संत वाणी, Saint and People

सुख-दुःख का सदुपयोग

pujya bapuji.

 

जीवन में उतार चढ़ाव आने पर, खट्टे-मीठे प्रसंग आने पर लोग दुःखी हो जाते हैं। अपने को पापी समझकर वे दुःखी हो रहे हैं। यह बड़ी गलती है। जीवन के विकास के लिए दुःख नितान्त जरूरी है। जीवन के उत्थान के लिए दुःख अति आवश्यक है।

सुख में विवेक सोता है और दुःख में विवेक जागता है। लेकिन दुःख में घबड़ाने से आदमी दुर्बल हो जाता है। दुःख का का सदुपयोग करने से आदमी बलवान् हो जाता है।

मनुष्य जब दुःख का सदुपयोग करना सीख लेता है तो दुःख का कोई मूल्य नहीं रहता। जब सुख का सदुपयोग करने लगता है तब सुख का कोई मूल्य नहीं रहता। सदुपयोग करने से सुख-दुःख का प्रभाव क्षीण होने लगता है और सदुपयोग करने वाला उनसे बड़ा हो जाता है। उपयोग करने वाले का मूल्य बढ़ जाता है और उपयोग में आने वाली जड़ चीज का मूल्य कम हो जाता है।

दुःख का सदुपयोग करने से दुःख छोटा हो जायेगा फिर वह आपको उतना दुःख नहीं देगा। सुख का सदुपयोग करने से सुख छोटा हो जायेगा फिर वह आपको बाँध नहीं सकेगा। नासमझी से दुःख आयेगा तो वह आपको कमजोर बना देगा, सुख आयेगा तो बन्धन में डालेगा। एक डराकर कमजोर करता है दूसरा बाँधकर कमजोर करता है। दोनों से अहित ही होता है। आपका तन, आपका मन, आपका हृदय – इन सुख-दुःख रूपी राक्षसों के ताबे में चला जाता है। ये सुख-दुःख असुर हैं। असुर माने दैत्य। सुर माने देवता।

हम लोग पुराणों की कथाएँ सुनते हैं। ध्रुव तप कर रहा था। असुर लोग डराने के लिए आये लेकिन ध्रुव डरा नहीं। सुर लोग विमान लेकर प्रलोभन देने के लिए आये लेकिन ध्रुव फिसला नहीं। वह विजेता हो गया। ये कहानियाँ हम सुनते हैं, सुना भी देते हैं लेकिन समझते नहीं कि ध्रुव जैसा नन्हा-मुन्ना दुःख से घबड़ाया नहीं और सुख में फिसला नहीं। उसने दोनों का सदुपयोग कर लिया और अमर हो गया। सुख-दुःख का सदुपयोग कर लिया तो ईश्वर उसके सम्मुख प्रकट हो गये। सारी परिस्थितियाँ उसके चरण तले आ गई।

हम क्या करते हैं? जरा-सा दुःख पड़ता है तो दुःख देने वाले को लांछन लगाते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं अथवा अपने को पापी समझकर अपने को ही कोसते हैं। कभी आत्महत्या करने की भी सोचते हैं। कुछ पवित्र होंगे तो किसी संत-महात्मा के पास जाते हैं- ‘बाबा ! अब बहुत हो गया। हमसे दुःख सहा नहीं जाता… अब सहा नहीं जाता। हम पर रहम करो। हमारा दुःख दूर कर दो। अब हम रह नहीं सकते… यह दुःख सह नहीं सकते।’

‘…दुःख सहन नहीं होता… सहन नहीं होता…’ बोलते-बोलते अभी तक सहते ही रहे हैं न? संत-महात्मा कृपालु होते हैं। दुःख हटाने की अपेक्षा वे आपकी योग्यता बढ़ा देते हैं। दुःख हटाने की अपेक्षा दुःख का सदुपयोग करने की कला सिखा देना यह ऊँची बात है।

बच्चा चलते-चलते गिर पड़ा। उसको चोट लगी। आपने वात्सल्य से पुचकारकर उसको उठा लिया। आपकी सहानुभूति है। आपने उसको दुःख से बचा लिया लेकिन उसको कमजोर कर दिया। आपने उसे उठा लिया न? उसको स्वयं उठने नहीं दिया। उसको गिरते देखकर बोलतेः ‘अरे कुछ नहीं हुआ। खड़ा हो जा… शाबाश…। देख वह क्या है?’ ऐसी युक्ति द्वारा वह चोट भूल जाता और अपने आप खड़ा हो जाता तो तुम्हारी गैरहाजिरी में भी वह खड़ा हो सकता था अतः उसकी शक्ति बढ़ा दो ताकि गिरे नहीं।

योगवाशिष्ठ में आता है कि ‘चिन्तामणि’ के आगे जो चिन्तन करो वह चीज मिलती है लेकिन सत्पुरुष के आगे जो चीज माँगोगे वही चीज वे नहीं देंगे, मगर जिसमें तुम्हारा हित होगा वही देंगे। कामधेनु के आगे जो कामना करोगे वह पदार्थ देगी लेकिन उससे आपका भविष्य सुधरता है या बिगड़ता है, आपकी आसक्ति बढ़ती है या घटती है यह कामधेनु की जवाबदारी नहीं। उसकी यह जिम्मेदारी नहीं है लेकिन सदगुरु आपके हित-अहित के बारे में भली प्रकार निगरानी रखते हैं।

किसी देवता को आप रिझाओ, विधि-विधान से पूजन करो, सामग्री अर्पण करो, भोग धरो और किसी वस्तु के लिए याचना करो तो वे देवता प्रसन्न होकर आपकी माँगी हुई चीज दे देंगे लेकिन वह चीज पाकर आप आत्माविमुख हो रहे हैं कि आत्मविमुख होकर भोग में फँस रहे हैं यह उनको सोचने की जरूरत नहीं है। आपकी माँगी हुई चीज आपको दे दी, बस।

नादान बालक दस रूपये की एक नोट लेकर दुकान पर पहुँचे, दुकान की विभिन्न चीजें देखकर दुकानदार से रंग-बिरंगे चित्रोंवाले बड़े-बड़े पटाखे, एटम बम, मिर्च का लाल लाल पावडर माँगे, सफेद सफेद सोडाखार माँगे तो दुकानदार उसे ये चीजें देगा लेकिन वह दुकानदार यदि उस बालक का पिता है तो वह पैसे भी ले लेगा और वस्तुएँ भी नहीं देगा। उसको पूरा अधिकार है और वह बालक का पूरा हितैषी है।

ऐसे ही जो सत्पुरुष हैं वे आपके सत्कार, आपकी पूजा स्वीकार कर लेंगे लेकिन आप यदि पटाखे जैसी वस्तुएँ माँगेगे तो नहीं देंगे। आपके कल्याण के लिए जो उचित होगा वही देंगे। संभव है आपके जीवन के उत्थान के लिये वे आपको कटु या अपमानजनक वचन  कह दें, आपको डाँट भी दें।

दुःख के सदुपयोग से जीवन की शक्ति का विकास होता है और सुख के सदुपयोग से जीवन में सजगता आती है, जीवनतत्त्व की जागृति होती है। दुःख से घबड़ाने से कमजोरी बढ़ती है और सुख में फँस जाने से विलासिता बढ़ती है। सुख बाँधकर कमजोर करता है और दुःख डराकर कमजोर करता है। ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसके पास सुख और दुःख न आते हों। धेनकासुर, बकासुर, अघासुर, ईसा-मूसा की कथाएँ तो बहुत सुनी होंगी। अब यह आपके जीवन की कथा है और इसे जानना अत्यंत जरूरी है।

जीवन में आने वाले सुख-दुःख के प्रसंगों में क्या करना है? सुख-दुःख का उपयोग। सुख-दुःख का उपयोग करने वाला सुख-दुःख का स्वामी बन जाता है। स्वामी को यदि अपना स्वामीपना याद है तो सेवक उसकी आज्ञा में रहते हैं। चाहो जब सेवक को भीतर बुला लो, चाहो जब ऑफिस से बाहर खड़ा कर दो। मर्जी तुम्हारी। उसका उपयोग करने की कला आ गई तो आप स्वामी हो गये।

जैसे चपरासी का उपयोग करते हैं वैसे ही यदि परिस्थितियों का उपयोग करने की कला आ गई तो आप हो गये जीवन्मुक्त….. जीते-जी मुक्त। बाँधते हैं सुख-दुःख। और कौन बाँधता है? ऐसा नहीं कि साड़ी पहन कर कोई माया वहाँ बैठी है, कोई अप्सरा बैठी है वह आपको बाँधेगी। नहीं, सुख-दुःख ही आपको बाँधते हैं।

‘अप्सरा’ का अर्थ क्या है? ‘अप’ माने पानी और ‘सरा’ माने सरकनेवाला। जैसे पानी नीचे की ओर बहता है ऐसे जीवन सुख-दुःख में नीचे की ओर बहता है। सदगुरुओं का ज्ञान तुम्हें ऊपर उठाता है। परिस्थितियाँ हैं सरिता का प्रवाह जो तुम्हें नीचे की ओर घसीटती हैं, सदगुरु हैं ‘पम्पिंग स्टेशन’ जो तुम्हें हरदम ऊपर उठाते रहते हैं।

हम सुख-दुःखों से परास्त क्यों हो जाते हैं? स्वतंत्र ढंग से जीने की कला हमारे पास नहीं है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास अन्न-वस्त्र नहीं है, रूपये-पैसे नहीं हैं, मकान नहीं है इसलिए दुःखी हैं। जिन महापुरुषों को खाने को रोटी नहीं, पहनने को कपड़े नहीं, रहने को घर नहीं वे भी सुखी रह सके। देखो जड़भरतजी का जीवन ! देखो शुकदेवी का जीवन ! आत्मानंद में मस्त ! अब भी, इस समय भी ऐसे महात्मा… ऐसे परम सुख के सम्राट हैं इस वसुन्धरा पर। उनके पास सुख-दुःख का उपयोग करने की, सुख-दुःख के प्रसंगो को नचाने की कला है, समझ है। चीज-वस्तुओं का बाहुल्य होते हुए भी यह समझ अगर हमारे पास नहीं है तो हम सुख-दुःख की परिस्थितियों में उलझ जाते हैं। अगर हमारे पास बढ़िया समझ है तोः

हमें हिला सके ये जमाने में दम नहीं।

हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं।।

किसी पंथ में रहे, सम्प्रदाय में रहे, वाड़े में रहे लेकिन जीवन की समस्या का हल नहीं हुआ, उलझन से सुलझन की यात्रा होनी चाहिए वह नहीं हुई तो हम कमजोर ही रहे, दुःखी ही रहे। सुख-दुःख के स्वामी न बन पाये।

दुःखी होने का कारण अगर पाप ही होता, पापी आदमी को ही अगर दुःख मिलता तो भगवान श्रीकृष्ण और भगवान राम के जीवन में दुःख नहीं आने चाहिये लेकिन उनके आगे दुःख की घटनाओं की, विकट परिस्थितियों की कमी नहीं। फिर भी वे सदा सम रहे। राज्यतिलक की शहनाइयाँ बजीं और बनवास में जाना पड़ा।

श्रीकृष्ण ने भी अपने जीवन में ऐसा कौन सा दुःख है जो नहीं देखा ! दुष्टों के कारागृह में जन्म हुआ, जन्म के तुरन्त बाद उस सुकोमल अवस्था में यमुनाजी की भयंकर बाढ़ वह उफनती लहरों के बीच टोकरी में छिपाकर पराये घर में ले जाकर रख दिया गया। राजघराने के लड़के होने के बावजूद गौएँ चराकर रहना पड़ा, चोरी करके मक्खन-मिश्री खाना पड़ा। कभी पूतना राक्षसी पयःपान में छुपा कर जहर पिलाने आ गई तो कभी कोई दैत्य छकड़े से दबाने या आँधी में उड़ाने चला आया। कभी बछड़े में से राक्षस निकल आया तो कभी विशाल गोवर्धन पर्वत को हाथ पर उठाकर खड़े रहना पड़ा। अपने सगे मामा कंस के कई षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा और अंत में उसे अपने हाथों से ही मारना पड़ा। उनके माँ-बाप को भी जेल के दारूण सुख सहने पड़े। जरासन्ध से युद्ध के दौरान जब श्रीकृष्ण द्वारका की ओर भागे तो पाँव में न तो पादुका थी और न ही सिर पर पगड़ी थी। केवल पीताम्बर ओढ़े नंगे पाँव भाग-भाग कर पहाड़ों में छिपते-छिपाते, सुरक्षित निवास के लिए कई स्थानों को ढूँढते-ढूँढते अन्त में समुद्र के बीच में जाकर बस्ती बसाना पड़ा। उनके पारिवारिक जीवन में भी कई विघ्न-बाधाएँ आती रहीं। बड़े भाई बलरामजी को मणि को लेकर श्रीकृष्ण पर अविश्वास हो गया था। पत्नियों में भी आये दिन ईर्ष्या-जलन व झगड़े-टंटे चलते ही रहते थे। बाल-बच्चों एवं पौत्रों में से कोई भी आज्ञाकारी नहीं निकला। एक ओर, जहाँ श्री कृष्ण साधु-संतों का इतना आदर-सत्कार किया करते थे वहीं पर उनके पुत्र-पौत्र संत-पुरुषों का मखौल उड़ाया करते थे। और भी अनेकाअनेक विकट परिस्थितियाँ उनके कदम-कदम पर आती रहीं लेकिन श्रीकृष्ण हरदम मुस्कराते रहे और प्रतिकूलताओं का सदुपयोग करने की कला अपने भक्तों को सिखलाते गये।

मुस्कुराकर गम का जहर जिनको पीना आ गया।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।

सुख और दुःख हमारे जीवन के विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। चलने के लिए दायाँ और बायाँ पैर जरूरी है, काम करने के लिए दायाँ और बायाँ हाथ जरूरी है, चबाने के लिए ऊपर का और नीचे का जबड़ा जरूरी है वैसे ही जीवन की उड़ान के लिए सुख व दुःखरूपी दो पंख जरूरी हैं। सुख-दुःख का उपयोग हम नहीं कर पाते, सुख-दुःख से प्रभावित हो जाते हैं तो जीवन पर आत्मविमुख होकर स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर से बँधे ही रह जाते हैं। अपने मुक्त स्वभाव का पता नहीं चलता।

इसलिए रोटी की जितनी जरूरत है, कपड़ों की जितनी जरूरत है, मकान की जितनी जरूरत है उससे हजार गुनी ज्यादा जरूरत है सच्ची समझ की। सच्ची समझ के बिना हमारा जीवन सुख का और दुःखों का शिकार हुआ जा रहा है। लोग बोलते हैं-

‘बापू ! बेटा नहीं है इसलिए दुःख हो रहा है। रोना आता है….!’

किसी का बेटा नहीं है तो दुःख हो रहा है, किसी को पति नहीं है, पत्नी नहीं है, मकान नहीं है तो दुःख हो रहा है लेकिन जिनके आगे हजारों बेटों की, हजारों पतियों की, हजारों पत्नियों की, हजारों मकानों की, हजारों दुकानों की कोई कीमत नहीं है ऐसे परमात्मा हमारे साथ हैं, भीतर हैं फिर भी आज तक उनकी पहचान नहीं हुई इस बात का दुःख नहीं होता। आनंदस्वरूप अन्तर्यामी परमात्मा का अनुभव नहीं होता इसके लिए रोना नहीं आता।

जो आदमी जितना सुख चाहता है, जितनी तीव्रता से चाहता है उतना दुःखी होता है। दुःख का सदुपयोग करने की कला नहीं आयी तो कमजोर होता है। फिर देवी देवताओं को मनाता है, मंदिरों में दौड़ता है, मस्जिदों में दौड़ता है, गिरजाघरों में गिड़गिड़ाता है। मंदिर मस्जिद में जाने का फल यही है कि कोई आपके दिल का मन्दिर खोल दे, आपके हृदय का द्वार खटखटा दे, आपके भीतर छुपी हुई अथाह शक्ति का दीदार आपको करा दे। फिर बारहों मेघ गर्जें, प्रलयकाल के सूर्य तपें, आपका बाल बाँका नहीं होगा। आप ऐसी चीज हैं आपको पता नहीं। पूरी सृष्टि का प्रलय हो जाय तब भी आपका कुछ नहीं बिगड़ता। सारी दुनिया के लोग आपके विरोध में खड़े हो जाएँ, सारे देवी देवता कोपायमान हो जायें फिर भी आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता ऐसी महान् विभूति आप हैं, लेकिन…? आपको पता नहीं।

वेदान्त की बात आपके अनुभव में आने से सारे दुःख ओस की बूँद की तरह लुप्त हो जायेंगे। मैं नितान्त सत्य कह रहा हूँ। यह बात समझने से ही परम कल्याण होगा।

अपनी समझ जब तक इन्सान को आती नहीं।

दिल की परेशानी तब तक जाती नहीं।।

……तो कृपानाथ ! अपने ऊपर कृपा करो। सुख का भी सदुपयोग और दुःख का भी सदुपयोग। सुख-दुःख आपके दास हो जायें। आप उनके स्वामी हो जाओ। फिर, आप कौन हो यह जानने की जिज्ञासा जागृत होगी। जीवन की जिज्ञासा में जीवन के कल्याण के बीज निहित हैं। कल्याण भी ऐसा किः

रिद्धिसिद्धि जाँ के आगे हाथ जोड़ खड़ी है।

सुन्दर कहत ताँ के सब ही गुलाम हैं।।

मनुष्य के पास क्या नहीं है? उसके पास क्या क्या है यह प्रश्न नहीं है। अपितु उसके पास क्या नहीं है यह प्रश्न है। आपको लगेगा कि अपने पास बँगला नहीं है, गाड़ी नहीं है, फ्रिज नहीं है। अरे खाक ! अभी आपने अपना आपा देखा ही कहा हैं?अपने मन से जरा ऊपर उठो, अपने आत्म-सिंहासन पर जा बैठो तो पता चले असलियत का।

….और जिनके पास बँगला है, गाड़ी है, फ्रिज है उनको पूछोः ‘क्या हाल है? सुखी हो?’ रोज के चालीस-पचास हजार रूपये कमाने वाले लोगों को मैं जानता हूँ और रोज के तीस रूपये लाने वाले लोगों को भी मैं जानता हूँ। दोनों रोटी खाते हैं। दोनों को मरते देखा है और दोनों की राख एक जैसी। फर्क क्या पड़ा?

मेरा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि तीस रूपये कमाने वाला अच्छा है और पचास हजार रूपये कमाने वाला बुरा है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि दोनों ने अपने आपसे अन्याय कर लिया। एक दुःख में फँसा तो दूसरा सुख में बँधा। दोनों बन्धन बनाकर चले गये, बन्धन काटे नहीं। जीवन की जिज्ञासा खुली नहीं, अपनी महानता के द्वार पर पहुँचे नहीं। दिव्यता का ताला खुला नहीं।

अज्ञानी के रूप में जन्म लेना कोई पाप नहीं, मूर्ख के रूप में पैदा होना कोई पाप नहीं लेकिन मूर्ख बने रहकर सुख-दुःख की थप्पड़े खाना और जीर्ण-शीर्ण होकर मर जाना महा पाप है।

जो चीज मिलती है उसका सदुपयोग नहीं होता तो दुबारा वह चीज नहीं मिलती। मानव देह मिली, बुद्धि मिली और उसका सदुपयोग नहीं किया, सुख-दुःख की लपटों में स्वाहा हो गये तो दुबारा मानव देह नहीं मिलेगी। इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं-

जौ न तरै भवसागर नर समाज अस पाई।

सो कृत निन्दक मन्दमति आतमहन अधोगति जाई।

मानव तन पाकर जो भवसागर नहीं तरता वह क्या कुत्ता होकर तरेगा? बिल्ला होकर तरेगा? गधा होकर तरेगा कि घोड़ा होकर तरेगा? इन योनियों में तो डण्डे ही खाने हैं।

घोड़ा बन गये। दिन भर गाड़ी खींची। रात को गाड़ीवान् ने पौवा (दारू) पी लिया, नशा कर लिया। चारा-पानी देना भूल गया। नशे में चूर होकर पड़ा रहा। आप सारी रात तड़पते रहे बिना चारा-पानी के। कई रातें ऐसी गुजरती हैं। तब किसको शिकायत करेंगे? कौन हमें सुनेगा? किसको डाँटेगे? मूक होकर सहन करना ही पड़ेगा। रात को भूखामरी हुई, जन्तु काटे, दिन को कौओं की चोंचें खाओ, गाड़ीवान् के चाबुक खाओ और गाड़ी खींचो। ऐसी एक नहीं 84 लाख योनियाँ हैं। कभी पौधे बन गये। माली ने पानी नहीं दिया तो सूख रहे हैं। बरसाती पौधे बने। वर्षा ऋतु गई तो मुरझा रहे हैं तब क्या करेंगे?

इसलिए सावधान हो जाओ। अपने ऊपर कृपा करो। भोजन मिले न मिले, पानी मिले न मिले, कपड़े मिले न मिले लेकिन जीवन में अच्छी समझ अवश्य मिलनी चाहिये। अच्छी समझ का उपयोग करने का उत्साह अवश्य होना चाहिए। अगर वह उत्साह आपमें नहीं होगा तो भगवान आपका कितना भी मंगल चाहें, सत्पुरुष आपका कितना भी कल्याण चाहें लेकिन आपके उत्साह के बिना वे लाचार हो जाते हैं आपको ऊपर उठाने में। बरसात कितनी भी हो, सूर्य के किरण कितने भी पड़ें लेकिन खेती करने की तड़प आप में नहीं है तो क्या होगा? धूप व पानी व्यर्थ चले जायेंगे। ऐसे ही शास्त्रकृपा करके अपनी जीवन की खेती में साधना की बुआई नहीं करोगे तो क्या होगा?

मनुष्य सुख-दुःख के थप्पड़े खाता हुआ जी रहा है लेकिन जीवन पर विचार नहीं करता है कि जीता क्यों है?

कमाते क्यों हो? खाने के लिए। खाते क्यों हो? जीने के लिए। जीते क्यों हो? कोई पता नहीं। बस, जी रहे हैं। कभी सोचा नहीं कि क्यों जी रहे हैं।

जीते हैं मुक्त होने के लिए। बन्धन कोई नहीं चाहता, पराधीनता कोई नहीं चाहता, दुःख कोई नहीं चाहता, मौत कोई नहीं चाहता। मुक्ति में बन्धन नहीं, मुक्ति में पराधीनता नहीं, मुक्ति में दुःख नहीं, मुक्ति में मौत नहीं। हमारे जीवन की गहरी माँग है पूर्ण सुख, पूर्ण शांति, पूर्ण स्वतन्त्रता। कोई अपूर्ण वस्तु पूर्ण सुख, पूर्ण शांति, पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं दे सकती। संसार की सभी चीजें सीमित हैं। वे आपको असीम सुख, असीम शांति, असीम स्वतंत्रता नहीं दे सकतीं। असीम सुख-शांति-स्वतंत्रता तो असीम आत्मा में निहित है। मनुष्य जितना आत्माभिमुख होता है उतना ये चीजें पाता है और जितना बाह्य अवलम्बनों के आधीन रहता है उतना निराश होता है और थप्पड़ें खाता है।

ग्यारह साल का बालक शरणानन्द भाई-भाभी के साथ रहता था। बालक की सरलता, स्वाभाविकता व कुशलता पर भाई-भाभी दोनों प्रसन्न रहते थे। लाड़-प्यार से लालन-पालन करते थे।

एक दिन इस मेधावी होनहार बालक ने कहाः “पूर्ण प्रेम, पूर्ण सुख व पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए मैं संन्यास लूँगा।”

दुलारे लाल के ये वचन सुनकर भाई-भाभी चौंके। दोनों ने एक साथ पूछाः “फिर हमारे प्यार का होगा? तू हमें इतना आनंद देता है, हम इतना प्यार-दुलार करते हैं, हमारा क्या होगा?”

“हम जब थकेंगे तो एक दूसरे को छोड़कर सो जायेंगे, नींद में भूल जायेंगे इस प्यार को। यह स्नेह का सुख संयोगजन्य है, उपजा हुआ है, परिस्थिति पर निर्भर है। वह छूट जायेगा। जो छूट जानेवाला है उसे ईश्वर के लिए छोड़ दिया तो क्या हुआ?”

यह प्रज्ञावान् बालक आगे जाकर महान् विभूति बना। जे. कृष्णमूर्ति जैसे तत्त्वचिंतक उनसे मिलकर बड़े प्रभावित हुए।

पूर्ण सुख, पूर्ण शांति, पूर्ण प्रेम, पूर्ण ज्ञान अपूर्ण चीजों को ले लेकर जीवन खत्म कर देने पर भी नहीं मिलेगा। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं का जब विवेक जगता, इस बात का पता चल जाता तब वे पूर्ण सुख-शांति पाने के लिए अपना राजपाट छोड़कर जिन्होंने पूर्ण सुख को जाना है, पूर्ण शांति पायी है, पूर्ण ज्ञान को प्राप्त किया है ऐसे महापुरुषों के पास अरण्यों में पहुँच जाते। जिनका विवेक नहीं जगता वे लोग संसार की सामग्रियों से सुखी होने का परिश्रम करते-करते बूढ़े हो जाते हैं और फिर अंत में पछताते हैं कि, ‘हाय ! संसार में कोई सार नहीं।’

संसार में परिश्रम अधिक है और सुख अल्प है। वह भी सुख नहीं, सुख का आभास मात्र। The Young persons say, “Life is full of joys’’ but the  wise persons say, “Life is full of sorrows.”

जवान बोलते हैं कि जिन्दगी मजा लेने के लिए है और बुजुर्ग लोग बोलते हैं कि जिन्दगी दुःखों का घर है। वास्तव में वह न मजा लेने के लिए है और न दुःखों का घर है। जिन्दगी है जीवनदाता को पहचानने के लिये, जिन्दगी के रहस्य को जानने के लिये। जिन्दगी का रहस्य अछूता रह जाता है और जिन्दगी पूरी हो जाती है। शरीर के खानपान में और व्यवहार में ही आयु बीत जाती है। आखिर में इस शरीर को जला देना है। इसको अच्छा  खिलाया-पिलाया, चर्बी अधिक बढ़ाई तो मुट्ठी भर राख अधिक होगी और क्या? अधिक सुविधा में रहने की जितनी आदत बनेगी, असुविधा उतनी अधिक खटकेगी। अहं का पोषण करने की जितनी आदत बनेगी, अपमान उतना अधिक चुभेगा। सामग्रियों के बीच रहने की जितनी आदत बनेगी, सामग्रियों की अनुपस्थिति में उतनी अधिक बेचैनी होगी।

आत्मा का सुख ऐसा है कि सारी सामग्रियाँ अपने आप खिंचकर आ जाती है फिर भी उनमें आसक्ति नहीं होती। मौज आयी तो उनका उपयोग कर लिया लेकिन उनमें ममता नहीं होती।

जिनका जीवन पूर्ण है उनके पास सामग्री ज्यादा नहीं होती तब भी वे पूर्ण सुखी होते हैं। पूर्ण जीवन की ओर जिनकी यात्रा नहीं है उनके पास बहुत कुछ होते हुए भी जीवन में बेचैनी, अशांति, अतृप्ति रहती है। धन बढ़ने से अगर सुख होता तो विश्व के जाने माने धनवान् मि. फोर्ड को नींद के लिये इन्जेक्शन नहीं लगवाने पड़ते। सत्ता बढ़ने से अगर  सुख होता तो बड़े-बड़े सत्ताधीश रात्रि को बेचैन नहीं होते। सुख तो सच्ची समझ आने से होता है। जीवन की धारा कहाँ से आती है यह ज्ञान हो जाय तो सुखी होना घर की खेती बन जाय।

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