Satsang

सच्चा प्रेम कैसा होता है ? कहाँ मिलता है ?

sachcha prem

प्रेम किसी का अहित नहीं करता। जो स्तनों में जहर लगाकर आयी उस पूतना को भी
श्रीकृष्ण ने स्वधाम पहुँचा दिया। पूतना कौन थी ? पूतना कोई साधारण नहीं थी।
पूर्वकाल में राजा बलि की बेटी थी, राजकन्या थी। भगवान वामन आये तो उनका रूप
सौन्दर्य देखकर उस राजकन्या को हुआ कि ‘मेरी सगाई हो गयी है। मुझे ऐसा बेटा हो
तो मैं गले लगाऊँ और उसको दूध पिलाऊँ।’ परंतु जब नन्हा मुन्ना वामन विराट हो
गया और बलिराजा का सर्वस्व छीन लिया तो उसने सोचा किः “मैं इसको दूध
पिलाऊँ ?इसको तो जहर पिलाऊँ, जहर!’

वही राजकन्या पूतना हुई। दूध भी पिलाया और जहर भी। उसे भी भगवान ने अपने स्वधाम
भेज दिया। प्रेमास्पद जो ठहरे….!

प्रेम कभी फरियाद नहीं करता, उलाहना देता है।

गोपियाँ उलाहना देती हैं यशोदा कोः “यशोदा ! हम तुम्हारा गाँव छोड़कर जा रही
हैं।”

यशोदाः “तुम्हारा कन्हैया हमारी मटकी फोड़ देता है।”

“एक के बदले दस-दस मटकियाँ ले लो”

“ऊँ हूँ… तुम्हारा ही लाला है क्या ! हमारा नहीं है क्या ? मटकी फोड़ी तो
क्या हुआ ?”

“अभी तो फरियाद कर रही थी, गाँव छोड़ने की बात कर रही थी ?”

“वह तो ऐसे ही कर दी। तुम्हारा लाला कहाँ है ? दिखा दो तो जरा।”

उलाहना देने के बहाने भी दीदार करने आई हैं, गोपियाँ ! प्रेम में परेशानी नहीं,
झंझट नहीं केवल त्याग होता है, सेवा होती है। प्रेम की दुनिया ही निराली है।

प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहौं प्रजा चहौं शीश दिये ले जाय।।

प्रेम खेत में पैदा नहीं होता, बाजार में भी नहीं मिलता। जो प्रेम चाहे वह अपना
शीश, अपना अभिमान दे दे ईश्वर के चरणों में, गुरूचरणों में….

एक बार यशोदा मैया मटकी फोड़ने वाले लाला के पीछे पड़ी कि ‘कभी प्रभावती, कभी
कोई, कभी कोई…. रोज-रोज तेरी फरियाद सुनकर मैं तो थक गयी। तू खड़ा रह।’

यशोदा ने उठायी लकड़ी। यशोदा के हाथ में लकड़ी देखकर श्रीकृष्ण भागे। श्रीकृष्ण
आगे, यशोदा पीछे…. श्री कृष्ण ऐसी चाल से चलते कि माँ को तकलीफ भी न हो और
माँ वापस भी न जाये ! थोड़ा दौड़ते, थोड़ा रूकते। ऐसा करते-करते देखा कि ‘अब
माँ थक गयी है और माँ हार जाय तो उसको आनंद नहीं आयेगा।’ प्रेमदाता श्रीकृष्ण
ने अपने को पकड़वा दिया। पकड़वा लिया तो माँ रस्सी लायी बाँधने के लिए। रस्सी
है माया, मायातीत श्रीकृष्ण को कैसे बाँधे ? हर बार रस्सी छोटी पड़ जाय। थोड़ी
देर बाद देखा कि माँ कहीं निराश न हो जाये तो प्रेम के वशीभूत मायातीत भी बँध
गये। माँ बाँधकर चली गयी और इधर ओखली को घसीटते-घसीटते ये तो पहुँचे यमलार्जुन
(नल-कूबर) का उद्धार करने… नल कूबर को शाप से मुक्ति दिलाने… धड़ाक-धूम
वृक्ष गिरे, नल-कूबर प्रणाम करके चले गये…. अपने को बँधवाया भी तो किसी पर
करूणा हेतु, अन्यथा उस मायातीत को कौन बाँधे ?

एक बार किसी गोपी ने कहाः “देख तू ऐसा मत कर। माँ ने ओखली से बाँधा तो रस्सी
छोटी पड़ गयी किंतु मेरी रस्सी देख। चार-चार गायें बँध सकें इतनी बड़ी रस्सी
है। तुझे तो ऐसा बाँधूँगी कि तू भी याद रखेगा, हाँ।”

कृष्णः “अच्छा बाँध।”

वह गोपी कोमल-कोमल हाथों में रस्सी बाँधनी है, यह सोचकर धीरे धीरे बाँधने लगी।

कृष्णः “तुझे रस्सी बाँधना आता ही नहीं है।”

गोपीः “मेरे बाप ! रस्सी कैसे बाँधी जाती है ?”

कृष्णः “ला, मैं तुझे बताता हूँ।” ऐसा करके गोपी के दोनों हाथ पीछे करके रस्सी
से बाँधकर फिर खँभे से बाँध दिया और दूर जाकर बोलेः

“ले-ले, बाँधने वाली खुद बँध गयी। तू मुझे बाँधने आयी थी किंतु तू ही बँध गयी।

ऐसे ही माया जीव को बाँधने आये, उसकी जगह जीव ही माया को बाँध दे। मैं यही
सिखाने आया हूँ।”

कैसा रहा होगा वह नटखटिया ! कैसा रहा होगा उसका दिव्य प्रेम ! अपनी एक-एक लीला
से जीव की उन्नति का संदेश देता है वह प्रेमस्वरूप परमात्मा !

आनंद प्रकट तो हो जाता है जेल में परंतु बढ़ाता है यशोदा के यहाँ, प्रेम से।

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