इसमें क्या कमी रह गई है, लेकिन मुझे इसमें कोई कमी नहीं दिख रही है। मुझे मेरी कोई कमी नहीं दिखती तो क्या मेरा ज्ञान यहीं रुक जायेगा? मैं इतना क्षुद्र हूँ कि मुझे अपनी कमी दिखती?”

कलाकार की क्या सजगता है !

अपनी कमी न दिखना यह मूर्खता है और कमी दिखानेवाले की करुणा न दिखना यह महा मूर्खता है। आपको कोई दिखाये कि आपमें यह गलती है तो आप उसको धन्यवाद दीजिये, उसको प्रणाम कीजिये। वह आपके लिए सीखने-सुधरने का, विकास करने का द्वार खोल रहा है।

अपनी कमी स्वयं ढूँढ लो और स्वीकार कर लो तो आपको प्रणाम है। धन्यवाद के पात्र हैं आप। अपनी कमी नहीं दिखती है तो उसे ढूँढिये, ढूँढने पर भी नहीं मिलती तो रोइयेः हमारी दृष्टि इतनी सीमित हो गई है कि अपनी कमी नहीं दिखती?’

जैसे दूसरों की कमी जल्दी दिखती है और अपना सदगुण जल्दी दिखता है ऐसे ही अपनी कमी दिखे और दूसरों के सदगुण दिखें। अपनी कमी के प्रति निराश होकर कमजोर न बनो। कमी निकालने के लिए प्रयत्नशील रहो तो उत्थान होगा।

कमी और विशेषता होती है शरीर में, मन में, अंतःकरण में। इनसे अगर सम्बन्ध-विच्छेद करने की कला आ गयी, सम्बन्ध मान लिया है वह सम्बन्ध न माने तो बेड़ा पार हो जाय

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