संत वाणी, Saint and People

आस्तिक और नास्तिक

bapuji

 

आस्तिक और नास्तिक में फर्क यह है कि आस्तिक एक ईश्वर की शरण लेता है और अपनी आवश्यकता पूरी करता है जबकि नास्तिक अनेक पदार्थों की आवश्यकता महसूस करता है। अपनी इच्छाएँ पूरी करते-करते कई जन्म बीत जाते हैं, सदियाँ समाप्त हो जाती हैं।

आवश्यकता तो आवश्यक तत्त्व की है और इच्छाएँ मन की दासता से पैदा होती हैं। आस्तिक एक परमात्मा की शरण लेता है और नास्तिक हजार-हजार वस्तुओं की शरण लेता है।

निःसहाय की सहाय है भगवद् शरण, भोगी का योग है भगवद् शरण, दुर्बल का बल है भगवद् शरण, निराधार का आधार है भगवदशरण। द्वन्द्वी का द्वन्द्वातीत जीवन है भगवद् शरण ! चिंतित की चिंता का निवारण है भगवद् शरण। बुद्धिशून्य की बुद्धि का प्रकाश है भगवद् शरण। बुद्धिमानों की बुद्धि का अहंकार उतारने वाला मंत्र है भगवद् शरण।

ज्ञानी के ज्ञान में निष्ठा उस भगवत्तत्त्व में होती है। उस तत्त्व में जब निष्ठा होती है तब योगी का योग फलता है, तपस्वी का तप फलता है, जपी का जप सार्थक होता है।

जीव जितना-जितना ईमानदारी से, सच्चाई से उस भगवत् शरण को ग्रहण करता है, उतना-उतना वह सफल होता जाता है। भगवद् शरण जितना-जितना छूटता जाता है, उतना-उतना उसके चित्त में बोझा बढ़ता जाता है।

असंख्य चित्त जिस चैतन्य से फुरफुरा रहे हैं, उस चैतन्य वपु परमात्मा के शरणागत कोई जीव किसी भी भाव से शरणागत होता है तो वह जीव आत्मप्रेरणा से, आत्मप्रकाश से और आत्मसहाय से कटीले मार्गों से, बीहड़ जंगलों से सफल यात्रा करके अपना जीवन धन्य कर लेता है। जिसके जीवन में भगवदशरण नहीं है, वह अपने बाहुबल से, अपने तपोबल से, अपने चित्तबल से, अपनी चापलूसी से या अपने और कोई तुच्छ बलों से सुखी रहने का यत्न तो करता है बेचारा प्राणी लेकिन उसे सुख चार कदम दूर ही भासता है। इच्छापूर्ति का क्षणिक हर्ष उसे आ जाता है, फिर इच्छाएँ भी अधिकाधिक भड़कती जाती हैं। इच्छा पूर्ति करते करते जीवन पूरे होते चले जाते हैं उस प्राणी के।

आस्तिक की आवश्यकताएँ होती हैं और नास्तिक की इच्छाएँ होती हैं। आवश्यकता एक होती है नित्य जीवन की, नित्य तृप्ति की, नित्य ज्ञान की, नित्य तत्त्व की। यह मनुष्य की आवश्यकता है और इच्छा मन का विलासहै।

हम लोग मन के विलास को जितना पोसते रहते हैं, उतना हम भीतर से खोखले हो जाते है। अपना व्यक्तिगत खर्च बढ़ाने से अहं की पुष्टि होती है। व्यक्तिगत खर्च घटाने से आत्मबल की पुष्टि होती है। अपनी व्यक्तिगत सेवा अपने आप करने से आत्मिक शक्ति का विकास होता है। दूसरों से व्यक्तिगत सेवा लेने से अहंगत सुख की भ्रांती होती है

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