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तीन दुर्लभ चीजें

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भगवान शंकराचार्य जी कहते हैं- ‘जगत में दुर्लभ क्या है ?’
सदगुरु, सत्संगति और ब्रह्मविचार।
सदगुरु मिल जायें और मनुष्य की अपनी योग्यता न हो तो सदगुरु से ब्रह्मविचार, ब्रह्मचर्चा, ब्रह्मध्यान, परमात्म-साक्षात्कार नहीं कर पायेगा। सदगुरु मिल गये लेकिन अपनी योग्यता नहीं है, तत्परता नहीं है तो मनुष्य उनसे भी ईँट, चूना, लोहा, लक्कड़ आदि संसार की तुच्छ चीजें चाहता है। जिसकी अपनी कुछ आध्यात्मिक कमाई है, अपने कुछ पुण्य हैं वह सदगुरु से सत् तत्त्व की जिज्ञासा करेगा। ‘संसार का बंधन कैसे छूटे ? आँख सदा के लिए बंद हो जाये, इन नेत्रों की ज्योति कम हो जाये उसके पहले आत्मज्योति की जगमगाहट कैसे हो ? कुटुम्बीजन मुँह मोड़ लें उसके पहले अपने सर्वश्वरस्वरूप की मुलाकात कैसे हो ?’ – ऐसे प्रश्न करने वाला, आत्मविचार और आत्म-प्यास से भरा हुआ जो साधक है, वही सदगुरु का पूरा लाभ उठाता है। बाकी तो जैसे कोई सम्राट प्रसन्न हो जाय और कोई उससे चना-चिउड़ा और चार पैसे की च्युइंगम-चॉकलेट माँगे, वैसे ही ब्रह्मवेत्ता सदगुरु प्राप्त हो जायें और उनसे संसार की चीजें प्राप्त करके अपने को भाग्यवान मान ले, वह नन्हें-मुन्ने बच्चे जैसा है जो तुच्छ खिलौनों में खुश हो जाता है।
पाताललोक, मृत्युलोक और स्वर्गलोक-इन तीनों लोकों में सदगुरु, सत्संगति और ब्रह्मविचार की प्राप्ति दुर्लभ है। ये तीन चीजें जिसे मिल गयीं, चाहे उसे और कुछ नहीं मिला, फिर भी वह सबसे ज्यादा भाग्यवान है। बाहर की सब चीजें हों, केवल ये तीन चीजें नहीं हों तो भले चार दिन के लिए उसे भाग्यवान मान लो, सामाजिक दृष्टि से उसे बड़ा मान लो लेकिन वास्तव में उसने जीवन का फल नहीं पाया।

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