Satsang

आत्मश्रद्धा

 

 

 

shri bapuji

 

मानवमात्र की सफलता का मूल उसकी आत्मश्रद्धा में निहित है। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है। तन-बल, मन-बल, बुद्धि-बल एवं आत्मबल ऐसे कई प्रकार के बल हैं, उनमें आत्मबल सर्वश्रेष्ठ है। आत्मबल  में अचल श्रद्धा यह विजय प्राप्त करने की सर्वोत्तम कुंजी है। जहाँ आत्मबल में श्रद्धा नहीं है वहीं असफलता, निराशा, निर्धनता, रोग आदि सब प्रकार के दुःख देखने को मिलते हैं। इससे विपरीत जहाँ आत्म बल में अचल श्रद्धा है वहाँ सफलता, समृद्धि, सुख, शांति, सिद्धि आदि अनेक प्रकार के सामर्थ्य देखने को मिलते हैं।

जैसे-जैसे मनुष्य अपने सामर्थ्य में अधिकाधिक विश्वास करता है, वैसे-वैसे वह व्यवहार एवं परमार्थ दोनों में अधिकाधिक विजय हासिल करता है। अमुक कार्य करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा विश्वास और श्रद्धा-यह कार्यसिद्धि का मूलभूत रहस्य है।

मनुष्य अपनी उन्नति शीघ्र नहीं कर पाता इसका मुख्य कारण यही है कि उसे अपने सामर्थ्य पर संदेह होता है। वह ‘अमुक कार्य मेरे से न हो सकेगा’ ऐसा सोच लेता है। जिसका परिणाम यह आता है कि वह उस कार्य को कभी करने का प्रयत्न भी नहीं करता। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है।

आत्मबल में अविश्वास प्रयत्न की सब शक्तियों को क्षीण कर देता है। प्रयत्न के बिना कोई भी फल प्रगट नहीं होता। अतः प्रयत्न को उत्पन्न करने वाली आत्मश्रद्धा का जिसमें अभाव है उसका जीवन निष्क्रिय, निरुत्साही एवं निराशाजनक हो जाता है। जहाँ-जहाँ कोई छोटा-बड़ा प्रयत्न होता है वहाँ-वहाँ उसके मूल में आत्मश्रद्धा ही स्थित होती है और अंतःकरण में जब तक आत्मश्रद्धा स्थित होती है तब तक प्रयत्नों का प्रवाह अखंड रूप से बहता रहता है। आत्मश्रद्धा असाधारण होती है तो प्रयत्न का प्रवाह किसी भी विघ्न से न रुके ऐसा असाधारण एवं अद्वितिय होता है।

‘मैं अमुक कार्य कर पाऊँगा’ – ऐसी साधारण श्रद्धा भी यदि अंतःकरण में होती है तभी प्रयत्न का आरंभ होता है एवं प्रयत्न में मनुष्य में निहित गुप्त सामर्थ्य को प्रगट करने वाला अमोघ बल समाविष्ट होता है। दियासिलाई में अग्नि है किन्तु जब तक उसे पिसा नहीं जाता तब तक करोड़ वर्ष भी वह यूँ ही पड़ी रहे तो भी उसमें से अग्नि प्रगट नहीं होती। से घिसकर ही अग्नि को प्रगट किया जा सकता है ऐसे ही मनुष्य में निहित अत्यंत सामर्थ्य प्रयत्न के द्वारा ही प्रगट होता है।

मनुष्य में कितना सामर्थ्य निहित है इसका निर्णय कोई भी नहीं कर सकता। शास्त्र को उसे शाश्वत, सर्व सामर्थ्यवान, सर्वज्ञ, सत्-चित्-आनन्द, अनंत, अखंड, अव्यय, अविनाशी, निरंजन, निराकार, निर्लेप एवं परम प्रेमास्पद कहते हैं अतः मनुष्य जो चाहे वह हो सकता है। पाणिनी जैसे वैयाकरणिक, पतंजलि जैसे योग-प्रवर्तक, वशिष्ठजी जैसे तत्त्वज्ञ, विश्वामित्र जैसे महान तपस्वी, जैमिनी जैसे उत्तम मीमांसक, कालिदास जैसे समर्थ कविकुलशिरोमिणी, धन्वंतरि जैसे वैद्य, भास्कराचार्य जैसे प्रखर ज्योतिर्विद, लिंकन जैसे मानवतावादी, गाँधी जी जैसे सत्यनिष्ठ, रमण महर्षि जैसे तत्त्वनिष्ठ, टैगोर जैसे महान कवि, जिब्रान जैसे सर्वांग सर्जक, स्वामी रामतीर्थ जैसे वैरागी, विवेकानन्द जैसे धर्म-धुरंधर, हेनरी फोर्ड जैसे उद्योगपति, आईन्सटाईन जैसे वैज्ञानिक, सुकरात जैसे सत्यवक्ता, डायोजिनियस जैसे निःस्पृही, सीजर जैसा विजेता, तुकारामजी जैसे क्षमाशील एवं ज्ञानदेव जैसा ज्ञानी-ऐसी आत्मश्रद्धा को अंतःकरण में स्थिर करके ही हुआ जा सकता है।

जिसके अंतःकरण में आत्मश्रद्धा स्थित हो वह भले एकदम अकेला हो, साधनविहीन हो फिर भी सफलता उसी का वरण करती है। उसके रोम-रोम में व्याप्त आत्मश्रद्धारूपी लौहचुंबक आस-पास से अनगिनत साधनरूपी लौहकणों को खींच लेता है। इसके विपरीत जिसकी आत्मश्रद्धा दब गयी हो वह भले लाखों मनुष्यों से घिरा हुआ हो एवं असंख्य साधनों से संपन्न हो फिर भी पराजित होता है। ऐसे कई उदाहरण हमें खुली आँखों देखने को मिलते हैं।

अपने इष्टावतार श्री रामचन्द्रजी के जीवन का ही दृष्टांत लें। जिसने देवताओं तक को अपना दास बना लिया था ऐसे रावण को हराने का निश्चय जब उन्होंने किया तब उनके पास कौन-से साधन थे ? समुद्र को पार करने के लिए उनके पास एक छोटी-सी नौका तक न थी। रावण एवं उसकी विशाल सेना से टक्कर ले सके ऐसा एक भी योद्धा उस वक्त उनके पास न था फिर भी श्रीराम ने निश्चय किया सीता को पाने का, रावण को हराने का तो अमित शक्तिवाला रावण भी रणभूमि की धूल चाटने लगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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