Festival

HAPPY DHANTERAS

dhanteras

धन्वंतरि महाराज खारे-खारे सागर में से औषधियों के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य-संपदा से समृद्ध हो सके, ऐसी स्मृति देता हुआ जो पर्व है, वही है धनतेरस। यह पर्व धन्वंतरि द्वारा प्रणीत आरोग्यता के सिद्धान्तों को अपने जीवन में अपना कर सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहने का संकेत देता है।

धनतेरस के दिन यमराज को दो दीपक दान करना चाहिये | तुलसी के आगे एक दीपक रखना चाहिये, दरिद्रता मिटाने के नेक काम आता है |

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह |

त्रयोदश्यां दीपदानात् सुर्यज: प्रीयतामिति ||

धनतेरस के दिन इस मंत्र से घर के द्वार पर दीपदान करने से अपमृत्यु का भय नहीं होता |


दीपावली पर लक्ष्मीप्राप्ति की सचोट साधना-विधियाँ

धनतेरस से आरंभ करें

सामग्रीः दक्षिणावर्ती शंख, केसर, गंगाजल का पात्र, धूप अगरबत्ती, दीपक, लाल वस्त्र।

 

विधिः साधक अपने सामने गुरुदेव व लक्ष्मी जी के फोटो रखे तथा उनके सामने लाल रंग का वस्त्र (रक्त कंद) बिछाकर उस पर दक्षिणावर्ती शंख रख दे। उस पर केसर से सतिया बना ले तथा कुमकुम से तिलक कर दे। बाद में स्फटिक की माला से मंत्र की 7 मालाएँ करे। तीन दिन तक ऐसा करना योग्य है। इतने से ही मंत्र-साधना सिद्ध हो जाती है। मंत्रजप पूरा होने के पश्चात् लाल वस्त्र में शंख को बाँधकर घर में रख दें। कहते हैं – जब तक वह शंख घर में रहेगा, तब तक घर में निरंतर उन्नति होती रहेगी।

 

मंत्रः ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी धनदा लक्ष्मी कुबेराय मम गृह स्थिरो ह्रीं ॐ नमः।

 

अनुक्रम

दीपावली से आरंभ करें

दीपावली पर लक्ष्मी प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार की साधनाएँ करते हैं। हम यहाँ अपने पाठकों को लक्ष्मीप्राप्ति की साधना का एक अत्यन्त सरल व मात्र त्रिदिवसीय उपाय बता रहे हैं।

दीपावली के दिन से तीन दिन तक अर्थात् भाईदूज तक एक स्वच्छ कमरे में धूप, दीप व अगरबत्ती जलाकर शरीर पर पीले वस्त्र धारण करके, ललाट पर केसर का तिलक कर, स्फटिक मोतियों से बनी माला नित्य प्रातःकाल निम्न मंत्र की दो-दो मालाएँ जपें।

 

ॐ नमः भाग्यलक्ष्मी च विद् महे।

अष्टलक्ष्मी च धीमहि।

तन्नोलक्ष्मी प्रचोदयात्।

दीपावली लक्ष्मीजी का जन्मदिवस है। समुद्र मन्थन के दौरान वे क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं। अतः घर में लक्ष्मी जी के वास, दरिद्रता के विनाश और आजीविका के उचित निर्वाह हेतु यह साधना करने वाले पर लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।


यदि हम इस बार की दिवाली को अपनी विशेष दिवाली मनाना चाहते हैं तो हमें प्रार्थना करनी होगीः

 

अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः।

ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो।।

‘हे प्रभु ! अज्ञानरूपी अंधकार में अंध बने हुए और विषयों से आक्रान्त चित्तवाले मुझको ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करो।’

हमें भी श्रीराम की तरह अपने विषय-विकारों से युद्ध करना होगा और जिन सदगुणों को अपना कर श्रीराम ने रावण जैसे महाबलियों को धराशायी कर दिया, उन सदगुणों को अपना कर, उन्हें विकसित कर इन विकाररूपी राक्षसों को मारकर अपने आत्मा-परमात्मारूपी घर में वापस आना होगा। ईंट-पत्थर के घर में नहीं वरन् अपने असली घर में प्रवेश करना होगा। इसके लिए दृढ़ता से संकल्प करना होगा, ऐसी तड़प जगानी होगी कि ‘अब हम ज्यादा समय तक नहीं रह सकते अपने घर से बिछड़कर ! हमारी परमात्मारूपी करुणामयी माँ कौशल्या हमें बुला रही हैं।’

किंतु… विकारों पर विजय प्राप्त कराने की शक्ति दिलाने वाले कोई तो चाहिए – वशिष्ठजी जैसे, याज्ञवल्क्य जैसे, लीलाशाह बापू जैसे जिन्हें हमारे घर का पता मालूम हो। जिनसे हम पूछ सकें अपने घर का पता। जो अपने घर में प्रतिष्ठित हो चुके हों ऐसे महापुरुषों की शरण में हमें जाना होगा। ऐसे सदगुरु अगर हमें मिल जायें और उनकी नूरानी नजर हम पर पड़ जाय तो बेड़ा पार हो जायेगा। क्योंकि जन्मों-जन्मों के भटके जीवों के कल्याण के लिए अपने घर का पता पूछने के लिए गुरुदेव के अलावा और कोई परम कल्याणकारी देव नहीं है।

ऐसे सदगुरु ही हमारी भटकान को दूर कर हमें असली घर में प्रवेश करा सकते हैं। जिन्होंने गुरुकृपा को पचाया है, उन महापुरुषों ने अपने जीवन को सफल कर लिया है। जो अपने परम पद में स्थित हो गये हैं, उन महापुरुषों के जीवन में फिर सदा ही दिवाली रहती है।

जिनकी जीवन नैया प्यारे, सदगुरु ने सँभाली है।

उनके मन की बगिया की, महकी हर सूखी डाली है।।

निगुरों के हैं दिन अंधियारे, उनकी रात उजियारी है।

जो मिटे सदगुरु चरणों में, उनकी बात निराली है।।

जिसने गुरु के प्रेमामृत की, भर-भर के पी प्याली है।

मानव जनम सफल है उनका, उनकी रोज दिवाली है।।

 

हम भी आज संकल्प करें- “श्रीराम का तरह सदगुरु की शरण में जाकर विकाररूपी राक्षसों पर विजय प्राप्त करने की कला सीखेंगे तथा जन्मों और सदियों से चल रहे इस युद्ध और वनवास पर विजय प्राप्त कर हम अपने घर में आयेंगे व भूले हुओं को राह दिखाकर उनके जीवन में भी ज्ञान की ज्योति प्रज्जवलित कराने में सेतु का कार्य करेंगे।


दीपावली अर्थात् अमावस्या के गहन अंधकार में भी प्रकाश फैलाने का पर्व। यह महापर्व यही प्रेरणा देता है कि अज्ञानरूपी अंधकार में भटकने के बजाय अपने जीवन में ज्ञान का प्रकाश ले आओ…

पर्वों के पुंज इस दीपावली के पर्व पर घर में और घर के बाहर तो दीपमालाओं का प्रकाश अवश्य करो, साथ ही साथ अपने हृदय में भी ज्ञान का आलोक कर दो। अंधकारमय जीवन व्यतीत मत करो वरन् उजाले में जियो, प्रकाश में जियो। जो प्रकाशों का प्रकाश है, उस दिव्य प्रकाश का, परमात्म-प्रकाश का चिंतन करो।

सूर्य, चन्द्र, अग्नि, दीपक आदि सब प्रकाश है। इन प्रकाशों को देखने के लिए नेत्रज्योति की जरूरत है और नेत्रज्योति ठीक से देखती है कि नहीं, इसको देखने के लिए मनःज्योति की जरूरत है। मनःज्योति यानी मन ठीक है कि बेठीक, इसे देखने के लिए बुद्धि का प्रकाश चाहिए और बुद्धि के निर्णय सही हैं कि गलत, इसे देखने के लिए जरूरत है आत्मज्योति की।

इस आत्मज्योति से अन्य सब ज्योतियों को देखा जा सकता है, किंतु ये सब ज्योतियाँ मिलकर भी आत्मज्योति को नहीं देख पातीं। धनभागी हैं वे लोग, जो इस आत्मज्योति को पाये हुए संतों के द्वार पहुँचकर अपनी आत्मज्योति जगाते हैं।


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2 thoughts on “HAPPY DHANTERAS

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