Satsang

पुजारी बना प्रेत

Sant ki sewa

उड़िया बाबा बड़ी ऊँची कमाई के धनी थे। अखंडानंदजी सरस्वती उनके प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे। वे आपस में चर्चा भी किया करते थे।
उड़िया बाबा ने एक दिन सुबह एक मृत पुजारी को सामने खड़े देखकर पूछाः “अरे, बाँके बिहारी के पुजारी ! तू तो मर गया था। तू सुबह-सुबह इधर यमुना किनारे कैसे आया?”
उसने कहाः “बाबा ! मैं आपसे प्रार्थना करने आया हूँ। मैं मर गया हूँ और संकल्प से आपको दिख रहा हूँ। मैं प्रेत शरीर में हूँ। मेरे घरवालों को बुलाना और जरा बताना कि उन्हें सुखी करने के लिए मोहवश मैंने ठाकुरजी के पैसे चुराकर घर में रखे थे। धर्मादा के पैसे चुराये इसलिए मंदिर का पुजारी होते हुए भी मेरी सदगति नहीं हुई। मैं आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि मेरे बेटे से कहिए कि फलानी जगह पर थोड़े-से पैसे गड़े हैं, उन्हें अच्छे काम में लगा दे और बाँकेबिहारी के मंदिर के पैसे वापस कर दे ताकि मेरी सदगति हो सके।”
कर्म किसी का पीछा नहीं छोड़ते। था तो मंदिर का पुजारी, किंतु अपने दुष्कर्म के कारण उसे प्रेत होना पड़ा !
सूरत (गुजरात) में सन् 1995 के जन्माष्टमी के ‘ध्यान योग साधना शिविर’ में कुछ लोफरों ने आश्रम के बाहर चाय की लारी से किसी महाराज का फोटो उतारा। फिर भक्तों से कहाः “तुम लोग हरि ॐ…. हरि ॐ… करते हो। तुम्हारे बापूजी हमारा क्या कर लेंगे?” और फोटो के ऊपर कीचड़वाले पैर रखकर नाचे।
शाम को उन्हें लकवा मार गया, रात को मर गये और दूसरे दिन श्मशान में पहुँच गये।
बुरा कर्म करते समय तो आदमी कर डालता है, लेकिन बाद में उसका परिणाम कितना भयंकर आता है इसका पता ही नहीं चलता उस बेचारे को।
जैसे दुष्कृत्य उसके कर्ता को फल दे देता है, ऐसे ही सुकृत भी भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करने वाले कर्ता के अंतःकरण को भगवद्ज्ञान, भगवद् आनंद एवं भगवद् जिज्ञासा से भरकर भगवान का साक्षात्कार करा देता है।

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