Indian Culture, Satsang

आध्यात्मविद्याः भारत की विशेषताः

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सुकरात तो शरीर छोड़ते-छोड़ते अपना अनुभव लोगों को बताते गये कि शरीर की मृत्यु यह तुम्हारी मृत्यु नहीं, शरीर के जाते हुए भी तुम इतने के इतने ही पूर्ण हो, परन्तु भारत के ऋषि तो आदि काल से कहते आये हैं-

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ।

आ ये धामानि दिव्यानि तस्युः ।।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् ।

आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।।

तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति ।

नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।।

‘हे अमृतपुत्रों ! सुनो। उस महान परम पुरुषोत्तम को मैं जानता हूँ। वह अविद्यारूप अंधकार से सर्वथा अतीत है। वह सूर्य की तरह स्वयंप्रकाश-स्वरूप है। उसको जानकर ही मनुष्य मृत्यु का उल्लंघन करने में, जन्म-मृत्यु के बंधनों से सदैव के लिए छूटने में समर्थ होता है। परम पद की प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है।’

(श्वेताश्वतरोपनिषद्)

यह कोई वेद-उपनिषद् काल की बात है, उस समय के ऋषि चले गये और अब नहीं हैं…. ऐसी बात नहीं है। आज भी ऐसे ऋषि और ऐसे संत हैं जिन्होंने सत्य की अनुभूति की है। अपने अमरत्व का अनुभव किया है। इतना ही नहीं बल्कि दूसरों को भी इस अनुभव में उतार सकते हैं। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि रमण इत्यादि ऐसे ही तत्त्ववेत्ता महापुरुष थे। और आज भी ऐसे महापुरुष जंगलों में और समाज के बीच में भी हैं। यहाँ इस स्थान पर भी हो सकते हैं। परन्तु उनको देखने की आँख चाहिए। इन चर्मचक्षुओं से उन्हें पहचानना मुश्किल है। फिर भी जिज्ञासु और मुमुक्षु वृत्ति के लोग उनकी कृपा से उनके बारे में थोड़ा संकेत यह इशारा पा सकते हैं।

 

 

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