Darshan

Asaramji Bapu Darshan 22nd May 2015

आसाराम बापू दर्शन २२ मई २०१५

Asaram Bapu Darshan 22nd May 2015

पूज्य आसाराम बापूजी के मंगलमय दर्शन – २२ मई 2015

सुबह का समय और मैं मोर्निंग वाक से वापस घर की और लौट रहा था, रास्ते मे एक्का दुक्का लोग थे और मन में कल को हुए वाकये को लेकर उधेड़बुन चल रही थी…

कल मेरे मित्र से कुछ गहन विषयो पर चर्चा हुयी थी और उसी को लेकर…

मन सोचने पर विवश हो गया था की कौनसा तो ऐसा रीज़न रहा होगा की इस भयंकर कलियुग में जन्हा बॉलीवुड / हॉलीवुड़ मीडिया और इन्टरनेट का बोलबाला है, भौतिकतावाद अपनी चरम सीमा पर है वंहा मेरे जैसे व्यापारी, मेरे दोस्त जिनमे से एक इंडस्ट्रियलिस्ट (फ्लाई एश ब्रिक मशीन manufacturer), एक इंजिनियर, एक 12th तक मेरे साथ पढ़ा जो अभी डॉक्टर है,

और एक नासा का scientist (मेरा दोस्त नहीं)  ये सब परमात्मा से मिलने का दुस्साहस भरा सपना संजोये बैठे थे

गुरुकुल मे पढने वाले 10 वर्ष से भी कम आयु के बच्चे, उनसे पूछो की क्या करना है जीवन मे तो कहते है की आत्मा-साक्षात्कार करना है, इस नन्ही सी उम्र में वे जीवनदाता से मुलाकात का निश्चय कर चुके है

सतयुग के समय बड़े बड़े ऋषि मुनि जो ज्ञान पाने की आकांक्षा रखते थे और राजे महाराजे जिस ज्ञान को पाने के लिए घर बार छोड़कर जंगलो मे भटकते फिरते थे वही शुध्ध परमात्मा का ज्ञान हम लोगो को घर बैठे मिल रहा है

मन परमात्मा की असीम अनुकम्पा का स्मरण करके रोमांचित हो आया और मुझे लगा शायद हमारे करोडो जन्मो के पुण्यो से भी जो दिशा और ज्ञान मिल पाना असंभव है वह सदगुरुकृपा से इतना सुलभ हो गया…

परमात्मा इतना नजदीक और सुलभ और प्यारा शायद कभी ना लग पता अगर गुरुदीक्षा न मिली होती

लोग हैरान होते है की क्यों आज भी लोग आसारामजी बापूजी को भगवान् की तरह पूजते है और हम साधक हैरान होते है की क्या लोगो मे इतनी भी विचारशक्ति नहीं बची की एक पढ़े लिखे नौजवान को डाइवर्ट कर देना, इस कदर कि अपने खाली समय मे बनिस्पत सिनेमाघरो की खाक छानने मे वे लगे है मन को जीतकर महान बनने की और… क्या ये सब संभव है इस घोर कलियुग मे  है… एक युवा को दिशा दिखा पाना… बड़े बड़े विचारको के हाथ की बात नहीं है… माहोल के उलट उसे सन्मार्ग पर चलने लिए प्रेरित कर देना हंसी मजाक नहीं है साहिब…

भगवान और भगवान को पाए संतो के अलावा ये कार्य कोई दूसरा कर सके ये असंभव है… और जाने विचारे बिना मीडिया की बातो मे आकर ऐसे संतो के बारे मे अपनी धारणाशक्ति बना लेना अपनी विवेक शक्ति का दुरुपयोग है…

जिन्होंने ऐसे सदगुरुदेव की कृपा पचा ली वे मौन हो गए और जो पचाने की राह में है वे लगे है दूसरो तक अपनी बात पहुँचाने में… आखिर कौन नहीं चाहता सदा के लिए निर्भय होना, निर्दुख होना… और संतो के अलावा सदा के लिए निर्दु:ख और निर्भय कर ही कौन सकता है इस कलिकाल में….

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